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भूमिका
जब हमारे इतिहासकार व लेखक शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का जिक्र करते हैं तो वे अपनी बात महाराजा के शीश पर छाये आलीशान छत्र से शुरू करते हुए उसकी पगड़ी की खूबसूरती बढाने वाली बहुमूल्य कलगी पर आ जाते हैं। उसके उपरांत जब वे महाराजा के चेहरे पर आते हैं तो उसकी एक खराब आँख व चेचक के दागों को छिपाने के लिए भावुकता भरपूर अपने तर्क देना शुरू कर देते हैं। वे महराजा की नेक दिली की तो बात करते हंै लेकिन उसके द्वारा किए अन्याय और अत्याचारों को अनदेखा करने के लिए अपनी दोनों आंखंे बंद करके उन पर हाथ रख लेते हैं। फिर, उसकी पगड़ी की ओर देखते हुए महाराजा की राजनीतिक सूझ-बूझ, निपुणता, दूरअंदेशी तथा चुस्त दिमाग की तारीफों के पुल चीन की दीवार से भी ऊँचे निर्मित कर देते हैं। उसके बाद वे महाराजा रणजीत सिंह की अनेक विजयों, उपलब्धियों तथा उसके अधीन विशाल रियासती इलाके की प्रशंसा करते हुए उसकी ताकत की उपमायें देने लगते हैं। महाराजा की भुजाओं की शक्ति को बयान करने के लिए वे उस नायाब कोहिनूर हीरे का वर्णन करते हैं जिसे जिस तरह उसने प्राप्त किया था, उसी तरह उसके वारिसों से छीन भी लिया गया। इसके बाद, थोड़ा नीचे उतरकर महाराजा की कमर से लटकती मंहगे हीरों से जड़ी फौलादी तलवार का गुणगाण शुरू हो जाता है। इस विवरण के पश्चात हमारे साहित्यकारों व इतिहासकारों की कलम महाराजा के कमरबंद पर आकर दम तोड़ देती है। ऐसे लेखकों की रचनाओं को पढते समय एक ज़हीन बुद्वि वाले इंसान व साहित्य चिंतक को केवल अंधी श्रद्वा के अलावा और कुछ भी नज़र नहीं आता।
महाराजा के जीवन के बहुत सारे पक्ष ऐसे हैं जिन पर गौर नहीं किया गया। ऐसे पक्ष जिनमें उनकी मर्दानगी और चरित्र की सही तस्वीर झलकती है। सिक्ख बुद्विजीवियों द्वारा उन पर पर्दा डाल दिया जाता है या उनके बारे में ख़ामोशी धारण कर ली जाती है। यह इतिहास के साथ सरासर बेइंसाफी है। मुझे ऐसा लगता है कि हमारे सूझवान विद्वानों को जिं़दगी में सेक्स के महत्व का कतई ज्ञान नही है।
महाराजा ने अपने जीवन में बेशुमार औरतों का उपभोग किया। उसके हरम में असंख्य रानियों व दासियों का बहुमूल्य खजाना था जिनके बारे में विवरण प्राप्त होते हैं। उन रानियों और रखेलों की संख्या 62 बनती हंै। इसके अलावा उसके ‘वन नाईट स्टैंड’ अर्थात गाहे-बगाहे महाराजा ने कहाँ-कहाँ मुँह मारा होगा अथवा जिनके बारे में लिखित रूप में कुछ नहीं मिलता, न जाने उनकी सूची कितनी लम्बी होगी। भिन्न-भिन्न इतिहासकारों ने रानियों व दासियों की संख्या तथा नामों की संख्या अलग-अलग बताई है। मेरे विचार के अनुसार यदि महाराजा के जीवन में यह पक्ष शामिल न होता तो शायद उसे इतिहास में वो मुकाम व रुतबा हासिल न हो पाता जो
उसका आज है और न ही वह इतना विशाल राज्य स्थापित कर पाता। उल्लेखनीय है कि उसने सदैव अपनी ताकत बढाने व युद्ध जीतने के लिए स्त्रियों का इस्तेमाल किया। अगर महाराजा रणजीत सिंह पंजाब व सिख इतिहास का अभिन्न अंग है तो मोरां भी उसके साथ है।
मोरां... हाँ, मोरां कंचनी ! जो बाज़ारू नृतकी थी जिसने ताउम्र महाराजा को अपनी अंगुलियों के इशारों पर नचाया। महाराजा की कमर से ऊपर की शक्ति की बहुत तारीफें हो चुकी हंै। अब समय है कि ‘शेर-ए-पंजाब’ के कमरबंद से नीचे की भी कोई बात करे। पर कौन ? कोई साहस करे या न करे, लेकिन मैं निडरता और बेबाकी के साथ उसकी कमर से नीचे की ताकत को बयान करते हुए, मोरां के साथ खौलते इश्क पर एक नज़र डालकर ये कहानियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। इतिहास पर आधारित ये कहानियाँ न तो पूर्ण रूप से गद्य रचनाएँ हंै और न ही येे अफसानें विशुद्ध इतिहास हंै। ये ऐतिहासिक घटनाओं और कल्पनाओं का सम्मिश्रण हैं और सच के बहुत करीब की तस्वीरें हैं। मैंने अपनी इन कथाओं को दिलचस्प बनाने के लिए जहाँ जहाँ मुझे महसूस हुआ, आवश्यकतानुसार कुछ परिवर्तन किए हैं। पात्र, घटनाक्रम व काल से छेड़-छाड़ करते हुए मैने इस बात का पूरा ख़याल रखा है कि किसी भी ऐतिहासिक तथ्य का चेहरा न बिगड़े। इसमें मेरी कला व कल्पना की प्रत्यक्ष घुसपैठ है। यह पुस्तक लिखने के पीछे मेरा मकसद महाराजा की छवि को धूमिल करना अथवा उसको नीचा दिखाना हर्गिज़ नहीं है, बल्कि महाराजा की जिं़दगी के अँधेरे पक्ष पर प्रकाश डालना है। मैं महाराजा रणजीत सिंह की अन्य शेष रानियों के विषय में भी लिखना चाहता था, परंतु कुछ संकीर्ण सोच वालों की तरफ से विरोध होने के कारण उन्हें कुछ अंतराल देकर कलमबद्ध करूँगा। सभी को एकसाथ शायद पाठक हज़म न कर सकें। महाराजा रणजीत सिंह सिक्खों का एकमात्र महाराजा था। निःसंदेह उसने सिक्ख राज स्थापित किया लेकिन यह भी सच है कि उस सिक्ख राज की तबाही के लिए भी वह स्वयं जिम्मेदार था। जब दो कौमों, सम्प्रदायों, धर्मों या देशों के बीच युद्ध होता है तो उसका इतिहास दो तरीकों से दोनों शक्तियों द्वारा लिखा जाता है। विजयी उसको अपनी प्रशंसा में लिखवाता है और पराजित अपने ज़ख़्मों पर मरहम लगवाते हुए, अपनी हार के बहाने घड़कर। सिक्ख इतिहास के साथ भी ऐसा ही घटित हुआ। सिक्ख राज के पतन का असली कारण तलाशने की अपेक्षा अनेक अन्य पहलू पकड़ लिए गए। रणजीत सिंह एक हुक्मरान था और अपना राज्य उसने केवल अपने बाहुबल से ही नहीं फैलाया था, उसने तो स्वयं सभी युद्धों में हिस्सा भी नहीं लिया था। उसके जरनैल लड़ते रहे और जीतते रहे थे।
महाराजा रणजीत सिंह ने अपना राज वैसे ही स्थापित किया जैसे कि हर राजा करता था। रणजीत सिंह बहादुर भी था, योद्धा भी था, कपटी भी था, चतुर भी था। उसने अपने हर गुण और हथकंडे का प्रयोग करके शासन किया। ऐसा करना कुछ भी गलत नहीं है। रणजीत सिंह ने मुगल बादशाहों की तजऱ् पर राज किया था। उसकी सरकारी भाषा भी फारसी थी। रणजीत सिंह एक राजा था। राजनीति और धर्म दो भिन्न-भिन्न चीज़ें हैं। रणजीत सिंह के बारे में बातें करने वालों द्वारा सीधे ही सिक्ख धर्म से जोड़ देना मूर्खता और अज्ञानता है। रणजीत सिंह ने ‘गुरसिक्ख’ वाला नहीं बल्कि एक शासक वाला जीवन जिया था। वह ज्योतिषों से पूछकर हर अहम काम किया करता था। उसने गै़र सिक्ख रानियों के साथ हिंदू और इस्लामी रीति से कलमे पढ़कर विवाह करवाये। इसी कारण सिक्ख गुरुओं के उपदेश के उलट रानियाँ और दासियाँ न केवल रणजीत सिंह के साथ सति हुईं, बल्कि यह रीति उसके पुत्र खड़क सिंह और पौत्र नौनिहाल सिंह तक चलती रही थी। इस संग्रह में रानी जिंदा का कम उल्लेख होने का कारण यह है कि रानी जिंदा के बारे में भिन्न कहानी है। 1834 में महाराजा को अधरंग का पहला दौरा पड़ा था। डाॅक्टरों ने उसको संतान पैदा करने से अयोग्य घोषित कर दिया था। 1835 में रानी जिंदा का उसकी इच्छा के विरुद्ध रणजीत सिंह के साथ विवाह हुआ था। 6 सितंबर 1838 को उसकी कोख से दलीप सिंह का जन्म हुआ था। 27 जून 1839 में रणजीत सिंह का निधन हो गया। विवाह के बाद लगभग कुल मिलाकर एक वर्ष का समय रानी जिंदा ने अपने मायके में व्यतीत किया था। रणजीत सिंह की जि़न्दगी में रानी जिंदा का साथ केवल तीन वर्ष का था। जबकि अन्य रानियाँ उससे अधिक समय रणजीत सिंह के सम्पर्क में रहीं। लेकिन रानी जिंदा को सिक्ख होने के कारण हाईलाइट कर दिया गया ताकि दूसरी रानियों का जि़क्र दब जाए। कारण साफ़ था कि दूसरी रानियों के साथ संबंधित घटनाओं में से रणजीत सिंह का एक भिन्न ही अक्स उभरता था। अंग्रेजों की सिक्खों के साथ हुई लड़ाई में हार के लिए भी रानी जिंदा का हाथ होने को लेकर उल्लेख मिलता है। अंग्रेजों ने पूरे भारत पर शासन किया था। इतिहास एक सवाल खड़ा करता है कि सिर्फ़ महाराजा रणजीत सिंह के बेटे को ही अंग्रेज इंग्लैंड में क्यों लाए ? और उसने ही क्यों ईसाई धर्म को अपनाया ? केवल दलीप सिंह ने ही क्यों राज का पतन हो जाने के बाद इंग्लैंड में जागीरें प्राप्त करके शाही जीवन बिताया था ?
हालांकि मैं एक हुक्मरान द्वारा ऐशपरस्ती करने को बुरा नहीं मानता, पर कुछ लोगों को यह अवगुण लगता है तो उन्हें इस जानकारी के लिए बता दूँ कि इस कहानी संग्रह में उसके गुणों का भी वर्णन किया गया है।
अकबर बादशाह ने अपने शासन के दौरान अपने दरबारी कवियों और लेखकों से अपनी प्रशंसाओं में काल्पनिक कहानियाँ लिखवाकर प्रचलित करवाई थीं। अकबर बीरबल वाले अनेक किस्से सभी ने पढ़े-सुने हैं। ऐसा करने के पीछे उसका उद्देश्य लोगों में अपनी छवि को बढि़या बनाना था। सिकंदर और अन्य राजा भी इसी प्रकार करते रहे हैं। रणजीत सिंह ने भी ऐसा ही किया था। उसके साथ जुड़ी अनाज ढोने, बेरी को पत्थर मारने और तवे वाली बातें महज बातें हैं। लेकिन मैंने उनका भी वर्णन किया है। वे बातें बचपन में माँयें अपने बच्चों को सुनाकर रणजीत सिंह की एक ऐसी तस्वीर घड़ देती थीं कि वह बच्चे के जे़हन में से सारी उम्र नहीं मिटती थी। रणजीत सिंह द्वारा भंगी मिसल की रानी सुक्खां और अन्य अनेक जागीरों को जबरन जब्त करने और हाथ पैर काटकर उम्र कै़द करने की अनेक मिसालें इतिहास में दजऱ् हैं। अपनी सास सदा कौर जिसके उस पर अनेक अहसान थे, उसको अन्तिम समय तक रणजीत सिंह ने अमृतसर में कै़द रखा था। मनमजऱ्ी करने और अपनी जि़द पूरी करने के वक्त वह किसी भी हद तक चला जाता था।
रणजीत सिंह के साथ किसी प्रकार की घृणा करके यदि मुझे लिखना होता तो मैं उसकी तारीफ़ क्यों करता ? मैं भी कैप्टन अमरिन्दर सिंह की भाँति लिख देता कि उसने अपनी माँ के लखपत राय के साथ नाजायज़ संबंधों से खफ़ा होकर माँ का क़त्ल किया था। उसके बाप के विषय में जैसे ‘आखि़री लम्हे की दास्तान’ में लिखा है, मैं भी लिख सकता था कि रणजीत सिंह के पिता महा सिंह ने अपनी माँ माई देसा को उसकी बदचलनी के कारण मारा था। बहुत सारी अन्य सच्चाइयाँ हैं, जिन्हें मैंने जानबूझकर महत्व नहीं दिया था क्यांेकि मेरा मकसद रणजीत सिंह को बदनाम करना कतई नहीं था। बहुत सारे लोग यह भी कह देते हैं कि अंग्रेजों ने रणजीत सिंह को बदनाम करने के लिए उसके बारे में गलत लिखा है। रणजीत सिंह की तारीफ़ में भी अंग्रेजों ने बहुत कुछ लिखा है। सिक्ख योद्धाओं की बहादुरी का भी अंग्रेजों ने उल्लेख किया है।
दूसरी बात अंग्रेजों को सिर्फ़ रणजीत सिंह ही बदनाम करने के लिए मिला था ? उन्होंने शाम सिंह अटारी, अकाली फूला सिंह, हरी सिंह नलुआ को बदनाम करने के लिए क्यों नहीं कुछ लिखा ? क्यों वे झांसी की रानी और शेर-ए-मैसूर टीपू सुल्तान की तारीफ़ करते हैं ? अंग्रेज अफ़सरों के अलावा बहुत सारे सैलानियों ने भी सिक्ख राज के बारे में लिखा है। सबकी क्या रणजीत सिंह के साथ कोई विशेष दुश्मनी थी ?
रणजीत सिंह एक महाराजा था और उसके राज का अध्ययन, लेखा जोखा और निरीक्षण-परीक्षण एक शासक के तौर ही किया जाएगा और राजाओं रानियों के बारे में कहानियाँ, किस्से, किताबें भी लिखी जाती हैं और लिखी जाती रहेंगी। मेरी महाराजा के साथ कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है या उसने मेरी कोई जागीर नहीं जब्त की थी। मैं एक कहानीकार हूँ और इतिहास पढ़ते हुए मुझे अनुभव हुआ कि हमारे लोगों को रणजीत सिंह के इस पक्ष की जानकारी नहीं है। इसी को आधार बनाकर नई बात की जा सकती है।
इस पुस्तक में बताई गईं सभी ऐतिहासिक घटनाओं, इतिहासकारों ने जैसा उन्हें लिखा है, को मैंने उसी रूप में इस्तेमाल किया है। फिर भी रणजीत सिंह के श्रद्धालू और कट्टर समर्थक इस पुस्तक को साहित्य समझकर पढ़ें। बहुत सारे लोग रणजीत सिंह की शान के खिलाफ़ कोई भी सच्ची बात सुनना नहीं चाहते। इसके भिन्न भिन्न कारण हैं। किसी के अनुसार उसके अलावा उनके पास गर्व करने वाली कोई हस्ती नहीं है। किसी के लिए वह रब है और कई तो उसको अपने पिता का दजऱ्ा भी देते हैं। संभव है, ऐसे लोगों का महाराजा के साथ रक्त का संबंध हो। रणजीत सिंह ने जी भरकर अ ̧याशी की थी और उसकी रखैलें और दासियाँ उसके पूरे साम्राज्य में बिखरी पड़ी थीं। कट्टरपंथियों से मेरा यही कहना है कि वे सच सुनने का जिगरा भी रखें। स्मरण रहे कि यह एक ऐतिहासिक कहानियों का संग्रह है न कि महज सिक्ख राज की कहानियों की किताब।
मैं इस पुस्तक में महाराजा रणजीत सिंह के बारे में तीन कहानियों के अलावा, इसी प्रकार की औरत-मर्द संबंधों की तीन अन्य ऐतिहासिक कहानियों को भी शामिल करके यह संग्रहसाहित्य पाठकों को अर्पित करने का गर्व प्राप्त कर रहा हूँं।
इस किताब का पहला एडिशन पंजाबी में छपने के बाद केवल बीस दिन के अंदर ही बिक चुका था। बहुत सारे विद्धानों ने इसकी प्रशंसा की। इक्का दुक्का कट्टर और संकीर्ण सोच वालों ने विरोध भी किया। मेरा यही कहना है कि यह पुस्तक रणजीत सिंह को लेकर लिखी पहली पुस्तक नहीं है और न ही यह अन्तिम होगी। मैंने जो कुछ भी लिखा है, दूसरे लेखकों और इतिहासकारों को पढ़कर ही लिखा है। इसमें उल्लिखित एक भी बात ऐसी नहीं है जो पहले न लिखी गई हो। गुलबहार बेगम वाली कहानी मनमोहन बावा की कहानी ‘खानाबदोश बेगम’ में से उठाकर मैंने और अधिक खोज की और उसको अपने नज़रिये से लिखा। मोरां के बारे में बहुत सारा लिखा हुआ मिलता है। गोबिंद कौर वाली कहानी दीवान जर्मनी दास की किताब ‘महाराजा’ में से उठाकर उसको विस्तार दिया है। कहने का अर्थ यह कि सब कुछ पहले ही लिखा हुआ मिलता है। मुझे लगा कि उसको मैं अधिक अच्छे ढंग से लिख सकता हूँ तो मैंने लिख दिया है। शायद मेरी लेखन शैली ही इस पुस्तक की प्रसिद्धि का कारण हो सकती है। उसके बाद उसी पहली पी.डी.एफ. को इस्तेमाल करके आवश्यकतानुसार किताबें प्रकाशित की गईं। अब हिन्दी संस्करण प्रस्तुत कर रहा हूँ। उम्मीद है, पाठक इसको भी उसी प्रकार बेहद पसंद करेंगे।
सदियों से दफ़न इन प्राचीन कहानियों को मैंने इतिहास की कब्रों में से खोदकर निकाला है। आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।


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