प्रस्तावना: चार सौ साल से भी अधिक पुरानी यह कहानी वर्तमान गोवा की धरती पर उस समय घटित हुई जब अलफान्सो डी अल्बूकरक की कमांड के अधीन 1510 ई. में पुर्तगालियों ने इस धरती पर आकर कब्ज़ा किया था। गोवा वासियों की कोंकणी भाषा में प्रेमगाथा का वही महत्व है जो हमारी पंजाबी में हीर का दजऱ्ा है।
नंगे पांव नारियल के पेड़ से पीठ टिकाये खड़ी डोना दूर समुद्र में तैरती मछेरों की छोटी-सी नाव को निहार रही है। कहने को तो यह समुद्र है, पर फिर भी इसमें एक अदृश्य सीमाबंदी की हुई है। इस सीमा के बारे या तो डोना का पिता जानता है या ये मछेरे। इस सरहद के अंदर आने वाला अरब सागर का सारा इलाका डोना के पिता वाइसराय 1⁄4बादशाह के स्थापित राज्य का प्रतिनिधि1⁄2 अमारल डी मैनेज़ीज की सम्पŸिा है। ये मछेरे उस इलाके में से मछलियाँ पकड़कर बेचते हैं और की हुई कमाई में से चैथा हिस्सा लगान के रूप में वाइसराय को देते हैं।
नाव जैसे जैसे समुद्र तट के करीब आती जाती है, वैसे वैसे उसका आकार बड़ा होता जाता है। जब नाव आकर धरती की सतह से टकराती है तो उसमें सवार तीनों मछेरे छलांग लगाकर बाहर आ जाते हैं और नाव को समुद्र से बाहर धकेलने लग जाते हैं। नाव के दोनों ओर दो वृद्ध मछेरे हैं और उसके पीछे एक हट्टा-कट्टा नौजवान जिसका धड़ नंगा और कमर पर सिर्फ़ धोती है जो भीगकर उसकी टांगों से चिपकी हुई है।
अचानक डोना की दृष्टि उस नौजवान मछेरे पर पड़ती है। डोना एकटक उसकी ओर देखने लगती है। नाव धकेलेने के लिए ज़ोर लगाने पर उसकी बाजुओं के डोले पहले की अपेक्षा और अधिक फूल जाते हैं और ऐसा प्रतीत होता है मानो उसके डोले पर बंधा हुआ काला तावीज़ किसी भी समय टूट जाएगा।
डोना की उस नौजवान मछेरे पर केन्द्रित हुई निगाहों को न तो मछलियाँ का ढेर दिखलाई देता है, न नाव और न ही दूसरे मछेरे। उसको सिर्फ़ और सिर्फ़ वह नौजवान मछेरा ही नज़र आता है।
नाव को पानी से बाहर रेत पर निकालकर सारे मछेरे मछलियों को उठा उठाकर ‘एकदोम मारोग मछली’ 1⁄4बहुत मंहगी मछलियाँ हैं1⁄2 कहते हुए खुशी में चीखने लग जाते हैं। मछलियों से ऊपर तक भरी हुई उनकी नाव ऐसे लगती है जैसे चांदी की मोहरों का ढेर हो।
डोना आहिस्ता आहिस्ता चलती हुई उनकी नाव के समीप चली जाती है। डोना को देखकर वृद्ध मछेरे अदब से सिर झुकाकर सलाम करते हैं। डोना ख़ामोश खड़े उस नौजवान मछेरे की ओर देखते रहती है। बूढ़े मछेरों को लगता है कि शायद डोना ने पाउला द्वारा सलाम न करने पर बुरा मनाया है। वे पाउला को घूरते हैं, “सलाम कर रे ! ये मालकिन है।“
“दिहो कोरो दिस दिअम।“
“शुभ सवेर।“ पाउला की नमस्ते का उŸार देते हुए ज्यों ही डोना उसकी आँखों में आँखें डालकर देखती है तो पाउला की आँखों का सेक डोना को अपने तन-बदन में भी लरजता महसूस होता है। डोना हो यूँ लगता है मानो उसका पाउला के साथ कोई सदियों पुराना रिश्ता हो या वह पहले भी पाउला से कहीं मिल चुकी हो।
दूसरा बूढ़ा मछेरा भी कहता है, “हाँ, मालकिन अब चाहे हफ्ताभर समुद्र की ओर मुँह न करें। हमारा फिर भी आसानी से गुज़ारा हो जाएगा। लाट साहिब को कहना कि इनमें से बढि़या मछलियाँ चुनकर हम रात के
भोजन के लिए उपहार के तौर पर भेजेंगे।“ 121 मोरां का महाराजा
“हाँ...अ... हाँ, ठीक है। मैं पिता जी को बता दूँगी। यह अजनबी कौन है ?“ डोना, पाउला की ओर इशारा करके पूछती है।
“मोजम छेदो।“ 1⁄4मेरा लड़कां1⁄2
डोना बग़ैर आँखें झपकाये एकटक पाउला की ओर देखती रहती है, “पिता जी कहते थे कि हमें एक घरेलू नौकर की ज़रूरत है। अगर यह खाली है तो उसको महल में भेज देना। बांका जवान है। मैं इसकी सिफारिश कर दूँगी।“
“देव बरोम कोरम।“ 1⁄4धन्यवाद।1⁄2 पाउला का मछेरा पिता कहता है।
“तुका मेलो कुशल ज़लो।“ 1⁄4तुझसे मिलकर खुशी हुई।1⁄2 पाउला को नखरे से कोंकणी भाषा में यह कहकर डोना अपनी जूती पहनती है और वहाँ से चल पड़ती है। मछेरे मछलियाँ संभालने लग जाते हैं।
जाती हुई डोना कई बार पीछे मुड़कर पाउला की तरफ देखती है और हर बार उसको पाउला पहले से भी अधिक दिलकश दिखाई देता है। वह अपने आपको पाउला की ओर आकर्षित होने से रोक नहीं पाती। पाउला भी डोना की शोख अदाओं की कुंडी में फंसकर रह जाता है।
शाम के समय पाउला उम्दा मछलियों की टोकरी लेकर वाइसराय के किले में चला जाता है। किले में बने आलीशान महल की ड्यौढ़ी पर पाउला का सबसे पहले सामना डोना से होता है।
“आ गया ? मुझे पता था। तू ज़रूर आएगा।“ डोना, पाउला पर मुस्कराहट बिखेरती है।
पाउला डरता और झिझकता हुआ गर्दन झुका लेता है, “जी, ये लाट साहिब के लिए नज़राना लेकर आया हूँ।“
“अंदर ले आ।“
डोना आगे आगे और पाउला उसके पीछे पीछे महल के अंदर चले जाते हैं। पाउला मछलियों वाली टोकरी वाइसराय के कदमों में रखकर सिर झुकाकर वायसराय को सलाम करता है। वाइसराय नौकर को आवाज़ देकर उस टोकरी को बावर्चीखाने में ले जाने के लिए कहता है।
पाउला वाइसराय से विदा होने की अनुमति मांगकर जाने लगता है तो डोना उसको रोकती हुई कहती है, “ज़रा ठहरो !... पिता जी यह वही है जिसके बारे में मैंने जिक्र किया था।“
“ओ... अच्छा-अच्छा।“ वाइसराय पाउला की ओर सिर से पांव तक निहारता है।
“हूँ ! काठी और डीलडौल तो तेरी सुंदर है जवान ! क्या नाम है
तेरा ?“
“मोजम पाउला।“ 1⁄4मेरा नाम पाउला है।1⁄2
“क्या किया करता है ?“
“जी, परदेश से अभी वापस आया हूँ। करना क्या है ? वही करूँगा
जो बाप दादा करते आए हैं। पुश्तैनी व्यवसाय मछलियाँ पकड़ने का... और क्या।“ पाउला दयनीय-से स्वर में उŸार देता है।
“देख भई, पाउला। हमें बंदरगाह पर माल ढोने-उतारने और घरेलू चाकरी के लिए एक मजदूर की ज़रूरत है। तुझे पक्की तनख्वाह देंगे और खाली समय में तू मछलियाँ पकड़ने चले जाया करना। बोल मंजूर है ?“ वाइसराय अपनी गरजदार और रौबदार आवाज़ में बोलता
है।
“हुजूर ! आप माई बाप हो, मैं आपको इन्कार करने वाला कौन होता
हूँ। जो आपका हुक्म, सिर माथे पर।“
“ठीक है, कल से तेरी नौकरी पक्की। सवेरे तड़के ही हमारे पास
हाजि़र हो जाना।“
“जी जनाब।“ कहकर पाउला वहाँ से चला जाता है। जैसे ही वह
महल से बाहर दहलीज पर पैर रखता है तो पीछे से एक मद्धम सी आती है। “रे मछेरे... तू नहीं जानता कि तूने आज कितनी कीमती और बड़ी
मछली फंसाई है।“
पाउला पीछे मुड़कर देखता है। डोना खड़ी होंठों में मुस्करा रही है।
उसको डोना का चेहरा बहुत ही हसीन, मासूम और प्यारा लगता है। वह एकपल मोहित होकर डोना को देखकर मंद मंद मुस्काता है। पर फिर अगले ही पल संभलकर उससे नज़रें चुरा लेता है। डोना दरवाज़ा भिड़ाकर बन्द कर देती है। डोना का अंग अंग नृत्य करने लगता है।
महल में से निकलकर पाउला अपनी झोंपड़ी में जाने की बजाय समुद्र की ओर चल पड़ता है। कुछ देर पहले सारा दिन मछलियाँ पकड़ते रहने के कारण उसके हाथ-पैर दुखते हैं, पर अब मानो उसकी सारी थकावट न जाने कहाँ गायब हो गई हो। पाउला को अपने अंगों में नवीन जोश का संचार होता अनुभव होने लगा।
समुद्री तट पर लहरों को साहिल के साथ अठखेलियाँ करते देखता हुआ वह अपने और डोना के भविष्य के बारे में सोचने लग पड़ता है।
आज पाउला के बापू ने पाउला को बताया था कि डोना बचपन में अपने पिता के साथ पुर्तगाल से यहाँ गोवयम 1⁄4गोवा1⁄2 आ गई थी।
“क्या वह एक दिन वापस अपने देश चली जाएगी ?“ पाउला ने अपनी शंका निवृŸिा के लिए बापू से पूछ लिया था।
“ईश्वर जाने। हो सकता है, लाट साहिब को हाकिम वापस बुला ले और फिर तो सारे परिवार को भी उसके साथ ही अपने देश लौटना पड़ेगा।“
इस प्रकार के विचारों से जूझता हुए पाउला समुद्र की आती जाती लहरों की ओर दृष्टि गड़ाकर उनमें से अपनी आने वाली जि़न्दगी के अर्थ तलाशने लग पड़ा।
एक ज़ोरदार लहर समुद्र में से आती और किनारे के साथ दौड़कर बगलगीर होती... सूखी रेत को गीला करके उससे पल्लू छुड़ाकर वापस फिर समुद्र में जा मिलती। पाउला अपनी, डोना की और पुर्तगाल की क्रमशः तट, लहर और समुद्र के साथ कल्पना करने लग पड़ता है। ऐसा सोचते हुए उसका दिल डूबने लगता है और उसको बचपन के समय में अपनी माँ से सुनी शिवजी और पार्वती की कहानी याद आ जाती है। जब शिव जुए में अपनी पत्नी पार्वती से हार जाता है और अपनी हार की निराशा को न सहन करते हुए धरती के इसी टुकड़े गोवाप्रस्थ 1⁄4गोवा1⁄2 पर बनवास काटने आ आ जाता है। फिर पार्वती उसको ढूँढ़ती हुई यहाँ पहुँच जाती है और शिव को वापस अपने संग ले जाती है। इस खयाल के साथ पाउला अपने आप को शिव और डोना को पार्वती समझने लग पड़ता है। उसको पुर्तगाल अपना देश लगने लग पड़ता है जहाँ डोना उसको अपने साथ ले जाएगी। पाउला को हौसला हो जाता है और वह रेत पर से उठकर अपनी झोपड़ पट्टी की ओर चल पड़ता है।
रात में धरती की छाती पर लेटा पाउला काफ़ी देर तक करवटें बदलता रहता है। उसकी आँखों में नींद का कोई नामोनिशान नहीं होता। बार बार डोना का कहा वाक्य ‘रे मछेरे, तू नहीं जानता कि तूने आज कितनी कीमती और बड़ी मछली फंसाई है !’ उसके कानों में मिसरी घोलता रहता है। पाउला चाहे पलकें बन्द करता या खोलता, उसको दोनों ही अवस्थाओं में डोना का मुस्कराता चेहरा झिलमिलाता नज़र आता। कभी कभी वह एक तरफ झुककर अपना हाथ ज़मीन पर फेरता तो भूरी रेत पर फिरते उसके हाथ को महसूस होता मानो वह डोना के कोमल बदन को सहला रहा हो। उसको एक खुमार-सा आने लगता और वह डोना की वहाँ उपस्थिति की कल्पना करके पेट के बल लेट जाता और डोना के ऊपर लेटा हुआ होने की कल्पना करने लग पड़ता। इस तरह ख्वाबों, खयालों की बुनती बुनते हुए उसकी रात गुज़र जाती है।
पौ फूटते ही पाउला उतावला होकर महल जा पहुँचता है। इस सुंदर महल को विशाल किले की चारदीवारी में बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिल शाह ने बनवाया था। किले के चारों ओर सुरक्षा के लिए एक गहरी खाई है जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है। किले के मीनार दूर से ही दिखाई पड़ते हैं।
वाइसराय का एक अधिकारी पाउला को बागवानी के कुछ काम करने का आदेश देकर महल के अंदर चला जाता है। फूल बूटों को पानी देते हुए डोना के दीदार की इच्छा में पाउला की नज़रें बेलगाम होकर बार बार महल के दरवाज़े की ओर उठती हैं। हर बार पाउला को दोनों किवाड़ जब बन्द दिखाई देते हैं तो वह घोर निराशा में डूब जाता है। पौधों की गुड़ाई करके बाग को संवारते हुए पाउला को आधा दिन बीत जाता है। गरमी पूरे ज़ोरों पर होती है। उसका पूरा शरीर पसीने से भीग जाता है। दम लेने के लिए वह काम बीच में ही छोड़कर खड़ा हो जाता है और एक हाथ से माथे पर चुहचुहाते पसीने को ज्यों ही पोंछते हुए ऊपर की तरफ देखता है तो महल की छत पर उसको गीले बाल कपड़े से पोंछ रही डोना दिखाई दे जाती है। ज्यों ही वह बेहद आकर्षक रुई के फाहे जैसे रंग वाली डोना को देखता है तो खुद-ब-खुद उसके हाथों से खुरपा छूट जाता है और उसके पैर पर आ बजता है। खुरपे की चोट से उसका ध्यान डोना की ओर से हटकर अपने पैर की ओर चला जाता है। यह दृश्य देखकर डोना खिलखिलाकर हँस पड़ती है।
पाउला नीचे ज़मीन पर बैठकर अपने पैर को दबाने लग पड़ता है। पाउला के पैर में से निकलता लहू देखकर डोना घबरा जाती है और उसके धुर अंदर से एक आह निकलती है। दूर बैठे होने के बावजूद पाउला को डोना के मुख से निकली ‘आह’ की आवाज़ इतनी ऊँची और स्पष्ट सुनाई देती है मानो किसी ने उसके कानों के करीब नगाड़ा बजाया हो। इस ‘आह’ शब्द का कोई अनुवाद नहीं है। शायद यह एक ऐसी आवाज़ है जो अपने को चोट लगने पर मनुष्य के मुँह से अपने आप और अचानक ही निकल जाती है।
पाउला मुट्ठी भरकर घास की कोंपलें तोड़ता है और अपने ज़ख़्म पर मलकर खून को बहने से रोकने का यत्न करता हुआ वापस फिर चैबारे की ओर झांकता है। डोना वहाँ से लुप्त हो चुकी होती है। अगले ही पल महल में से एक नौकर आता है और पाउला की मल्हम-पट्टी कर देता है। कुछ देर आराम करने के पश्चात पाउला पुनः अपने काम में जुट जाता है।
दिन भर पाउला थोड़ी थोड़ी देर बाद महल के दरवाज़े और छत की ओर देखता रहता है। किंतु उसको फिर डोना नज़र नहीं आती। शाम ढलने पर काम से छुट्टी करके वह घर चला जाता है।
अगले रोज़ पाउला अपने अंदर एक नया उत्साह लेकर महल में पहुँचता है। वाइसराय का खादिम पाउला को गऊशाला की देखभाल की जिम्मेदारी देकर चला जाता है। पाउला सारा दिन गऊओं को चारा डालते, उनका गोबर कूड़ा करते अनेक बार महल की ओर झांकता है। उसको डोना की एक भी झलक दिखाई नहीं देती। उससे अगले दिन पाउला को महल के साथ बने गोदाम में लगा दिया जाता है। दिनभर ढुलाई-उतराई करते पाउला डोना को तलाशता रहता है। काम बेशक वह गोदाम मंे कर रहा होता है, पर आँखें उसकी महल की ओर ही लगी रहती हंै। लेकिन डोना की एक झलक भी उसको नसीब नहीं होती।
कई दिन बीत जाते हैं। पाउला महल के इर्द गिर्द अपनी चाकरी में व्यस्त रहता है, पर डोना के दर्शन उसके लिए दुलर्भ हो जाते हैं। वह मायूस हो जाता है। काम करने में उसकी वो पहले वाली चुस्ती-फुरती भी नहीं रहती। वह अपने आप को निर्जीव और उत्साहहीन अनुभव करने लग पड़ता है।
इस प्रकार आदिलशाही किले 1⁄4अब वह किला खंडहर बन चुका है1⁄2 में महल के आसपास चाकरी करते हुए पाउला को कई दिन बीत जाते हैं। हर गुज़रते दिन के साथ पाउला की डोना को देखने की हसरत बढ़ती रहती है। लेकिन पाउला के लिए डोना का मुखड़ा देखना एक अनबुझी पहली बनी रहती है। पर वह मछेरों वाली आदत के अनुसार आशा के जाल की रस्सियाँ नहीं छोड़ता, मछली कभी भी ऊपर आ सकती है। और फिर, मछली और मौत कभी भी बता कर नहीं आतीं।
बरसात शुरू होने से मछली बूचड़खाने में मछलियों की किल्लत आ जाती है। जिससे वाइसराय की आमदनी भी कम हो जाती है। वाइसराय पाउला को मछलियाँ पकड़ने के लिए कुछ दिनों की छुट्टी दे देता है। पाउला अपने बापू के साथ रोज़ मछलियाँ पकड़ने जाने लग पड़ता है।
महल के चारों ओर काम करते पाउला को खिड़की में से देखकर ही डोना को अजीब सा सुकून और आनन्द अनुभव हुआ करता था। पाउला के पैर पर खुरपा लगने की घटना के बाद कभी भी उसने पाउला का सामना नहीं किया था। डोना के दिल को यह गवारा नहीं है कि वह अपने प्रिय को कोई चोट पहुँचाये। पाउला सारा दिन उसकी आँखों के सामने होता था। बस, इतनी बात ही डोना को अकथनीय खुशी प्रदान करने वाली होती थी।
पर अब जब कई दिनों से पाउला उसको दिखाई नहीं दिया तो डोना पाउला को देखने के लिए तड़प जाती है। उसको जब पता चला कि पाउला मछलियाँ पकड़ने जाने लग पड़ा है तो एक दिन वह व्याकुल होकर समुद्र तट पर चली जाती है। सौभाग्य से पाउला की नाव किनारे पर आकर लगी ही होती है। पाउला और उसके साथी मछेरे रस्से, मछलियाँ पकड़ने वाली कुंडियाँ, जाल, लोहे के डंडे, मछलियाँ मारने वाले बरछे, भाले और मस्तूल के इर्द गिर्द लिपटा हुआ बादबान आदि सामान एकत्र कर रहे होते हैं।
डोना दूसरे मछेरों के साथ गप्पें मारने के बहाने पाउला के साथ भी बातचीत करती है तो उसके मन को चैन आ जाता है।
इसके उपरांत डोना यह अपना नित्यनेम बना लेती है। नित्य दोपहर को डोना सैर के बहाने महल में से निकलती और ऊँची पहाड़ी पर खड़ी होकर दूर समुद्र में मछेरों की नावों को देखती रहती है। शाम ढलने पर जब नावें वापस लौटती हैं तो वह पाउला के दर्शन करके महल में वापस लौट जाती है। इस प्रकार दिन महीनों में बदल जाते हैं।
पाउला को देखने, मिलने और रस्मी-सी बातचीत के साथ डोना का दिल नहीं भरता। उसके अंदर पाउला के साथ जी भरकर बातें करने की इच्छा निशदिन दुगनी होने लगती है। मछेरे बहुत हो जाने के कारण बूचड़ खाने में मछलियों की भरमार हो जाती है और मछली की बिक्री कम हो जाती है। मछलियाँ मंडी में बर्बाद होने लगती हैं। वाइसराय मछली पकड़ने पर पाबंदी लगा देता है। मछेरे समुद्र के आसपास भी नहीं भटकते।
डोना को पाउला से मिले कई दिन बीत जाते हैं। वह पाउला को मिलने के लिए मछली की भाँति तड़पती है। जब एक दिन उससे रहा नहीं जाता तो वह पाउला को मिलने के लिए मछेरों की बस्ती में चली जाती है।
खाल उतारी मछलियों के काटे हुए पंख और कांटें अथवा नमक लगाकर धूप में सूखने के लिए डाले गए मांस की दुर्गंध से भी डोना को कतई घिन नहीं आती। मरी मछलियों के खून की बू, निकाली गई अंतडि़याँ और गलफड़ों की सड़ांध भी उसको इत्र की महक जैसी प्रतीत होती है। वह मछेरों के साथ खूब लावनी नृत्य करती, गाती और उनके घर की निकाली काजुओं वाली शराब फेनी भी पीती है। पाउला का परिवार डोना को पकाई हुई मछली, चावल और तले हुए केलों का भोजन करवाता है। पाउला की माँ डोना को न सिर्फ़ नथ और साड़ी उपहार के रूप में देती है बल्कि मछेरों की औरतों की भाँति लांगड़ी ढंग से साड़ी बांधने की विधि भी सिखाती है।
वाइसराय को जब मछेरों की बस्ती में डोना के जाने की ख़बर मिलती है तो वह गुस्से में लाल हो जाता है, “कान खोलकर सुन ले लड ़की ! इन छोटे लोगों को बहुत मुँह नहीं लगाया करते। ये सिर चढ़ जाते हैं। हम रईसों को इनकी झुग्गियों, झोंपडि़यों में जाना शोभा नहीं देता।“
“क्या ये गरीब लोग इन्सान नहीं होते ? हम किसी दूसरी मिट्टी 126 मोरां का महाराजा
और ये किसी और मिट्टी के बने हैं ?“ डोना अपने पिता के साथ जि़रह पर उतर आती है।
वाइसराय मुँह में भरे कड़वे थूक को थूकता है, “जूती की जगह पैर में होती है, सिर पर नहीं। हम शासक हैं और ये हमारे गुलाम हैं। मुझे गुलामों के संग तेरा मेलजोल बिल्कुल पसंद नहीं है। नफ़रत है मुझे इन लोगों से...।“
“नफ़रत तो पिता जी इन लोगों को हमारे साथ करनी चाहिए। हम पुर्तगाल से व्यापार के बहाने इनके देश में आए और धोखे से इन पर हुकूमत करने लग पड़े। हमने यहीं पर अंत नहीं किया। जैसुएट मिशनरी को अपने वतन में से बुलाकर इनका धर्म परिवर्तन भी करवाने लग पड़े। इनको ईसाई बनाने लग पड़े। हमने इनसे इनका हिंदू धर्म छीनकर इन्हें अपना रोमन कैथोलिक मत दे दिया। हमने इनका मंदिर गिराकर वहाँ अपना ‘अवर लेडी आॅफ़ मिर्कल्ज’ 1⁄4मापसा, गोवा में स्थित यह चर्च 1594 में बना था।1⁄2 चर्च बना लिया। क्या इन लोगों ने कभी विरोध किया ? फिर इनके साथ नफ़रत क्यों ? दिनभर मौत के साथ खेलकर मछलियाँ पकड़ने के लिए मेहनत ये करते हैं और आराम से बैठकर फल हम खाते हैं। नफ़रत तो इन्हें हमसे करनी चाहिए।“
“मैं कुछ नहीं जानता। बस, आज के बाद मछेरों की बस्ती में नहीं जाएगी तू। समझा !“ वाइसराय अपना हुक्म डोना पर झाड़ देता है।
“ठीक है पिता जी, मैं नहीं जाऊँगी। पर कभी कभी महल की चारदीवारी में मेरा सांस घुटने लगता है। मैं अपने आप को कैद में महसूस करने लग पड़ती हूँ।“
“मैं तुझे महल से बाहर जाने के लिए तो नहीं रोकता। जब तेरा दिल करे, तू बाहर जाकर सैर कर आया कर। ताज़ी हवा खाने से दिमाग तंदरुस्त रहता है।“
डोना अपनी अगली चाल चलती है, “मेरा समुद्र की सैर करने को भी बड़ा मन करता है।“
“ठीक है, मैं तेरे लिए रोज़ाना समुद्र की सैर के लिए कोई प्रबंध कर देता हूँ।“
वाइसराय संदेश भेजकर पाउला को बुला लेता है और डोना को रोज़ समुद्र की सैर करवाने का आदेश दे देता है।
पाउला बिला नागा डोना को अपनी नाव में बिठाकर समुद्र की सैर करवाने ले जाने लग पड़ता है। दूर समुद्र में नाव खड़ी करके वह जी भरकर बातें करते रहते हैं। उनकी बातें मौसम या लहरों की गहराइयों से आरंभ होकर एक-दूजे तक पहुँच जातीं। कभी कभार उठने वाले चक्रवातों को छोड ़कर आमतौर पर समुद्र शांत होता है। दिन, महीनों, सालों में उनका प्रेम अंकुरित होता हुआ एक घना वृक्ष बन जाता है। समय अपनी गति से चलता रहता है और डोना व पाउला का प्यार समय के साथ कदम मिलाता अपनी चाल चलता चला जाता है।
पुर्तगाल के एक धनाढ़य व्यापारी का पुत्र अलवोर का सामंत फ्रैंसिस्को डी टिवोरा वाइसराय के पास जाता है। उसकी योग्यता, हैसियत और रुतबा देखकर सूटो मायओर घराने के चश्मे चिराग फ्रैंसिस्को के साथ डोना का पिता डोना का रिश्ता तय कर देता है। जब डोना को इस बात का पता चलता है तो उसको अकस्मात मुसीबत आ पड़ने के कारण एक भूकंप-सा झटका लगता है। उसने अपनी जि़न्दगी में ऐसी घटना घटने की कभी कल्पना भी नहीं की होती। वह तो पाउला के साथ अपने भविष्य के महल बनाये बैठी है। डोना को इस चक्रव्यूह में से निकलने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता। डोना को इस बात का भी इल्म और अंदाज़ा है कि कि उसका पिता कभी भी उसकी शादी पाउला के साथ करने के लिए सहमत नहीं होगा।
जबरन डोना की फ्रैंसिस्कों के साथ मंगनी कर दी जाती है। डोना कई दिन महल से बाहर नहीं जाती और अपने कमरे में पड़ी दिन-रात रोती रहती है।
पाउला समुद्री तट पर नित्य नाव लेकर डोना की प्रतीक्षा करता रहता है और जब वह नहीं आती तो निराश होकर ढलते सूरज की भाँति ढीला-सा होकर अपने घर की ओर लौट जाता है।
सगाई का कुछ दिन मातम मनाने के पश्चात डोना को पाउला का ख़याल आता है। वह एक शाम को अपनी नौकरानी के माध्यम से पाउला को संदेश भेजती है।
अगली सवेर पाउला नाव के पास डोना का इंतज़ार कर रहा होता है। नाव में सवार होकर वे दोनों समुद्री सफ़र शुरू कर देते हैं। दोनों अपनी अपनी सोच में गुम रहते हैं। न डोना कुछ बोलती है और न पाउला अपनी खामोशी तोड़ता है। सिर्फ़ चप्पुओं के चलने पर लहरों में हुई खलबली की संगीतमयी आवाज़ ही वातावरण में गूंज रही होती है।
मल्लाह बना पाउला चप्पू चलाता रहता है। उसको दिशा की जानकारी लेने के लिए किसी यंत्र 1⁄4कंपास1⁄2 की आवश्यकता नहीं पड़ती। हवा के स्पर्श और बादबान के खिंचाव से ही वह दिशा का अंदाज़ा लगा लेता है।
पाउला के दिमाग में उठापटक चलती है, “कहाँ तू एक मामूली गरीब मछेरा और कहाँ डोना लाट साहिब की पुत्री ! क्या मेल है तुम्हारा ? बस, यह समझ ले, तू साहिल है और डोना मालकिन एक लहर जिसने तेरे साथ आकर मिलना था और तुझ जैसे शुष्क व्यक्ति को मुहब्बत से तर करके वापस समुद्र में जा मिलना था। यही दुनियावी सच है !“
अचानक पाउला नाव को रोक लेता है।
डोना विचारों के संसार से बाहर निकलती है, “नाव क्यों रोक दी ?“ “इससे आगे लाट साहिब का इलाका खत्म हो जाता है।“
“फिर क्या है ? चल, आज मैं बहुत दूर जाकर समुद्र देखना चाहती
हूँ।“ डोना हुक्म सुनाती है।
पाउला आहिस्ता आहिस्ता नाव आगे बढ़ा लेता है। पतवार की हत्थी
को बांह के नीचे रखकर वह नाव चलाता जाता है। धीमी गति में नाव कुछ देर चलती रहती है।
“क्या बात है, तेज़ क्यों नहीं चलाता ? थक गया है तो मैं मदद करूँ ?“
डोना अपनी जगह से उठती है और जाकर पाउला की जांघों के बीच बैठ चप्पू चलाते उसके दोनों हाथों पर अपने हाथ रखकर पाउला की चप्पू चलाने में मदद करने लग जाती है।
पाउला घबरा उठता है, “मालिकन... यह तुम क्या कर रहे हो ? किसी ने देख लिया तो...?“
डोना उसे टोकती हुई कहती है, “शी...ई...! कोई नहीं देखता। यहाँ सिर्फ़ वही दिखेगा, जो हम देखना चाहेंगे।... वो देख... गोवायम यहाँ से तेरी गोद में बैठा कितना खूबसूरत दिखाई देता है। बनाने वाले ने इस धरती को क्या सोचकर बनाया होगा।“
“कहते हैं, मत्स्य पुराण में लिखा है कि भगवान विष्णु के छठे अवतार शिव भक्त परशुराम का जन्म राम चंद्र से भी पहले त्रेता युग में जमदग्नि ब्रावमण और रेणुका के घर में हुआ था। उसने द्वापर युग में कर्ण को अस्त्रविद्या सिखाई थी और उसका भीष्म पितामह से युद्ध भी हुआ था। माता के कुश्क वंश के कारण यह कौशिक वंशी के तौर पर भी जाना जाता था। शिवजी ने वरदान के रूप में इसको दिव्यास्त्र परशु 1⁄4कुल्हाड़ा1⁄2 दिया था। हैवयवंश के राजा अर्जुन ने जब उसके पिता को मार दिया तो उसने पृथ्वी के सारे क्षत्रियों को मारकर खत्म कर दिया और धरती ब्रावमणों को दान में दे दी। दान की हुई धरती पर वह रह नहीं सकता था, इसलिए उसने समुद्र में सात तीर मारे, समुद्र पीछे हट गया। परशुराम ने उस जगह बैठकर तप किया और 96 ब्रावमण परिवारों वहाँ बसाया1⁄4इस स्थान पर अब गोवा का बेनाली भयनऊलनि गांव बसा हुआ है1⁄2। यह गावयम वही स्थान है। उसने इसका नाम गोपकाप्टनम रखा था। महाभारत में इसका नाम गोमानता आता है। फिर कृष्ण ने मगध नरेश जरासंघ को यहाँ पराजित किया तो इसका नाम गोमांचल था। उसके बाद गऊ पालक कृष्ण ने इसको गोपकपुरी के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। गोपकपुरी से बिगड़कर गोवापुरी, गोवमांचल होता हुआ आज यह गोवयम बन गया है।“ बोलते बोलते पाउला रुक कर गहरा सांस लेता है।
डोना पाउला की ओर हैरानी से देखती है, “तुझे यह सब कैसे पता
है ?“
“हमारे पुराने ब्रावमण लोग बताते हैं।“
“यह तो पौराणिक कथा थी। इससे आगे का इतिहास मैं जानती हूँ।
आर्यन लोगों ने यहाँ हिंदू धर्म का प्रचार और प्रसार किया। भोज, छेदी और सारस्वत ब्रावमणों ने उनको भरपूर सहयोग दिया। 321 पू.ई. से 185 पू.ई. तक मोर्या वंश ने गोयवम को अपने कुंतल प्रदेश का अंग बनाये रखा। वे पुन्ना नामक बोधि भिक्षुक को यहाँ पर धर्म फैलाने के लिए लेकर आए।“
“पर बुद्ध धर्म की जड़ें यहाँ लग न सकीं।“ पाउला डोना को बीच में टोकता है।
“हाँ, मैं जानती हूँ। मोर्या वंश के पतन के बाद मराठी साम्राज्य ने आनंद चुट्टू लोगों को हराकर 100 साल राज किया। फिर सतवाहन साम्राज्य से होता हुआ राज भोज वंशियों के पास चला गया जिन्हांेने चंद्रपुर से 300 साल तक शासन चलाया। कोंकण, मोर्या और कादंब लोगों की जद्दोजहज में छठी सदी के अंत में 580 ई. से 750 ई. तक बादामी के राजा चालूकिया ने चमड़े की सिक्के चलाये। आठवीं सदी में सिलहार वंशियों ने सŸाा उनसे छीनकर 200 साल तक अपना कब्ज़ा जमाये रखा। 973 ई. में पुनः चालूकिया ने अपना छिना हुआ राज्य जीत लिया। चालूकिया और सिलहार वंशों की लड़ाई का लाभ उठाकर कादंब वंशी राजा सास्तदेव 979 ई. में काबिज़ हो गया। कादंब वंशियों के 300 साला के शासनकाल के दौरान 1030 ई. तक चंद्रपुर उनकी राजधानी रही। तांबदी सरुला मंदिर के निर्माण के बाद गोपिका को उन्होंने राजधानी बना लिया। 14वीं सदी में मुसलमान हमलावरों की आमद हुई। 1312 ई. में उन्होंने मंदिर गिराकर मस्जिदों का निर्माण प्रारंभ कर दिया। 1327 ई. और 1342 ई. में मुहम्मद तुगलक ने दो आक्रमण करके बड़ी तबाही मचाई। 1352 ई. में यह धरती मुसलमानों के राजप्रबंध के अधीन थी। विजयनगर के सम्राट हरिहर 1⁄4प्रथम1⁄2 ने 1378 ई. में यहाँ अपना कब्ज़ा कर लिया। 100 साल उसका वंश राज करता रहा है। 1469 ई. में ब्रावमण राजाओं ने फिर आक्रमण करने प्रारंभ कर दिए और तीन साल के संघर्ष के उपरांत 1472 ई. को उनके राजा महमूद गावां को विजय प्राप्त हुई। वह केवल बीस वर्ष ही राज्य कर सका और अपना सब कुछ बीजापुर के बादशाह इब्राहिम यूसफ़ आदिल शाह को लुटा बैठा।“ डोना व्याख्यान करती हुई चुप हो जाती है।
पाउला उससे आगे बताने लगता है, “और आदिल शाह से तुम्हारे पुर्तगालियों ने 1509 ई. से 1510 ई. तक राज्य हथिया लिया।“
डोना धैर्य और सहजता से जवाब देने लगती है, “हाँ, तुम सही कहते हो। 1498 ई. में भारत की खोज के लिए निकला हमारा जहाजरान वास्को डी गामा जब यहाँ आया तो देश वापस जाकर उसने यहाँ के गरम मसालों के भंडारों के विषय में ढिंढ़ोरा पीट दिया और अलफान्सो डी अलबूकरक की कमांड के अधीन पुर्तगाली फौजों ने इस धरती पर आकर अपना आधिपत्य जमा लिया। हमने वास्को के नाम पर शहर बसाया। आदिल शाह ने जैसे 1460 ई. में ‘साफा’ जैसी मस्जिदें बनवाईं, उसी प्रकार हम ‘बाम जीसज़’ और ‘से कथीडर्ल’ जैसे गिरजाघर बनवाने लग पड़े। हाँ, बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं इस धरती ने। चल छोड़ इन बातों को। हमने क्या लेना है।“
डोना चप्पू छोड़कर एक अंगड़ाई लेती है और अपनी बाहें पाउला की गर्दन में डालकर उसका सिर अपनी छाती से लगा लेती है, “इससे पहले कि मंडोवी दरिया अरब सागर में आकर समा जाए, मैं जुआरी दरिया को अपने अंदर जज़्ब कर लेना चाहती हूँ।“
“क्या मतलब ?“
“आ, तुझे इसका मतलब समझाऊँ।“ डोना पाउला के हाथ पकड़कर उसको खड़ा कर लेती है और उलटे पांव चलते हुए अपने पहले वाले स्थान पर जा बैठती है। पाउला उसके पैरों में घुटने टेककर बैठ जाता है। डोना पाउला के दायें हाथ को अपने बायें हाथ में और उसके बायें हाथ को अपने दायें हाथ में पकड़े अपनी जांघों पर रख लेती है। फिर रफ्ता रफ्ता पाउला के हाथों को सरकाती हुई अपनी कमर के पास ले जाती है... फिर आहिस्ता आहिस्ता अपने शरीर के साथ स्पर्श करवाती हुई पेट से ऊपर की ओर ले जाने लगती है। रस्सों से भारी मछलियाँ खींचने के कारण पाउला की हथेलियों पर घट्टे उभरे होते हैं और हाथ के पीछे की चमड़ी खुश्क हो चुकी होती है। जब डोना के बदन को सहलाते हुए पाउला के हाथ डोना की छाती तक पहुँचते हैं तो डोरा अपने हाथों के नीचे आए पाउला के हाथों पर दबाव डालकर पाउला को अपनी छातियों को दबवाने का यत्न करती है। पाउला एकदम कांपकर अपने हाथ पीछे की ओर खींच लेता है।
“नारियल नहीं तोड़े कभी ?“ डोना की समुद्र जैसी भूरी आँखों में कामुक आकांक्षाओं का खुल्लमखुला प्रकटीकरण करती कोई शरारत नृत्य कर रही होती है।
“अब तक नारियल ही तो तोड़े हैं। और मैंने कौन सा चोटी पर लगा बेर तोड़ना था।“
“तोड़कर देख ले। चोटी पर लगा बेर तो खुद टूटकर तेरी झोली में गिरने को फिरता है।“ इतना कहते हुए डोना पाउला को नाव में लिटाकर बेतहाशा चूमने लग पड़ती है। पाउला से भी अपने भीतर ठाठें मारता वेग रोका नहीं जाता। वह अपने ऊपर पड़ी डोना के नाजुक बदन को कसकर अपनी बाहों में भींच लेता है। डोना पहले पाउला के कुरते की डोरियाँ तोड ़कर उसको निर्वस्त्र कर देती है और फिर अपने आप को गजब की फुर्ती के साथ निर्वस्त्र करती हुई पाउला के शरीर के साथ मनमर्जियाँ करने लग पड ़ती हैं।... पाउला के होंठ डोना के जिस्म से यूँ फिसलते हैं जैसे खोपे के तेल वाले हाथों से शिंगाड़ा मछली फिसलती है।
गायक पंछी नाव के ऊपर नीचे होकर उड़ता हुआ चहचहाता रहता है। यह चहक किसी सुरबद्ध गीत जैसी होती है। मद्धम मद्धम बहती पवन और समुद्री लहरें भी संगीतमयी वातावरण सिरजने में अपना भरपूर योगदान देती हैं। आकाश में बनी चितकबरी बदलियाँ उन दोनों पर छत की भाँति तन जाती हैं। स्थिर खड़ी नाव हिचकोले खाने लगती है।...
... कुछ देर बाद दोनों जवान जिस्मों के अंदर आया ज्वारभाटा शांत हो जाता है।
पाउला की छाती पर नींद में उंघती डोना पर जब बादलों की हल्की-हल्की बूंदें पड़ती है तो वह आँखें खोलकर पहले आसमान की ओर देखती है, फिर पाउला की आँखों में आँखें डालकर नशीली सी आवाज़ में बोलती है, “चलें ?“
“चलो।“
उठकर दोनों कपड़े पहनते हैं और नाव किनारे की ओर खिसकने लगती है।
डोना के मुखड़े पर लालिमा छा जाती है और उसका रूप पहले से अधिक निखर उठता है। पाउला भी ठुमकती पवन की तरह अपने आप को तरोताज़ा अनुभव करता है। बादलों में से झांकती सूर्य की किरणें पानी को रंगीन शीशा 1⁄4प्रिज़्म1⁄2 बनाकर पेश कर रही होती हैं। डोना को पानी में रंगीन बुलबुले और समुद्री वनस्पति बड़ी मनमोहक लगने लगती है।
पाउला को देख देख डोना शर्म से सुर्ख होते जा रहे अपने चेहरे का 131 मोरां का महाराजा
रंग बदलने के मकसद से पूछती है, “तुम मछलियाँ कैसे पकड़ते हो ?“
“मछलियाँ पकड़ने के बड़े दांव-पेच होते हैं। मैं तो कहता हूँ, यह एक हुनर, एक कला है। ऐसे समझ में नहीं आएगा, मैं तुझे दिखाता हूँ।“ पाउला आहिस्ता से चप्पुओं को नाव में रख देता है और करीब पड़ी पोटली में से चोगा निकालकर चार हज़ार फुट से भी अधिक गहरे समुद्र की भंवर बनाती लहरों में चोगा बिखेर देता है। मछलियाँ समुद्री तल और हर स्तर से ऊपर की ओर आकर पाउला की नाव के इर्द गिर्द तैरने लगती हैं। पाउला नर मछलियों की फुंकारों और मादा मछलियों की आवाज़ के अंतर से डोना को परिचित करवाता हुआ बताता है कि नर मछली, मादा मछली को हमेशा अपने से पहले चोगा खिलाती है। धोखों, कांटों और फंदांे से दूर गहरे पानी में रहना सर्वोŸाम मछली की खसलत 1⁄4आदत1⁄2 है। मछली समुद्र मे जितना गहरा उतरती जाती है, उतना ही बड़ी मछलियों द्वारा उसके शिकार का खतरा कम होता जाता है। पाउला कौड, मैडोक, शिकारी, झिंगारा, शार्क, डाल्फिन, शरिंप, ऐलबोकर आदि मछलियों की सारी किस्मों से डोना को परिचित करवाता है।
मछलियों का झुंड देखकर पाउला एकदम पानी में झपट्टा मारकर आँख के फेर में हाथ बाहर निकाल लेता है। उसके हाथ में जीती-जागती मछली होती है।
“यूँ पकड़ते हैं हम मछली।“ मछली पाउला के हाथ में से छूटने के लिए छटपटा रही होती है।
डोना दंग रह जाती है। पाउला तड़पती हुई मछली को करीब रखी नमक पेटी में फेंककर दुबारा चप्पू चलाने लग पड़ता है।
हवा का एक ज़ोरदार झोंका आता है और डोना के गले में पहना हुआ रुमाल उड़ाकर ले जाता है। पाउला समुद्र में गिरे रुमाल को देखते ही तुरंत पानी में छलांग लगा देता है और डोना की अमानत उसको लाकर देता है।
“मुझे नहीं पता था कि तुझे तैरना भी आता है। एक मामूली कपड़े के टुकड़े की खातिर तूने अपनी जान जोखि़म में क्यों डाली ? अगर तू डूब जाता ?“ डोना गीले रुमाल को निचोड़ती है।
“तैरना तो हम मछेरे अपनी माँ के पेट में से ही सीखकर आते हैं।
“मैंने सुना है, समुद्र बड़ा ज़ालिम होता है।“
पाउला गंभीर सुर में बोलता है, “नहीं, समुद्र तो हमारी माँ है। यह निर्दयी
कैसे हो सकता है। हमें खाने को दो वक्त का आहार देता है। स्पेनी लोग समुद्र की तुलना औरत से करते हुए इसको ‘लामार’ कहते हैं। वह प्रेमिका औरत जो उपहार देती है। अगर वह रूठती या नाराज़ होती है तो इसके पीछे भी कोई कारण होता है या उसकी मजबूरी। कभी रात को चाँद की चाँदनी में देखना, समुद्र तुझे महबूब की तरह हसीन दिखाई देगा। चाँद समंदर को यूँ प्रभावित और आकर्षित करता है जैसे औरत को एक मर्द। समुद्र वेश्या की भाँति होता है, जो हर आए ग्राहक को खुश करके भेजता है।
“भविष्य में यह काम न करना। मैं तुझे बहुत प्यार करती हूँ।“ “ठीक है नहीं करता।“
डोना इसरार दिखाती है, “खा मेरी कसम ?“
“तेरी कसम।“ पाउला अपनी गर्दन की घंटी को पकड़कर कहता है।
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं। धीमी गति से चलती नाव किनारे पर
आ लगती है।
डोना और पाउला हर रोज़ समुद्री सैर के लिए आते और रूहों को तृप्त
करके वापस लौट जाने का एक नियम बना लेते हैं।
पाउला मुलाकात के समय डोना को मछली के तेल का प्याला पेश करता
हुआ एक दिन बताता है कि सभी मछेरे तड़के खाली पेट यही तेल पीकर घर से निकलते हैं। यह तेल महज ठंड और बुखार से ही रक्षा नहीं करता, बल्कि शरीर को शक्ति भी देता है और आँखों के लिए भी लाभकारी होता है।
पाउला चुस्कियाँ लेती हुई तेल पी लिया करती है। उसको तेल के स्वाद से बिल्कुल भी घृणा नहीं आती। कई बार पाउला डोना को भूनी हुई ठोस, तासीर की ठंडी टिऊना मछली का जायका भी चखा दिया करता है।
बरसात का मौसम यौवन पर होने से दिन रात बारिश होने लगती है। डोना और पाउला का मिलना बन्द हो जाता है। पाउला डोना को मिलने के लिए अपनी योजनाएँ बनाता रहता है और डोना पाउला को मिलने के लिए अपने मंसूबे घड़ती रहती है। पर दोनों प्रेमियों को कोई सफलता नहीं मिलती।
पाउला महल के नज़दीक समुद्र के तट पर अपनी नई झुग्गी बना लेता है। और एक रात उसकी झुग्गी में साड़ी पहने, घूंघट निकाले एक औरत प्रवेश करती है। घूंघट में से केवल उस औरत का नाक ही दिखाई देता है जिसमें नथनी चमक रही होती है। पाउला उस औरत को पहचान नहीं पाता। जब वह घूंघट उठाती है तो पाउला मछियारिनों के लिबास में डोना को देखकर दंग रह जाता है। वह भागकर डोना से लिपट जाता है।
... बाहर मूसलाधार पानी बरस रहा होता है और अंदर एक बदन हुई दो रूहें छराटे से बरसती रहती हैं... इस प्रकार हर रात को वह शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तृप्ति की पूर्ति के लिए कार्यशील रहने लगते हैं। सागर तट पर ताड़ अथवा खजूर के सख़्त टहनों और फैलाकर जोड़े गए सख़्त रेसेदार पŸाों की बनी झुग्गी की रेतीली ज़मीन रात के अँधेरे में भी हीरों की भाँति चमकती है। वह चाँदी रंगी रेत पर आनन्द-प्रमोद के नशे में लेटे अपने आप को जन्नत में पहुँचा हुआ अनुभव करते।
डोना नित्य आधी रात को मछियारिन के भेष में पाउला के पास आती है और दिन चढ़ने से पहले ही झुग्गी में से खिसक जाती है। दिन चढ़ते ही वह महल के अपने कमरे में पड़ी होती और दोपहर तक सोयी उठने का नाम न लेती।
डोना के दिनभर सोते रहने से फ्रैंसिस्कों को शक हो जाता है। उसके शक की दूसरी और अहम वजह भी होती है कि जब भी वह डोना के प्रति अपना प्रेम प्रकट करना चाहता तो डोना नाक-मुँह सिकोड़कर उसका तिरस्कार कर देती। फ्रैंसिस्को डोना की हरकतों और गतिविधियों पर नज़र रखना प्रारंभ कर देता है। इस बात से बेखबर डोना जब एक रात पाउला से मिलने जाती है तो फ्रैंसिस्को उसका पीछा करता करता पाउला की झोंपड़ी तक पहुँच जाता है। वह डोना और पाउला की मुहब्बत करते समय पैदा होने वाली आवाज़ों को जब अपने कानों से सुनता है तो उसकी छाती पर सांप लेटने लग जाते हैं। वह इस मामले के बारे में किसी को कुछ नहीं बताता। कुछ दिन वह निरंतर रात के समय डोना का पीछा करता रहता है।
फ्रैंसिस्को के लिए सहन करना कठिन हो जाता है तो वह एक दिन वाइसराय को डोना और पाउला के इश्क की सारी कहानी सुना देता है।
वाइसराय अपने कुछ खास भरोसेमंद व्यक्तियों के साथ पाउला को सागर में से मछलियाँ पकड़ने भेज देता है। मछेरे शाम को वापस लौटकर यह ख़बर फैला देते हैं कि पाउला समुद्र में डूब गया। सब लोग इस समाचार पर आँखें मींचकर विश्वास कर लेते हैं। लेकिन डोना का मन यह बात मानने को तैयार नहीं होता क्योंकि वह जानती है कि पाउला एक बढि़या तैराक है।
डोना पाउला द्वारा तोहफे में दी गई पवित्र मोतियों की माला पहनकर रोज़ ऊँची पहाड़ी पर चढ़ समुद्र में से पाउला के सही-सलामत लौट आने की प्रतीक्षा करती रहती है। कुछ दिन बाद समुद्र में एक भारी तूफान आता है और जब तूफान थम जाता है तो समुद्र के किनारे एक व्यक्ति मरा पड़ा होता है जिसकी बाजू पर वही काला तावीज़ बंधा होता है जो पाउला ने बांध रखा था। मछेरे पाउला की लाश को उठाकर ले जाते हैं और पाउला के परिवारवाले उसका अन्तिम शोक मनाने लग पड़ते हैं।
डोना को पाउला की मौत के बारे में पता चलता है तो वह विलाप करने लगती है। उसको विलाप करती देखकर फ्रैंसिस्कों डोना से मुखातिब होता है, “मछेरे की याद में आँसू बर्बाद न कर। संभालकर रख ये मोती, उम्र भर तेरे काम आएँगे। मछेरे को तो हमने मछली की तरह तड़पा तड़पाकर मारा है। बोल, तेरे साथ क्या सलूक किया जाए ?“
डोना आँखें गड़ाकर फ्रैंसिस्कों की ओर देखती है, “तुमने पाउला को मारा है ? क्यों ?“
“हाँ, वह अपनी औकात भूल बैठा था। जैसे तुम भूल चुकी हो। मैं तुम्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता था। महल में बसाना चाहता था। तू सिर्फ़ मेरी रखैल बनने के काबिल है। अब सारी उम्र सिर्फ़ तुझे अपने शुगल के लिए इस्तेमाल करूँगा। आराम से पुर्तगाल जाकर अपनी किस्मत को रोती रहना।“ फ्रैंसिस्को ज़ोर ज़ोर से शैतानी हँसी हँसने लगता है।
फ्रैंसिस्को के मुँह से ये सब सुनकर डोना सुन्न हो जाती है। उसका सारा वजूद इस प्रकार पथरा जाता है मानो वह इन्सान नहीं, पत्थर का कोई बुत हो।
डोना को पाउला के इश्क के बिना अपना जीवन व्यर्थ प्रतीत होने लग
पड़ता है। आधी रात को वह पहले की भाँति महल में से निकल पड़ती है। फ्रैंसिस्को भी उसके पीछे पीछे चल पड़ता है। जब चलती हुई डोना पहाड़ी की चोटी के पास पहुँचने लगती है तो फ्रैंसिस्को दौड़कर जाता है और डोना को पकड़ लेता है, “कहाँ जा रही है ?“
“जहाँ तुमने मेरे प्रेमी को पहुँचाया है। तुम क्या समझते हो, तुम हमें एक होने से रोक लोगे ? यह तुम्हारा महज भ्रम है। मेरी मुहब्बत या किस्मत का निर्णायक तुम्हें किसने बनाया है ?“
डोना फ्रैसिस्को से अपना हाथ छुड़ाकर पहाड़ की चोटी की ओर भागती
है।
फ्रैंसिस्को दौड़कर डोना को दबोच लेता है। हाथापाई में डोना फ्रैंसिस्को
को अपने नाखूनों से नोंच लेती है। फ्रैंसिस्को को गुस्सा आ जाता है और वह डोना के वस्त्र फाड़कर उसके साथ ज़ोर-जबरदस्ती करता है।
डोना ज़मीन पर निर्वस्त्र पड़ी रो रही है। डोना के तन पर एक भी कपड़ा नहीं होता, सिवाय गले में पहनी मोतियों की माला के जो चाँद की चाँदनी में खूब चमक रही होती है। फ्रैंसिस्को डोना को बांह से पकड़कर उठाने की कोशिश करता है, पर वह नहीं उठती। फ्रैंसिस्को उसको घसीटता हुआ पहाड़ की चोटी पर ले जाता है और नीचे समुद्र में धक्का दे देता है।
अगली सुबह डोना की नग्न लाश जिसके गले में केवल मोतियों की माला होती है, समुद्र के किनारे ठीक उसी स्थान पर पड़ी मिलती है, जहाँ कल उसकी बेलिबास मुहब्बत पड़ी थी।
अंतिका: इस घटना के बाद यद्यपि पाउला हिंदू था, पर मछेरे डोना और पाउला को एक ही कब्र में दफ़ना देते हैं। वाइसराय वह कब्र तुड़वा देता है। उसी रात वाइसराय को अधरंग का दौरा पड़ता है। वाइसराय अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए एक लड़की को गोद लेकर पालता है और उसका नाम डोना पाउला रखता है। जब वह लड़की बड़ी होती है तो वाइसराय अपने हाथों उसका विवाह कासपर डिआस नाम के एक मछेरे के साथ कर देता है। उस लड़की से एक पुत्र डोम का जन्म होता है। उस लड़की डोना पाउला की कब्र मौजूदा कैबो राजभवन के कब्रिस्तान में है जिस पर लिखा हुआ है - श्क्वदं च्ंनसं डमदम्रमेए उवजीमत कम क्वउ ।दजवदपव ैवनजव डंपवत रंे दमेजं ेमचनसजनतंण् थ्ंसमबमनंवे 21 कम कमबमउइतव कम 1682ण् च्मकम ीनउ ?चमण् छण्म न्उं ।अम डं चवत ेअं ंसउंण्श् 1⁄4यहाँ डोना पाउला मैनजि़ज, माता डोम ऐनटीनो सूटो माओर हमेशा की नींद में सौ रही है। इंतकाल 21 दिसंबर 1682, ईश्वर उनकी आत्मा को अपने चरणों में स्थान दे1⁄2 डोना और पाउला शारीरिक तौर पर यद्यपि चार सौ साल पहले मर गए थे, पर उनके प्रेम की कहानी को गोवा वासियों ने लोक गाथा बनाकर आज भी अपनी स्मृतियों में संभालकर रखा हुआ है। डोना पाउला की मौत के बाद वाइसराय अपने उस ओडावल गांव का नाम डोना पाउला रख देता है। पुराने बुजु़र्गों का मानना है कि डोना पाउला की आत्माएँ आज भी डोना पाउला समुद्री तट पर भटकती फिरती हैं। अब जब चाँदनी रात में प्रेमियों के स्वर्ग के तौर पर जाने जाते डोना पाउला बीच पर हनीमून मनाने गए किसी जोड़े को गोवा वासी देखते हैं तो उनमें डोना पाउला के अक्स को तलाशते हुए गोवा वासियों की आँखें नम हो जाती हैं।
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