Monday, 4 May 2015

मोरां सरकार -बलराज सिंह सिद्धू, यू.के.


शेर-ए-पंजाबमहाराजा रणजीत सिंह अपनी रखैल मोरां कंचनी के साथ लाहौर के निकट एक हवेली में पड़ा है। उन्हें संभोग किए यद्यपि कुछ पल ही बीते हैं, परंतु उन दोनों की सांसें अभी भी लुहार की धौंकनी की भाँति चल रही हैं।
मोरां के इश्क का नशा महाराजा को फिरंगियों की शराब की तरह दिन में ही चढ़ गया है। अमृतसर के रंडी बाज़ार में नाचने वाली इस नर्तकी मोरां के इश्क में अंधा होकर उसने क्या-क्या नहीं किया है। मोरां के नाम पर मोरांशाही गज़ चलाये जो प्रचलित गज़ों से एक बिलांद बड़े हैं और मोरांशाही नापतोल जो आम नापतोल से भारी होने के कारण कुछ ही दिनों में मशहूर हो गए हैं। मोरां के नाम पर बाग लगवाये। सोने और चांदी के दो सिक्के चलाये। यह बात अलग है कि अभी तक महाराजा ने अपने नाम का एक भी सिक्का जारी नहीं किया है। यहाँ तक कि कई गांवों का नामकरण महाराजा ने मोरां के नाम पर ‘मोरांवाली’ कर दिया है। ऐसा क्या है जो महाराजा ने मोरां का साथ पाने और उसको खुश करने के लिए नहीं किया ? इतना तो कोई राजा अपनी रानी के लिए नहीं करता जितना महाराजा ने नाचने वाली एक कंजरी और अपनी रखैल मोरां के लिए किया है। यहाँ तक कि जब मोरां से मिलना कठिन हो गया था तो महाराजा ने मोरां के घर को जाने वाली सुरंग खुदवा ली थी। इसको लेकर नकलचियों, मिरासियों और कवियों न तो कविŸा भी रच लिए हैं -
होया हनेरा नित ने मिलदे महाराज ते मोरां। धरतों सुरंग कड्ढ़ लई हुशन इश्क दियां चोरां।
मेरां कंचनी के एक नर्तकी होने के कारण सिक्ख सरदारों और महाराजा के परिवार की ओर से बहुत विरोध किया गया है। पर महाराजा ने आज तक किसी की परवाह नहीं की। रानी दातार कौर और रानी महताब कौर को जब महाराजा और मोरां के संबंध अखरने लगे थे तो महाराजा ने उन्हें भी महल से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। लेकिन मोरां को दिल से नहीं निकाल सका था। फिर छिपकर चोरी से मिलने के ज़माने भी बीत गए और महाराजा सरेआम मोरां के साथ का आनन्द लेने लगा। अब तक तो महाराजा जैसे तैसे अपनी मुहब्बत के खिलाफ़ उठने वाली आवाज़ को दबाता आया है, परंतु आज तो अति हो गई। उसको अकाल बुंगे में बुलाकर अकाली फूला सिंह ने मोरां कंचनी के साथ अवैध संबंध रखने पर ‘तनखाहिया’ करार दे दिया, कोड़ों की सज़ा भी सुना दी। यह अलग बात है कि उसकी सज़ा माफ़ कर दी गई और उसने स्वयं एक लाख पच्चीस हज़ार जु़र्माना भरना स्वीकार कर लिया।
अकाल बुंगे में बैठे महाराजा ने यह निर्णय कर लिया था कि वह मोरां के साथ अपना रिश्ता तोड़ लेगा। यूँ ही बात बात पर अपनी कुŸोखानी करवाने का क्या लाभ ? पर रणजीत सिंह को क्या पता था कि लाहौर के पास आते ही उसका चंचल मन फिर भटक जाएगा। उसके कदमों को तो कभी बहते दरिया भी नहीं रोक सके थे। बेरोक, बग़ैर कुछ सोचे समझे उसने अपना घोड़ा हवेली की तरफ़ बढ़ा लिया जहाँ मोरां उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। प्रेम में पागल दो रूहें हवेली का दरवाज़ा खुलते ही आपस में लिपट गई थीं।
महाराजा और मोरां दोनों छत की ओर टकटकी लगाये कुछ सोच रहे हैं।
“महाराज, मैं एक मुसलमान स्त्री और आप सिक्ख पुरुष हो। एक पुरुष प्रधान समाज में अपने संबंधों को लेकर एतराज तो मुसलमानों को करना चाहिए और वे तो चुप हैं। आपके सिक्ख लोग यूँ ही व्यर्थ में ही उछले-कूदे जाते हैं। ऐसा क्यों ?“ मोरां महाराजा की छाती से चिपटती हुई बोलती है।
महाराजा दानिशवरों की तरह उŸार देने लगता है, “दरअसल मोरां, सिक्खों ने कभी राज नहीं किया। सैकड़ों सालों से इन्होंने सिर्फ़ लड़ना और एक-दूजे की पगडि़याँ उतारना ही सीखा है। इसलिए, हुकूमत कैसे की जाती है, इससे ये नावाकिफ़ हैं। बंदा बहादुर से सौ साल बाद केवल मैं अकेला इनका सिक्ख हुक्मरान हुआ हूँ। यही कारण है कि ये मेरी निजी जि़न्दगी पर भी अपना हक़ जताते हैं और मेरे साथ तेरे रिश्ते का विरोध करते हैं। यह तो कुछ भी नहीं मोरां, तू तो जानती है कि राजों-महाराजों के जीवन के बारे में किस्से, कहानियाँ और कविताएँ लिखी जाती हैं। भविष्य में जब भी कोई कलाकार या कलमकार, भले ही सौ-डेढ़ सौ साल बाद बलराज सिंह सिद्धू जैसा लेखक अपने इश्क की कहानी सुनाएगा, ये लोग उसका भी विरोध करेंगे। बेशक तब हम जीवित न हों।“
“आज अकाल बुंगे में क्या हुआ ?“
“होना क्या था। वही हुआ जिसकी मुझे पहले से उम्मीद थी। मुझे तुझसे संबंध रखने से रोका गया है। अब भी मैं सबसे छिपकर तेरे पास आया हूँ। मेरे यहाँ होने के बारे में किसी को भनक तक नहीं है। इसलिए पौ फटने से पहले ही मुझे यहाँ से निकलना पड़ेगा।“
“यह चूहे-बिल्ली वाला खेल और कितने दिन चल सकेगा, महाराज?“
“और एक दिन भी नहीं। मुझे तेरे से हमेशा के लिए यह अवैध रिश्ता खत्म करने का सख़्त आदेश हुआ है।“
“महाराज, मैं आपके बिना एक पल भी नहीं रह सकती। क्या आप मेरे बग़ैर रह लेंगे ?“
“मैं भी तेरे बग़ैर नहीं रह सकता, इसीलिए तो तेरे पास पड़ा हूँ। और मैं यहाँ मक्की बोने तो नहीं आया ?... मोरां मैं सोचता हूँ, हम ये नाजायज़ रिश्ता समाप्त करके विवाह करवा लें। उन्होंने नाजायज़ रिश्ता रखने से रोका है, जायज़ रिश्ते से नहीं।“
“आप सच कहते हैं महाराज... आप मेरे साथ विवाह करवाएँगे ?... खाओ मेरी कसम !“
“कसम गुरू की।“
“फिर आप शीघ्र ही मेरे घरवालों से मेरा रिश्ता मांग लो।“
“हाँ, मैं भी यही सोच रहा हूँ। तेरी माँ तो पागल होकर मर गई थी।
मैं तेरी बहन मोमला को कल ही अमृतसर में बुला लेता हूँ।“
“मोमला नहीं महाराज, आपको मेरे धर्मपिता मियां शमदू से मेरा हाथ
मांगना पड़ेगा।“
“ठीक है, मैं कल ही इसका प्रबंध करता हूँ। तू सुबह होते ही
अमृतसर अपने ठिकाने पर चली जाना। अब मैं चलता हूँ।“
“कुछ देर और ठहरो न महाराज, मुझे ज़रा प्यार तो कर लेने दो।“
वेगमती मोरां महाराजा को दबोचकर चूमना-चाटना प्रारंभ कर देती है और महाराजा भी उस पर जवाबी हमला करते हुए उसके गुलबदन से यूँ लिपट जाता है, जैसे चंदन के वृक्ष से नाग लिपटा होता है।
आत्माओं के तृप्त होने पर महाराजा मोरां को अलविदा कहकर शाही किले की ओर चला जाता है।
महाराजा अगले दिन मियां शमदू को बुलाकर मोरां का रिश्ता मांगता
है तो मियां शमदू के हाथ-पैर फूल जाते हैं। वह कहता है, “महाराज, हम कंजरों की कमाई का एकमात्र साधन तो हमारी लड़कियाँ ही होती हैं। आप लोग लड़का पैदा होने पर शुक्र मनाते हैं, हम लड़की के जन्म पर खुशी मनाते हैं। मोरां को आप रख लेंगे तो मेरा बुढ़ापा बर्बाद हो जाएगा। आप जब भी मोरां का नाच-गाना सुनने के लिए याद किया करेंगे, वो हाजि़र हो जाया करेगी। इसका मैं वायदा करता हूँ। चाहे आधी रात को आवाज़ लगा लेना।“
“मियां जी, मोरां पर लाहौर सरकार का दिल आ गया है। अब आपको कमाई की चिंता करने की ज़रूरत नहीं। आज से तुम्हारा सारा खर्च लाहौर सरकार उठाएगी। हमारे शाही खजाने किसलिए हैं? तुम मोरां के भविष्य के बारे में क्यों नहीं सोचते ? हम उसको दासी नहीं, अपनी शरीक-ए-हयात और अपनी सल्तनत की महारानी बनाने जा रहे हैं। हमारा हुक्म न मानकर तुम हमारी तौहीन कर रहे हो।“
महाराजा रणजीत सिंह के गुस्से से परिचित मियां शमदू घबरा जाता है। वह महाराजा को टालने के लिए बहाना घढ़ता है, “ठीक है, हुजू़र की यही इच्छा है तो मुझे यह रिश्ता मंजूर है। लेकिन हम कंजरों का एक रिवाज़ है कि मोरां के साथ विवाह करवाने के लिए आपको हमारे घर आना होना और ठंडा चूल्हा जलाकर खाना पकाना पड़ेगा।“
“ठीक है, तुम जाकर तैयारी करो। हम परसों बारात लेकर आ रहे
हैं।“
मियां शमदू को पूरा विश्वास होता है कि रणजीत सिंह महाराजा
होने के कारण ऐसा हर्गिज़ नहीं कर सकेगा। सच्चा बनने के लिए वह निकाह के सभी इंतज़ाम कर लेता है। परंतु मोरां को पूर्ण विश्वास है कि महाराजा निकाह के लिए अवश्य आएगा।
सुनिश्चित किए दिन को महाराजा अमृतसर बारात लेकर जा पहुँचता है और चूल्हे में आग जलाने वाली शर्त पूरी करके शाही शान-ओ-शौकत से मोरां के साथ निकाह पढ़ लेता है। हाथी पर बैठकर मोरां और महाराजा सिक्कों की बरसात करते हुए लाहौर राजमहल में आ जाते हैं।
कुछ दिन सुख-शांति से व्यतीत हो जाते हैं तो सिक्ख सरदार फिर नया पंगा खड़ा कर देते हैं कि रणजीत सिंह ने सिक्ख होते हुए निकाह कैसे करवाया लिया ?
इसका तोड़ भी रणजीत सिंह तुरंत ढूँढ़ लेता है और सिक्ख मर्यादा के अनुसार मोरां के साथ दुबारा विवाह करवा लेता है। अब सिक्ख सरदारों के पास महाराजा को मोरां से मिलने से हटाने के लिए कोई बहाना नहीं मिलता। परंतु फिर भी वह गाहे-बेगाहे अपनी भड़ास निकालते रहते हैं।
महाराजा मोरां को हाथी पर बिठाकर कहीं ले जा रहा होता है और बुजऱ् में से निहंग फूला सिंह ताना मारता है, “ओ काणे, किधर सैर करता घ् ाूमता है ? ये झोटा तुझे किसने दिया ?“
“पातशाहो, यह सवारी आपकी ही बख़्शी हुई है। भूल गए?“ महाराजा की हाजि़र जवाबी के आगे अकाली फूला सिंह को कोई बात नहीं सूझती। इस प्रकार के मजाक करने के वे दोनों ही आदी होते हैं। मोरां के पैरों
में घुंघरूओं की जगह अब झांझरें ले लेती हैं।
महाराजा अपनी आरामगाह में मोरां के साथ लेटा चुहलबाजियाँ कर रहा होता है, “मोरां, मैंने तो अफगानों, हमलावरों और शत्रुओं के साथ टक्कर ली है और अपने बाहूबल पर विशाल सल्तनत खड़ी की है। इसलिए मुझे शेर-ए-पंजाब कहा जाता है। शेर जंगल का राजा होता है। ज़रा बता तो तेरा नाम मोरां क्यूँ रखा गया ?“
“महाराज, असल में नाम तो मेरा मुमताज था, पर जब मैंने नृत्य करना शुरू किया तो मेरे उस्ताद मुझे मोरनी की तरह नाचते देखकर मोरनी-मोरनी कहने लग पड़े। फिर आहिस्ता-आहिस्ता लोग मेरा असली नाम भूल गए और मैं मोरां नाम से जानी जाने लग पड़ी।“
“वाह री मोरनी ! और अब शुकरचकिए रणजीत सिंह के महल में नृत्य।“ महाराजा मोरां को कसकर अपनी बाहों में दबोच लेता है। महाराजा जहाँ एक बढि़या योद्धा, जंगजू और निपुण शासक है, वहीं वह संवेदनशील कला प्रेमी और संगीत-रसिया भी है। उसके दरबार में गाने वाली बाइयों और नर्तकियों की संख्या सौ से भी अधिक है। मोरां से मिलने के बाद महाराजा को सब नर्तकियों का नाच फीका और बकबका-सा लगने लग पड़ा है। दरबार में जब किसी नर्तकी का नृत्य पसंद न आता तो महाराजा मोरां से फरमाइश कर देता, “आ मोरां, तू दिखा अपना जलवा।“
बस फिर क्या ? लाहौर दरबार की ज़मीन पर बजती मोरां की ऐड़ी की धमक पाताल तक पहुँच जाती। मोरां का नृत्य देखता महाराजा सरूर में आ जाता। मोरा का नृत्य देखते देखते वह इतना मंत्रमुग्ध हो जाता कि उसको समय के बीतने का भी ज्ञान न रहता। रंडी बाज़ारों में नाचने वाली मामूली मोरां कंचनी से बनी महारानी मोरां के आराम और सुख साधन का हर प्रकार से ख़याल रखा जाने लग पड़ा। कहाँ मोरां वीरवार को दाता गंज बख़्श के मज़ार पर सिजदा करने पैदल जाया करती थी, अब उसके लिए शाही सवारियाँ, हाथी, घोड़े, बग्घियाँ, सेवक और अंगरक्षक एक ताली पर तैयार मिलते हैं। महाराजा से वह जो कुछ कहती है, महाराजा उसको सत्य-वचन कहकर मान लेता है। इससे मोरां के दिमाग में फितूर पैदा हो जाता है। वह बाकी लोगों को कीड़े-मकौड़े समझने लग जाती है।
मोरां अपने धर्मपिता मियां शमदू को मिलने मक्खनपुर, जो लाहौर से कुछ दूर अमृतसर की ओर है, जाती है और मिलने के उपरांत जब वापस महाराजा के पास लौटती है तो बहुत उखड़ी-उखड़ी-सी प्रतीत होती है।
महाराजा उसके स्वभाव में आए इस परिवर्तन को भांपकर उसका कारण पूछता है तो मोरां चेहरे पर उदासी के हाव-भाव दर्शाती हुई कहती है, “क्या बताऊँ महाराज, वो चांदी की कढ़ाई वाली जो कसूरी जूती आपने मुझे तोहफ़े में दी थी न, मोतियों वाली... वो मक्खनपुरा से वापस लौटते हुए लाहौर से बाहर वाले नाले में गिर पड़ी।“
“कौन से नाले में ?“
“वही जो शाहजहाँ ने लाहौर के बाहर शालीमार बागों को रावी नदी का पानी देने के लिए बनाया था। नाले को पार करने के लिए जो लक्कड़ रखी हुई है, उस पर से गुज़रता हुआ मेरा घोड़ा ज़रा डगमगा गया और घोड़े
को काबू में करने के यत्नों में यह सबकुछ हो गया।“
“अच्छा, यह बात है। चलो जूती का क्या है। तू तो बच गई। परामात्मा का शुक्र है, तेरे कोई चोट नहीं लगी। मैं आज ही उस नाले पर पुल बनवाने का हुक्म देता हूँ।“
चंद ही दिनों में उस नाले पर लाहौरी ईंटों के पुल का निर्माण कर दिया जाता है और चूंकि मोेरां के लिए बनाया गया है, इसलिए इसका नाम ‘कंचनी पुल’ पड़ जाता है। परंतु सिक्ख सरदार अक्सर उसको कंजरी पुल कहते रहते हैं, इसलिए आम-अवाम में भी वह पुल ‘कंजरी पुल’ के नाम से प्रचलित हो जाता है। 1⁄4आज भी यह पुल कंजरी मौजूद है और इसके आसपास बसे गांव को भी ‘पुल कंजरी’ कहा जाता है1⁄2।
लाहौर दरबार में मुजरा हो रहा होता है। नर्तकी कौलां और अल्ला जाई 1⁄4अल्ला जुआई1⁄2 में घमासान नृत्य मुकाबला होता है। दोनों एक दूजे से बढ़ चढ़कर नृत्य करती हैं। न कौलां नृत्य करने से हटने का नाम लेती है और न ही अल्ला जाई पीछे रहती है। दोनों नाच नाचकर धरती खोद देती है। अंत में, अल्ला जाई विजयी होती है। महाराजा उसको इनाम में नकदी के अलावा ढेर सारे बहुमूल्य गहनों से नवाज़ता है। “खुश हो अल्ला जाई ?“ महाराजा एक और कीमती हार उसकी ओर बढ़ाते हुए कहता है।
“महाराज, आज तक आपके दर से कोई नाराज़ होकर गया है भल?“
अल्ला जाई नखरे से जवाब देती है और महाराजा खुशी में फूल जाता है, “अल्ला जाई, यह फैसला तो हम आज कर देते हैं कि हमारे दरबार की सर्वोŸाम नर्तकी तू है। अब तू बता, हमारी सभी रानियों में सबसे सुन्दर रानी कौन सी है ?“
“महाराज, गुस्ताखी माफ़ हो। पर मैं इस सवाल का जवाब नहीं दे
सकती।“
“वह क्यों ? क्या यह सवाल कोई ज्यादा कठिन है ?“ महाराजा माथे
पर बल डाल लेता है।
“कठिन ही नहीं महाराज, ख़तरनाक भी है।“
“वह कैसे ?“
“क्योंकि मैं जिस रानी का नाम लूँगी, वो तो खुश हो जाएँगी, पर
बाकी की सभी रानियाँ नाराज हो जाएँगी। मैं एक को खुश करके बाकी रानियों से वैर नहीं ले सकती।“
“ओह, तू घबरा न अल्ला जाई। जवाब तो तुझे देना ही पड़ेगा।“
“महाराज, वैसे कम तो कोई भी नहीं। हाँ, रानी राज बंसो समझो सभी रानियों में चाँद जैसी है और बाकी सभी तारों की तरह झिलमिल झिलमिल करती हैं।“
“...और मोरां सरकार के बारे में तेरा क्या ख़याल है ?“ महाराजा अपने स्वर्ण सिंहासन पर ठीक से होकर बैठते हुए पूछता हे।
“हाँ, मोरां सरकार भी सुन्दर है।“
यह कहकर अल्ला जाई तो चली जाती है, लेकिन राज बंसो 1⁄4रानी महताब देवी की बहन1⁄2 के सबसे सुन्दर होने के बारे में सुनकर मोरां अंदर ही अंदर जलने लग पड़ती है। दरबार में अपने आप पर किसी तरह नियंत्रण किए वह बैठी रहती है। किन्तु, दरबार खारिज होने के बाद जैसे ही मोरां अपने कमरे में जाती है तो उसका क्रोध सातवें आसमान पर होता है। जो भी सामने आती है, वह हर चीज़ फर्श या दीवारों पर फेंककर तोड़ देती है। मोरां सरकार का ऐसा पागलपन देखकर दासियाँ उसको शांत करती हैं। ईष्र्या की आग में झुलसती मोरां को बुखार चढ़ जाता है और उसकी देह तपने लगती है। वह गुस्से में शराब की आधी सुराही एक सांस में पी जाती है। फिर भी, उसके मन को राहत नहीं मिलती। वह अफ़ीमदानी में से थोड़ी-सी अफ़ीम तोड़कर खाने लगती है। जैसे ही वह अफ़ीम की गोली बनाकर सटकने लगती है तो उसके अपने ही हाथ खुद-ब-खुद होंठों के करीब जाकर रुक जाते हैं। वह कुछ पल रुककर सोचने लगती है। एक साजिश उसके मन में करवट लेने लगती है। वह अपने संदूक में से कुछ निकालकर अफ़ीम में मिलाती है। फिर वह अपनी दासी को बुलाकर उसके कान में अपनी चाल समझा देती है। दासी मोरां से अफ़ीमदानी लेकर चली जाती है।
मोरां चिंताओं के बहाव में बहती हुई बिस्तर पर करवटें बदल रही होती है तो महाराजा आकर उसके ऊपर लेट जाता है और अपनी काम वासना को शांत करता रहता है। लेकिन मोरां महाराजा के नीचे पड़ी हुई भी वहाँ से गै़रहाजि़र रहती है।
अगली सुबह पूरे शाही महल में हड़कंप मच जाता है। रानी राज बंसो बेहोश पड़ी मिलती है और उसके मुँह में से झाग निकल रही होती है। वैद के पहुँचने से पहले ही राज बंसो प्राण त्याग देती है। वैद उसका निरीक्षण करके बताता है कि रात में रानी राज बंसो ज़रूरत से अधिक अफ़ीम का सेवन कर बैठी होगी जो उसका हृदय सहन नहीं कर सका। इस प्रकार सारी बात रानी द्वारा आत्महत्या करने के शोर में दबा दी जाती है। कुछ दिनों में सब रानी राज बंसो को भूल जाते हैं।
रानी राज बंसो के क़त्ल का पश्चाताप करने के लिए मोरां पुण्य के अनेक काम करती है। दाता गंज बख़्श की दरगाह पर वह हस्तलिखित कुरान भेंट करती है। इच्छरां 1⁄4लाहौर1⁄2 के निकट भैरों मंदिर को चालीस हज़ार ईंटें और नगदी दान करती है। साध बाबा धूनी दास को मंदिर बनाने में आर्थिक सहायता करती है और दरबार साहिब जाकर पवित्र सरोवर में स्नान भी करती है।
नेपोलियन बोनापार्ट के वाॅटरलू के युद्ध में दाँत खट्टे होने के उपरांत उसके बहुत सारे योद्धा और जनरल देश-विदेश में नौकरी की तलाश में मारे-मारे भटकने लगे थे। उनमें से जिन चार जनरलों ने 1822 में महाराजा को अपनी सेवाएँ पेश की थीं, उनमें से एक ऐलार्ड भी था। ऐलार्ड को भर्ती करते समय महाराजा ने यह शर्त रखती थी कि वह तंबाकू का सेवन न करता हो।ऐलार्ड ने कहा था, “महाराज, तंबाकू तो मैं इस्तेमाल करता हूँ। मुझे एक महीने की मोहलत दो। मैं धीरे धीरे इसे छोड़ दूँगा।“
इस पर महाराजा ने उसको उŸार दिया था, “ठीक है, तंबाकू छोड ़कर महीने बाद आना, फिर तुझे भर्ती करेंगे।“
वही महाराजा मोरां के हुक्के में भरा जाने वाला सुगंधित तंबाकू स्वयं पेशावर से मंगवाने लग पड़ा है।
जब दरबारी महाराजा से इस दोगली नीति के विषय में बात करते
हैं तो अपनी आदत के अनुसार वह तुरंत जवाब देता है, “ऐलार्ड ने तो जंग में लड़ना है, मोरां ने तो शाही दरबार में नाचना है और हमारा चिŸा ही बहलाना है।“
जब भी शाही किले में गोश्त बनता है तो मोरां के लिए शाही बावर्ची अलग से हलाल गोश्त पकाता है। इस बात को आधार बनाकर महाराजा के निकटवर्ती महाराजा के कान मोरां के विरुद्ध भरने आरंभ कर देते हैं, “महाराज, आपने मोरां के इशारे पर कितना कुछ किया है। उसके मुँह से फरमाइश निकलने से पहले ही आप उसे पूरा करते रहे हो। अराइयों के जैलदार मियां मुहम्मद यूसफ से 1641 ई. में इश्कपुरा की ज़मीन लेकर
बादशाह शाह जहान ने शालीमार बाग लगवाया था। आप मोरां की खातिर शालीमार से उसका नाम शायलामार बाग यानि माशूक का बाग कर दिया।... आप तो मोरां को बेपनाह मुहब्बत करते हो। क्या मोरां भी आपसे प्यार करती है या नहीं ?“
“इसमें शक की तो कोई गुंजाइश ही नहीं है। मोरा भी मुझे जी-जान से इश्क करती है।“
“यदि यह बात है तो उसको एकबार परखकर देखो। उससे कहो कि वह एकबार आपके साथ झटका मांस खाए।“
“लो, यह कौन सी बात है ? मैं कहूँ तो वह ज़हर खाने में भी एक पल नहीं लगाएगी। लो, आज ही तुम्हें यह करतब दिखा देते हैं।“ महाराजा उत्साह में बोलता है।
भोजन का समय हुआ तो छŸाीस प्रकार के भोजन तैयार करके महाराजा के सम्मुख परोसे गए। महाराजा अपनी कुछ रानियों, दासियों और खास दरबारी लोगों के साथ बैठकर भोजन करने लगा। महाराजा जानबूझ कर दो-तीन बार उस डोंगे की ओर मोरां को इशारा करके गोश्त लेने के लिए कहता है, जिसमें झटके वाला गोश्त होता है। मोरां हर बार टाल जाती है।
“मोरां, तू मुझे कितना प्यार करती है ?“ यकायक महाराजा अपना प्रश्न दाग देता है।
मोरां अपना भोजन बीच में छोड़ देती है, “उतना जितना आज तक किसी ने भी किसी को नहीं किया होगा।“
“अच्छा, तो प्यार में तू हमारे लिए क्या कर सकती है ?“
“आप कहोगे तो मैं अगला सांस भी नहीं लूँगी, महाराज।“
“मुझे पता है, तुम्हारे दीन मंे इसकी मनाही है। पर फिर भी, चल
हमारे लिए आज ये झटका खा।“
महाराजा की बात सुनकर मोरां हँस पड़ती है, “हुजूर-ए-आला,
इससे तो अच्छा आप ज़हर दे दो, मैं बिना सोचे खा लूँगी। पर यह झटका नहीं खा सकती। अगर आप भी मुझे प्यार करते हो तो यह जानते हुए भी कि हमारे धर्म में इसकी मनाही है, आपको यह बात कहनी ही नहीं चाहिए थी। अब यदि मैं आपसे कहूँ कि आप हलाल मांस खाओ तो क्या आप
छकोगे ?“
“नहीं, हरगिज़ नहीं।“
“मेरा ख़याल है, आपको आपके प्रश्न का उŸार मिल गया होगा।“
पूरे भोजनगृह में सन्नाटा छा जाता है और महाराजा अपनी हतक
महसूस करता हुआ इधर-उधर की बातों में वक्त बर्बाद करने लग जाता है। लाहौर के मोरी दरवाजे़ के सामने महाराजा मोरां के लिए एक ख़ास प्रकार के बाग का निर्माण करवाता है। उस बाग में महाराजा मोरां के साथ टहलने जाता है। मोरां महाराजा की बांह में बांह डाले उसके कंधे पर अपना सिर रखकर चल रही होती है, “महाराज, क्या मैं सचमुच इतनी खूबसूरत
हूँ जितना लोग मुझे कहते हैं ?“
“इसमें क्या शक है मोरां, तुझे ईश्वर ने फुरसत में बैठकर बनाया है।
मुझे तो लगता है, तेरा एक-एक अंग कई कई बार गिरा गिरा कर बनाया होगा।“ बाग के मध्य में जाकर दोनों बैठ जाते हैं।
“अच्छा, बताओ फिर, आपको मेरा कौन कौन-सा अंग खूबसूरत लगता है ?“
“सिर से पैर तक, तू मुझे सारी की सारी खूबसूरत लगती है !“
“ऐसे नहीं, हाथ लगाकर बताओ, जो जो अंग आपको खूबसूरत लगता है।“
“हाथ नहीं, मैं तो होंठ लगाकर बताऊँगा।“ महाराजा मचल उठता है।
“जैसे आपकी इच्छा।“ मोरां शरारत भरे लहजे में महाराजा को आँख मारकर कहती है।
महाराजा मोरां को लिटाकर पहले उसका माथा चूमता है... फिर बंद दोनों आँखों को बारी बारी चूमता है...फिर दोनों गालों को... फिर नाक...फिर होंठ...फिर ठोड़ी...फिर गर्दन...फिर... फिर... फिर... फिर... फिर...!!! मोरां और महाराजा ऐकमेक हो जाते हैं।
महाराजा के आगोश में बैठी मोरां महाराजा की छाती पर अपनी उंगली से व्यर्थ ही अदृश्य रेखायें खींचती हुई कहती है, “महाराज, एक सवाल
पूछूँ ?“
“एक छोड़, सौ पूछ मेरी जान।“ महाराजा मोरां की आँखों में आँखें
डाल लेता है।
“जब ईश्वर सुन्दर शक्लें बांट रहा था तो आप कहाँ गए हुए थे ?“ मोरां की बात सुनकर महाराजा बहुत गंभीर स्वर में बोलता है, “मोरां,
दरअसल उस समय मैं पंजाब की रक्षा के लिए अपनी रियासत का नक्शा बना रहा था।“
“वाह ! आपकी हाजि़र-जवाबी का जवाब नहीं महाराज !“
“और जब रब आँखें बांट रहा था, तब आप कहाँ गए थे ?“
“तब था तो मैं वहीं, रब ने कहा - तुझे बादशाही करनी है, इसलिए
तुझे एक ही आँख दूँगा ताकि तू सभी को एक नज़र से देखे और सही इन्साफ़ करे।“
मेरां महाराजा के आगे इल्तज़ा करती है, “महाराज, कंचनी शब्द सुन
सुनकर मेरे कान बहरे हो गए हैं। कंचनी का अर्थ नर्तकी या कंजरी होता है। अब तो आपकी रानी बन गई हूँ, पर कंचनी शब्द ने मेरा अभी तक पीछा नहीं छोड़ा। आप सबको कोई न कोई उपाधि देते हो। क्या मुझे ऐसी कोई उपाधि प्रदान कर सकते हैं जिससे इस कंचनी शब्द से मेरा हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाए।“
“तुमने इस तरफ कभी मेरा ध्यान दिलाया ही नहीं। चिंता न कर, इसका भी कल कोई समाधान करते हैं।“
अगले दिन दरबार लगाकर महाराजा मोरां को ‘सरकार’ की उपाधि प्रदान करने की घोषणा करता है और कहता है कि भविष्य में मोरां को ‘कंचनी’ के बजाय ‘मोरां सरकार’ कहा करेगा और मेरे से पहले सिजदा मोरां सरकार को हुआ करेगा।
महाराजा की आज्ञा का पालन होता है। कुछ रोज़ बाद मोरां मुसंमन बुर्ज़ में अपना एक अलग ही दरबार लगाना प्रारंभ कर देती है जिसमें वह रियासत की स्त्रियों की समस्याओं का निपटारा करती है। महाराजा की भाँति मोरां की भी प्रजा में महिमा होने लग जाती है।
दरबारी महाराजा को सलाह देते हैं कि मोरां अब मोरां सरकार बन गई है और उसको शाही स्त्रियों की तरह पर्दे में रहना चाहिए। महाराजा मोरां के साथ इस संदर्भ में बात करता है तो वह टके-सा जवाब दे देती है, “महाराज, अब तो घूंघट उठाने की आदत पड़ चुकी है। अब पर्दा करने का क्या फायदा ? सभी ने तो मुझे देखा हुआ है।“
महाराजा मोरां सरकार के कहने में आकर अधिक बहस या जिद्द नहीं करता और मोरां सरकार कभी पर्दा नहीं करती।
ख्वाबगाह में रात को शराब पीती हुई मोरां सरकार महाराजा के साथ रंगरलियाँ मना रही है, “महाराज, आपको एक बात बतानी थी।“
“हाँ, बता फिर।“
“मुझे लगता है, मैं गर्भवती हूँ।“ मोरां डरती और झिझकती हुई कहती है।
“यह तो खुशखबरी है। मुझे अपने जैसा बहादुर और तेरे जैसा पुत्र चाहिए मोरां, जो शुक्रचक्किया मिसल का नाम रौशन करे।“
“अल्ला-ताला ने चाहा तो ऐसा ही होगा, महाराज। पर महाराज, यह मिसल क्या होती है ?“
“जैसे कबीले होते हैं, उसी तरह ही लोगों के गुट को हम मिसल करते हैं। कबीले से मिसल में फर्क़ होता है। इसमें बराबरी का अधिकार होता है। मिसल का असली अर्थ बराबरी है। यूँ सिक्खों की बारह मिसलें हैं। कन्हैया, नकई, भंगी, रामगढि़या, फूलकीया, सिंहपुरिया 1⁄4फैजलपरिया1⁄2, करोड ़सिंघिया, डल्लेवालिया, नशानवालिया, आहलुवालिया, शहीदां और शुक्रचक्किया। मैंने इन सबको केसरी झंडे के नीचे इकट्ठा करने का करिश्मा कर दिखाया है। सबको मैं अपने राज्य में बराबर रखता हूँ। इसीलिए मेरे राज्य की प्रजा सुखी है।“
“नहीं महाराज, पर हमारी बिरादरी वालो को अभी भी हिकारत की निगाह से देखा जाता है। लोग हमारे साथ सामाजिक मेलजोल से कन्नी काटते हैं। मैं चाहती हूँ कि हम नचारों और गाने वालों की बिरादरी के लिए भी आप कुछ करो।“
“तुम खुदमुख्तियार महारानी हो। जो तेरे दिल में आता है, हुक्म कर। तेरे हुक्म की तामील होगी।“
मोरां अमृतसर के निकट अपनी बिरादरी वालों के लिए एक नई शरीफ़पुरा नाम की बस्ती बसा देती है, जहाँ मुजरा संस्कृति से जुड़े तमाम लोग आ बसते हैं। इन लोगों के लिए मोरां सरकार एक पृथक मस्जिद का निर्माण भी करती है। जिसको ‘मस्जिद-ए-तवाइफ़ां 1⁄41992 में इस मस्जिद का नाम बदल कर माई मोरां की मस्जिद रख दिया जाता है1⁄2 कहा जाता है। लाहौर के चैक मती और पापड़ मंडी के बीच में बनी इस मस्जिद में उस वक्त के सबसे बड़े मौलवी मौलाना गलाम रसूल और गुलाम अल्ला को ईमामत सौंपी गई। महाराजा रणजीत सिंह की रियासत के बाकी हिस्सों में भी मोरां सरकार अनेक बाग और मकबरे बनवाती है।
अक्तूबर 1831 में महाराजा मोरां सरकार को संग लेकर रोपड़ में फिरंगियों के साथ संधि करने जाता है। लार्ड विलियम बैनटिक और उसकी पत्नी लेडी मैरी ऐशियन महाराजा और मोरां के प्रेम की तुलना रोमियो और जूलियट की पाक मुहब्बत से करते हुए उनके इश्क को इश्क-मज़ाज़ी की बजाय इश्क-हकीकी कहते हैं और उनकी जोड़ी की लम्बी आयु की शुभकामनाएँ देते हैं।
मोरां से लवेरियां का मौलाना मियां जान मुहम्मद एक मदरसा बनवाने के लिए विनती करता है तो मोरां तुरंत मदरसे के निर्माण का कार्य आरंभ करवा देती है। बहुत शीघ्र ही ड्योढ़ीदार ज़मादार खुशहाल सिंह की देखरेख में मदरसा तैयार हो जाता है, जहाँ फ़ारसी और अरबी की तालीम दी जाती है। मोरां ज़मादार खुशहाल सिंह को तरक्की दिलाकर उसे दरबारी बनवा देती है। ज़मादार खुशहाल सिंह के भतीजों - ध्यान सिंह और गुलाब सिंह को महाराजा से राजा पद भी दिलाती है और अपने विरुद्ध उठने वाली आवाज़ों को दबाती रहती है।
जब अकाली सिंह मोरां की आँखों में चुभने लगा तो मोरां ने महाराजा को ऐसी पट्टी पढ़ाई कि अगले दिन ही महाराजा और फूला सिंह के बीच ज़ोरदार बहस हो गई।
महाराजा अकाली फूला सिंह से क्रोध में बोला, “मैंने निहंगों की छावनी को जागीर लगा रखी है। आपको मैंने बारह सौ घुड़सवार और अट्ठारह सौ पैदल सिपाहियों की फौज दे दी है। आप जाकर उसका ख़याल रखो।“
महाराजा से ख़फा होकर निहंग फूला सिंह अमृतसर अकाली दल में आ बिराजा। उसके पश्चात हरी सिंह नलुवा मोरां का मुख्य निशाना बन गया। मोरां ने एक रात महाराजा को हीरे, मोतियों और सोने के मिश्रण वाली शराब का जाम पेश करते हुए बात प्रारंभ की, “महाराज, बाहरी हमलावरों में भारत पर सबसे पहले हमला मुहम्मद बिन कासिम ने 21 जून 712 ई. को किया। उसके बाद सुबक्तगीन, महमूद गज़नवी, मुगल, गुलाम वंश, खिलज़ी वंश, फिरोज़शाह तुगलक, लोधी वंश और अब्दाली जैसों को मुँह पड़ गया। हमेशा ही दर्रा-ए-खैबर की ओर से बाहरी हमलावरों का डर बना रहता है। आप भी उस मोर्चे पर काफ़ी नुकसान करवा चुके हैं। आपके पास हरी सिंह नलुवे जैसे बहादुर जरनैल हैं जो लाहौर में बैठे मुफ़्त की रोटियाँ खा रहे हैं। आपने नलुवे को सिक्का चलाने की आज्ञा दी है। बुजऱ् हरी सिंह जैसे इलाके और बाग उसके नाम पर न्यौछावर किए हैं। ऐसा क्यों नहीं करते कि ज़मरौंद के किले पर स्थायी तौर पर ही नलुवे को तैनात कर दो ताकि हमलावरों को हिंदुस्तान में घुसने ही न दिया जाए।“
महाराजा को मोरां की तज़वीज जंच गई और उसने फौरन हरी सिंह नलुवे को ज़मरौंद के किले पर स्थायी तौर पर रहने का हुक्म सुना दिया।
अब समस्त लाहौर दरबार में मोरां की राह का सबसे बड़ा और अहम रोड़ा शाम सिंह अटारी बचता है। मोरां ने अटारी के सरदार को अपने रास्ते से हटाने के अनेक यत्न किए। पर शाम सिंह महाराजा का रिश्तेदार था, इसलिए मोरां को कोई सफलता नहीं मिली। मोरां अपने दिमाग की धार नित्य तीखी करते हुए चालें चलती रहती। लेकिन सब निष्फल हो जातीं।
एक दिन दरबार में सरदार शाम सिंह अटारीवाले ने महाराजा से जबरन ज़ोर डालकर एक जरनैल की पिछले तीन वर्षों की तनख्वाह दिलवाई तो मोरां के जे़हन में तुरंत एक षड्यंत्र ने जन्म ले लिया। मोरां अकेले महाराजा को सैर के लिए ले जाकर अपना पŸाा फेंकती है, “महाराज, आज राज दरबार मंे तनख्वाह वाला क्या मामला था ?“
“वह कुछ नहीं मोरां, गलती मेरी ही है। दरअसल, अपने राज्य को फैलाने के चक्कर में 1822 ई. के बाद मैंने अंधाधुंध फौज में भर्ती करनी शुरू कर दी थी। तू तो जानती है, उसके बाद से मेरी रियासत के नक्शे का विस्तार हुआ है। इसके साथ ही जंगी कार्यों पर खर्चा भी बहुत हुआ है। अब शाही खजाने में इतना दम नहीं रहा कि मैं सारी सेना को पूरी और समय से तनख्वाह दे सकूँ। बहुत सारे सिक्ख जरनैलों ने तो कई कई साल मुझसे तनख्वाह मांगी भी नहीं है। पर जो मांगे उसको तो देनी ही पड़ेगी न ?“ रणजीत सिंह अपने दयालू स्वभाव को दर्शाता है।
“हाँ महाराज, वही तो मैं कहती हूँ कि आपको इस बारे में संज़ीदगी से सोचना चाहिए। समझदार वही है जो हवा का रुख देखकर तूफ़ान के आने का अनुमान लगा ले।“
महाराजा अपने चेहरे पर नज़रे गड़ाये खड़ी मोरां की आँखों में आँखें डालता है, “क्या मतलब है तुम्हारा ? पहेलियाँ न बुझा, खुलकर बता।“
“ओ हो महाराज ! आप तो जानते ही हो कि मालवे में सिद्धू-बराड़ों की सदियों से धाक रही है। इनके पूर्वज को ब्रवमा का वरदान है कि इनका खानदान कभी खत्म नहीं होगा और दुनिया पर इस्लाम की तरह फैलेगा। मैंने सुना है कि आपके दसवें मुर्शद गुरू गोबिंद सिंह ने मालवे में सिक्खी का प्रचार करते समय सिद्धू-बराड़ों को सहायता और रक्षा के लिए नौकरी पर रखा था। जब आपके मुर्शद बजीदपुर, घोगड़, कालझगणी होते हुए छŸोआणे पहुँचे तो बराड़ों ने आपके मुर्शद के घोड़े की लगामें पकड़कर राह रोक लिया था कि हमारी तनख्वाहें दो।“
“हाँ मोरां, कोटकपूरे के लक्खी जंगल की ओर जाने से पहले गुरू
गोबिंद सिंह तब करीब छह महीने दीने में रुके थे और चार पाँच-महीने उन्होंने मालवे में सिक्खी का प्रचार किया था। सिद्धू वंश के संस्थापक सिद्धू राव की दसवीं पुश्त में हमीर सिद्धू के घर योद्धा बराड़ पैदा हुआ। जिससे बराड़ वंश चला। मालवा में हमेशा ही सिद्धू बराड़ों का दबदबा रहा है। मुगल बादशाह औरंगजेब भी इनसे डरता था। गुरू गोबिंद सिंह ने औरंगजेब को लिखे ज़फरनामे में लिखा था, ‘तुरा ई राहे न खतरह ज़रासत। हमह कौम बराड़ हुकिम मरासत।’ अर्थात तू बेख़ौफ़ होकर हमसे मिल और तेरी जान को कोई ख़तरा नहीं है, क्योंकि बराड़ कौम मेरे हुक्म के अधीन है। सिद्धू-बराड़ों द्वारा तनख्वाह मांगने पर गुरू साहिब ने पोठोहार की संगतों 1⁄4श्रद्धालुओं1⁄2 की ओर से आए ‘दसवंध’1⁄4दसवें हिस्से1⁄2 से उनकी झोलियाँ भर दी थीं। बराड़ों के मुखिया तक आते आते सारी माया खत्म हो गई थी और गुरू डंप डवतंद डवेुनमए स्ंीवतम साहिब ने उससे पूछा था कि ‘भाई दान सिंह मांग, तुझे क्या चाहिए ?’ बाबा दान सिंह बोला, ‘पातशाह, धन-दौलत और दूध-पूत आपका दिया सब कुछ है। बस, सिक्खी की कमी है। मुझे सिक्खी बख़्श दो।’ गुरू साहिब ने प्रसन्न होकर उसको वर दिया था कि सिद्धू बराड ़ योद्धाओं का वंश सबसे अधिक फैलेगा और सिक्खी का प्रचार करेगा। गुरू साहिब के वचन मुझे सच सिद्ध होते प्रतीत होते हैं मोरां। जट्टों में सबसे अधिक
सिद्धू-बराड़ों की संख्या है। यह आख्यान भी प्रचलित है कि एक पूला काटा और सौ सिद्धू निकाला।“
“आप मेरा इशारा नहीं समझे और बात को दूसरी तरफ ले गए महाराज। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि शाम सिंह भी सिद्धू वंश चालने वाले सिद्धू राव की संतान में से है। यदि यह आपके गुरू का राह रोक सकते हैं तो तनख्वाहें लेने के लिए आपके घोड़े की
लगामें पकड़ने में क्या ये ढील बरतेंगे ?“
मोरां की बात सुनकर महाराजा ऐसे चुप हो जाता है जैसे उसको
साँप सूंघ गया हो। कई दिन महाराजा उखड़ा-उखड़ा रहता है। फिर एक दिन शालीमार बाग में महाराजा और शाम सिंह की इतनी अधिक तकरारहोती है कि शाम सिंह लाहौर छोड़कर सदैव के लिए अटारी चला जाता है।
शाम के जाने की ख़बर सुनकर मोरां खुशी में फूली नहीं समाती और लाहौर दरबार में बिना किसी झिझक-डर के अपनी मनमानियाँ करना जारी रखती है।
किसी समय पीर अहमद शाह 1⁄4सैलानी शाह1⁄2 मोरां पर आशिक होकर उस पर निकाह के लिए दबाव डालने लग गया था और मोरां से कहता था कि या तो मोरां उसके साथ निकाह करवाये, नहीं तो कहीं से कूंजों 1⁄4प्रवासी पंछियों1⁄2 के अंडे लाकर दे। मोरां दोनों ही शर्तें पूरी नहीं कर सकती थी। उसने फ़कीर से तंग आकर शहर में मुनादी करवा दी थी कि कोई भी उस फ़कीर को रोटी की बुरकी न दे। इसके बाद उस फ़कीर का नाम ‘कूजां वाला फ़कीर’ पड़ गया था। तंग आकर फ़कीर ने मोरां से माफ़ी मांगी थी और मोरां ने उससे कहा था कि वह उसे बख़्श देगी यदि फ़कीर उसको सात बार झूला झुलाये। फ़कीर ने ऐसा ही किया। मोरां ने उसकी अकड़ तोड ़ने की खुशी में इनाम के तौर पर फ़कीर को एक हज़ार कंबल और एक हज़ार लंगोट दान किए थे। उसके पश्चात मुर्शद मस्तान शाह के उस शार्गिद का नाम ’झूले वाला पीर’ प्रसिद्ध हो गया।
इस प्रकार, एक बार मोरां का सामना अराइयों के सब्ज़ी बेचने वाले मियां मुहकम दीन से हो गया था। मुहकम दीन ने 7 जुलाई 1799 में महाराजा रणजीत सिंह को लाहौरी दरवाज़ा खोलकर लाहौर को फ़तह करने में सहायता की थी। महाराजा ने खुश होकर उसको ‘बाबा’ उपाधि से नवाज़ा था। जब मोरां के साथ मुहकम दीन ने पंगा लेने की गलती की तो मोरां ने मन ही मन कहा था, “मैं भी मोरां नहीं अगर तेरे सिर पर सब्ज़ी का टोकरा उठवाकर तुझे दर दर न भटकाया।“ मोरां ने ऐसी चाल चली कि बेचारा वह बरसों कै़दखाने में अपनी तकदीर को कोसता रहा।
गुलबानो उर्फ़ गुलबहार बेगम के साथ विवाह करवाने के बाद महाराजा की दिलचस्पी मोरां सरकार में कम हो जाती है। मोरां सरकार महाराजा के दिल में अपना पहला वाला स्थान बनाये रखने के लिए सिरतोड ़ यत्न करती है, पर सब यत्न असफल हो जाते हैं। मोरां सरकार को गर्भ ठहर जाने के कारण महाराजा को हर समय रिझाये रखने में वह नाकाम हो जाती है। इस पर वह बेगम गुलबहार को ज़हर देकर मरवाने का प्रयत्न करती है। इस बारे में महाराजा को पता चल जाता है और वह मोरां सरकार को सदैव के लिए अपनी आँखों से दूर एक जागीर देकर पठानकोट भेज देता है। मोरां सरकार अपने आप को शराब में डुबो लेती है।
पठानकोट के किले में अपनी बेटी के साथ गुमनामी का जीवन व्यतीत करती मोरां सरकार ऐडि़या रगड़ रगड़कर 1852 ई. को मर जाती है। लाहौर के मियां साहिब कब्रिस्तान में लाकर मोरां सरकार को दफ़ना दिया जाता है। आज भी लाहौरियों की ज़बान पर मोरां नगमा बनकर नृत्य करती है, “छुप जा अद्धी रात दिया चंदा, अद्धी रात मोरां दे जाणा।“

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