प्रस्तावना: यह ग्यारहवीं सदी में इंग्लैंड में घटित एक सच्ची घटना पर आध् ाारित कहानी है। इस कहानी में उस समय जो नाम शहरों के थे, वही नाम इस्तेमाल किए गए हैं। इस रचना को मैंने लिखा नहीं, बल्कि अपनी कला की छेनी पर कल्पना की चोटें मारकर इसे तराशा है और कहानी रूपी बुत तैयार किया है।-ys[kd
मुंसफी कार्रवाइयाँ समाप्त करके और दरबार लगाने के उपरांत ल्युफरिक अपने अंगरक्षकों व छोटे-से फौजी दस्ते के साथ बग्घी में बैठकर कौफस टंी ¼Conventry½ अपने भवन की ओर रवाना हो गया। ल्युफरिक की सवारी के आगे सनद से लैस सिपाहियों की टोली और पीछे की तरफ बड़ा नफरी टोला उसकी हिफाजत के लिए चल रहा है। सबसे आगे खच्चर पर नगाड़ी नगाड़ा बजाता अगुवाई कर रहा है। ल्युफरिक के छह घोड़ों वाले रथ के आगे नीला अबलक और ताजी, बीच में चितकबरा और सफ़ेद मुँह वाला दोरंगा, उसके पीछे सुर्ख़ कोतल और काला घोड़ा जुते हुए हैं। ल्युफरिक को शिकार खेलने का बहुत शौक है। इसलिए कुत्तों और घोड़े पलाना उसके लिए स्वाभाविक ज़रूरत है। ल्युफरिक के अस्तबल में मुश्की, बाजी, तुर्की, अरबी, दरियाई, पहाड़ी, झिंगरे, रोमनी, खब्बू नोरमनी (शेष घोड़ों से भिन्न और जो हमेशा बायां पैर पहले उठाते हैं), जतल जंगली और सबसे कद्दावर इक्कीस गिट्ठे (सात फुटे) फ्रांसिसी परशौन आदि हर नस्ल के एक से एक बढि़या घोड़े हैं। कई घोड़े तो ल्युफरिक डीन ईडन (ऐडीनबरा), अलनूा (एलैस्टर) और मैमूसीयम (मानचैस्टर) से खुद खरीद के लाया है। कुत्तों भी उसने नई से नई नस्ल के पाले हुए हैं। बैगले, लोछिन, ब्लोगनाई, टैलबोट, हवाई बिछनर, ब्लोनका, कैटल, शैपहर्ड, शिकारी ऐंगलीकन, चाओ-चाओ, स्परिंटर, डेन और सबसे उतम और उसके पसंदीदा कैवलीयर।
मुहल्लों, बाज़ारों और चैरास्तों में से जहाँ भी ल्युफरिक की सवारी गुज ़रती है, उसके घोड़ों की टापों की धमक से आसपास की काठ की इमारतों के वजूद में एक जुंबिश... एक कंपन पैदा होता है मानो भूचाल आ गया हो। घोड़ों के पैरों में लगी नालों की चोट से पक्के रोमनी पत्थरीले मार्ग भी थरथराते महसूस होते हैं।
कौफस टंी में लोग ल्युफरिक के लिए न केवल रास्ता छोड़कर एक तरफ हो रहे हैं, बल्कि झुककर सलाम भी कर रहे हैं।
महीने में पहले वीरवार के दिन कौफस टंी में यह बाज़ार लगता है जिसको इन अंग्रेज लोगों की भाषा में ‘मार्किट डे’ कहा जाता है। यहाँ लूनीयनबर्ग (लंडन) और इंग्लैंड के दूसरे हिस्सों से व्यापारी लोग आकर अपना सामान मार्सिया (इंग्लैंड की मध्य भूमि जिसको अब मिडलैंड कहा जाता है) सल्तनत के लोगों को बेचते हैं। कौफस टंी के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेतीबाड़ी है। भेड़ें, गायें, सुअर, बतखें और मुर्गे आदि पालना है या घोड़ों का व्यापार वे एक सहायक धंधे के तौर पर करते हैं। इस बाज़ार वाले दिन ही ल्युफरिक अपनी आवाम और व्यापारियों से महसूल की उगाही करता है।
ल्युफरिक एक अमीर और शरीफ व्यक्ति है और कौफस टंी का सरदार होने के कारण उसने अनेक लोगों को अपनी जागीर में पनाह दी हुई है, जिसके एवज में ज़मीदार ल्युफरिक अपनी प्रजा से अनेक प्रकार के कर लेता है। ल्युफरिक का विचार है कि गरीब लोगों का वस्त्र और भोजन के मसले से फुरसत नहीं मिलनी चाहिए, नहीं तो वे बददिमाग और बागी हो जाते हैं। जब भी ल्युफरिक को लगता है कि कोई व्यक्ति सुख-सुविधा, ऐशो-आराम किसी तरह प्राप्त कर रहा है, धन कमा रहा है या जीवन आनंदमयी और सुखमयी व्यतीत कर रहा है तो ल्युफरिक किसी ने किसी बहाने से उस पर कोई नया लगान ईजाद करके लागू करवा देता है। सब लोग उसके फरमांबरदार हैं और उसके हुक्म का पालन करते हैं। जैसे तैसे बिना कोई न-नुकर किए, हर कर अदा करके अपनी वफ़ादारी का सुबूत देते हैं।
इन अनेक प्रकार के करों में सबसे आवश्यक और बड़ी मात्रा का कर ‘हैरेगेल्ड’ है जो ल्युफरिक को बिना किसी ढील के उगाहना पड़ता है। क्योंकि यह टैक्स डैनिश महाराजा कैनिऊट के अंगरक्षकों के खर्च को पूरा करता है। कैनिऊट की बदौलत ही ल्युफरिक मार्सिया में अपना तानाशाही राज स्थापित कर सका है और मार्सिया का सामंत बना है। हैरेगेल्ड अदा न करने वाले के लिए सख़्त सजा है। चैराहे में नंगा करके सौ कोड़े और उसके परिवार की स्त्रियों को उतने दिन तक गिरजाघर के पादरी के साथ सोना पड़ता है, जब तक हैरेगेल्ड की अदायगी नहीं कर दी जाती।
यूँ तो शाही घरानों के साथ ल्युफरिक के खानदान का सदियों से गठजोड़ रहा है। ल्युफरिक का बाप ल्युफवाइन खुद एक रजवाड़ा और ड्यूक (राज दरबार का उच्च अधिकारी और न्यायाधीश) था। सातवीं सदी में रोमनों के राज के दौरान 664 ई. गवीडन (वेल्ज़) के सम्राट काडवाल्डर ने ल्युफरिक के

पूर्वजों को उनकी वफ़ादारी और वतनपरस्ती की सेवाओं को ध्यान में रखते हुए मैडीओलानम (विटचर्च) और ईबूरैकम (योर्क) में विशाल, कीमती और अहम संपतयों के स्वामित्व-अधिकार प्रदान किए गए थे। ल्युफरिक के बुजु़र्गों ने अपनी हैसियत के अनुसार हविसीय की एक पहाड़ी पर एक मज़बूत ‘मैनकास्टर’ (लकड़ी का किला) भी बनाया है जो उनके पुस्तैनी रुतबे की आज भी निशानदेही करता है। बचपन से ही ल्युफरिक का शहनशाहों के साथ उठना-बैठना रहा है। बादशाह एडवर्ड के बगीचों में वह राजकुमारों के साथ छह साल की आयु तक खेलता रहा है। उसके बाद महाराज एथरल्ड (दूसरा) यद्यपि उससे चार वर्ष छोटा था, पर उसके जिगरी दोस्तों की तरह था। 1013-14 में जब अंदरूनी फूट और विकीगिंग (स्कंडनेविया के समुद्री डाकू) हमलों के कारण एथरल्ड का सिंहासन डगमगाने लगा था तो ल्युफरिक ने ही गुप्त रूप में एथरल्ड की काफ़ी सहायता की थी। पर 1014 के अंत में डेनमार्क और नौर्वे के राजा स्विन (प्रथम) फोर्कबियर्ड की भारी फौजों के आगे एक साल डटे रहने के बावजूद उनका कोई वश नहीं चल सका था। यह ल्युफरिक ही था जिसके उद्यम के कारण फोर्कबियर्ड के साथ एथरल्ड की संधि हुई थी और एथरल्ड हारने के बावजूद फोर्कबियर्ड की गुलामी स्वीकार करके राजगद्दी पर बैठा रह गया था। नहीं तो भयभीत एथरल्ड नौरमैंडी (फ्रांस की एक सल्तनत) की तरफ भाग गया था। फोर्कबियर्ड डेनमार्क बैठा अपना शासन और सिक्का चलाता, पर कागजी तौर पर एथरल्ड पहले की भाँति राज करता रहा था। 1016 में एथरल्ड के निधन के बाद मज़बूरन फोर्कबियर्ड को आकर मार्सिया की राजगद्दी पर बैठना पड़ा था। दुर्भाग्य से राजगद्दी को किसी पागल की ऐसी बुरी नज़र लगी कि छह सप्ताह बाद फोर्कबियर्ड भी मृत्यु को प्राप्त हो गया। फोर्कबियर्ड के वारिस कनिऊट की सहमति से एथरल्ड के पुत्र ईडमंड ने राज संभाला। परंतु वह दो साल बाद ही जंग में शहीद हो गया। अशीघंटन की जंग फतह करके कनिऊट भयभीत-सा मनहूस सिंहासन पर बैठना ही नहीं चाहता था। ल्युफरिक ने ही तख़्त पर नमक न्योछावर करके नज़र उतारने के उपरांत अपने हाथों कनिऊट का राजतिलक करवाया था। बादशाह बनने के साल भर बाद 1018 में कनिऊट को नौर्वे का विरासती सिंहासन प्राप्त हो गया और उसने ऐंगलीका को स्कैंडेनेविया साम्राज्य के साथ मिला दिया था। कनिऊट ने नये कानून लागू कर दिए। पुरातन राजपदों और जागीरदारों की हर प्रकार की दावेदारियाँ खत्म कर दीं। केवल वैवाहिक संबंध और खून के रिश्तों को वारिस बनने का हक सुरक्षित रखा। सदियों से चले आ रहे आल्डरमैन (जागीरी बादशाहत प्रथा) और सबके ओहदे खारिज कर दिए। राज प्रबंध को सफलतापूर्वक और निर्विघ्न कार्यकुशलता से चलाने के लिए कनिऊट ने कुछ चुनिंदा मंत्री नियुक्त किए जिन्हें अरल (सामंत) की उपाधि दी। पुराने शासकों के मंत्रियों को उसने देश निकाला दे दिया या मौत के घाट उतारा या लौह वस्त्र पहनाकर उम्रकैद करके काल-कोठरियों में फेंक दिया। कनिऊट अपने प्रति वफ़ादार और योग्य व्यक्तियों को ही सामंत की उपाधि से नवाज़ता। तीन चोटी के सामंत कनिऊट के दरबारी रत्न गिने जाते थे। पहला सीवर्ड (निउमबरियाँ का सामंत), दूसरा गौडवाईन (वसैक्स का सामंत), तीसरा उसका भाई

नौर्थमैन। कनिऊट ने अमानत में ख़यानत करने का दोषी पाकर भाई को सज़ा-ए-मौत देकर ल्युफरिक को उसकी जगह सामंत बनाया है। गौडविन राजसता पर काबिज़ होने की लालसा रखता है। इसलिए कनिऊट उसको अधिक वफ़ादार नहीं मानता। सीवर्ड योद्धा है लेकिन राजनीति से कोरा है। उसकी रियासत डाइरा (Northamberia) छोटा इलाका होने के कारण उसका अधिकारक्षेत्र सीमित है। ल्युफरिक का कौफस टंी ऐंगलीका का मध्य और गवीडन से सटा हुआ होने के कारण महत्वपूर्ण क्षेत्र है और पश्चिमी सैक्सनों के कानून के अनुसार नौवीं सदी तक कौफस टंी एक आज़ाद रियासत रहा था। ल्युफरिक सबसे समझदार, बहादुर, राजनीतिज्ञ होने के कारण उतम, योग्य और सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसी कारण वह बादशाह का चहेता सामंत है। ल्युफरिक को बादशाह ने सरदारी और स्वतंत्र अधिकार दे रखे हैं। ल्युफरिक की मदद से कनिऊट ने एथरल्ड की तीसरी पत्नी विधवा नौरमंडी की मल्लिका ऐमा से 1017 में विवाह करवाया है और एथरल्ड की दूसरी पत्नी ऐलगिफू को अपनी रखैल बनाकर रखा हुआ है। ल्युफरिक के सहयोग से कनिऊट को मार्सिया में ऐंगलो-सैक्सन परंपराओं के साथ साथ कानून के प्रसार में सफलता प्राप्त हुई है।
ल्युफरिक उम्र के लिहाज से तो 70वें साल में पहुँचने वाला है, पर सीमा से अधिक शराब का सेवन करने के कारण उसका स्वास्थ्य प्रायः खराब रहता है। हाथ-पैर भी कई बार कांपने लग जाते हैं। एक दो बार तो वह बैठे बैठे ही बेहोश भी हो चुका है। उसको मूर्छिता के दौरे पड़ने लग पड़ते हैं। उसकी सेहत यद्यपि अधिक दौड़-भाग और मशक्कत की इजाज़त नहीं देती, पर फिर भी उसने अपनी व्यस्तताओं को कम नहीं किया है। और फिर, राजभाग व सरकारी कामों में उसका हाथ बंटाने वाली उसकी खूबसूरत, अट्ठारह वर्षीय जोबन से भरपूर, फुर्तीली, समझदार और चुस्त पत्नी गौडीवा भी तो है।
गौडीवा के बारे में ल्युफरिक सोचता तो उसको लगता है, गौडीवा के लीनडम कलौनिआई (लिंकौलनशाइर) जागीरदार माता-पिता ने कितना उपयुक्त नाम रखा है उसका। गौडीवा, लातीनी भाषा का शब्द ‘गौडगिफू’ यानी ईश्वर का दिया हुआ अनमोल तोहफा। यह ईश्वर का तोहफा ही तो है जो इतनी बड़ी उम्र में अल्हड़ कुआंरी गौडीवा उसकी अद्र्धांगनी बन गई है। गौडीवा सोलह साल की और ल्युफरिक अट्ठारह साल का था जब दो वर्ष पूर्व गौडीवा उसको पहली बार मिली थी।
गौडीवा के साथ ल्युफरिक की प्रथम मुलाकात ऐवन दरिया के किनारे वाइरिंगसकीर (वरिक्कशाइर) के जंगलों में तब हुई थी, जब वह वहाँ शिकार खेलने गया था और रास्ता भूल गया था। वहीं उसको गौडीवा घुड़सवारी करती हुई मिली थी। पहली नज़र में ल्युफरिक ने गौडीवा की पीठ ही देखी थी। नवयुवती का गदराया आकर्षक गठीला शरीर, सुडौल कमर व नितम्ब हालांकि कुछ भारी और बाहर निकले हुए थे, पर उसके शरीर की बुनावट और जिस्मानी गोलाइयों के हिसाब से गौडीवा पर बहुत जंच रहे थे। मानो किसी निपुण मूर्तिकार ने एकाग्र होकर बड़े मन से मूर्ति बनाई हो। पूरी एक बिलांद लम्बी सुराहीदार गर्दन। सिर पर पहने लोह टोप में से बाहर निकले सोने की तारों जैसे आवारा बाल हवा में उड़ उड़कर चित्र-सा बना रहे थे।

गौडीवा की खुली आज़ाद शून्य में भटकती लटें देखकर ल्युफरिक को यह तो ज्ञान हो गया था कि यह औरत विवाहित नहीं है। क्योंकि स्थानीय रिवाज के अनुसार शादीशुदा औरतें हमेशा जुल्फ़ें जूड़े में बांधकर या लटों को चोटी में गूंथकर रखती हैं। सुहागिनें केवल पति के साथ हमबिस्तर होते वक्त ही बाल खोलती हैं। कुआंरी लड़कियों और विधवाओं को बाल बांधने की मनाही है।
गौडीवा, ल्युफरिक की आमद से बेख़बर खड़ी सामने दरख़्त पर बैठे शिकरे (एक विशेष पक्षी) के जोड़े को कलोल करते हुए निहार रही थी। कमर पर लटकती कोर्निश किरपाण उसके शाही और अमीर जुझारू होने की गवाही भरती थी।
ल्युफरिक कितनी देर गौडीवा की पीठ को मंत्रमुग्ध होकर एकटक निहारता रहा था। उसका दिल करता था कि कौन सा वक्त हो, वह उस अजनबी को पीछे से जाकर अपनी बांहों में कसकर जकड़ ले। यह तो ल्युफरिक का घोड़ा ही बेवक्त हिनहिना पड़ा था जिससे न केवल ल्युफरिक की तंद्रा टूट गई थी बल्कि गौडीवा का ध्यान भी ल्युफरिक की ओर केन्द्रित हो गया था। गौडीवा अचानक चैंककर हरकत में आई थी। गौडीवा ने अपने सफेद शाइरी (योर्कशाइर, इंग्लैंड की पैदाइश वाले घोड़े की किस्म) घोड़े की लगाम खींचकर ‘गी गैन’ (घोड़े को दिया जाने वाला आदेश जिसका मतलब दायीं ओर पल्टी मारकर घूम) कहकर जब घोड़े को पीछे की ओर घुमाया ही था तो सोलह सत्रह वर्षीय ठाठें मारती जवानी की कच्चे नरम और फड़कते अंगों वाली ऐंगले सैक्सन (अंग्रेज और जर्मन लोगों के सम्मिश्रण से बनी नस्ल) नवयौवना को देखकर ल्युफरिक स्नौटी जंगल (शेरवुड राइज़ जंगल, नौटिंग्घम जहाँ कई सदियों बाद रौबिन हुड रहा करता था) के जंगली डाकुओं के हाथों लूटे गए अमीर व्यापारी की भाँति बस देखता ही रह गया था। हल्की-सी गुलाबी आभा में दमकता दूधिया रंग, तीखे-तीखे कटारों जैसे नयन-नक्श मानो रोमन छुरी से काट काटकर रखे गए हों। सैलो (स्लोह) की स्याह पहाड़ी (स्लोह के बाहर वाला वह विशाल काला पहाड़ जो आज भी मौजूद है जिसको बारूद से चीरकर एम 40 मोटरवे बनाया गया है) जैसी उभरी हुई छाती। संघाई जैसा नाक। नर्गिसी मोटे मोटे ममोले (एक पंछी जिसकी आँखें बहुत सुंदर होती हैं) नयन और नौरमंडी तीर-म्यान जैसी भौंहें। हसीन औरत गौडीवा बरछे की भाँति आदमी की छाती में गड़ जाती थी। कानों में कुंडल, याकूब जड़ा शेर की खाल का कमरकसा, बाहों में बाजूबंद और गले में बड़े-बड़े पवित्र मोतियों की माला जैसे गहने, गजगाह, हार-हमेल उसके शौकीन होने की गवाही भरते थे।
म्यान में से फुर्ती से गौडीवा ने खड़ग खींच ली थी, “खबरदार ! ऐ अजनबी तू कौन है ?“ वीरांगना स्त्री गौडीवा की सिंहनी जैसी गरजती आवाज में से शूरवीरता और शास्त्र चलाने की योग्यता के बिम्ब स्पष्ट विद्य मान होते थे। ल्युफरिक ने गौडीवा का परिचय लेने के बाद अपना परिचय करवाते हुए बताया था कि वह स्लोप्सबेरिया (शरोपशाइर) के गांव स्करौबीसबायेरिज़ 1⁄4901 ई. में रिचर्ड स्कर्ब द्वारा बसाया मौजूदा शरूज़बरी का प्रसिद्ध और धनाढ्य मीट का व्यापारी है और स्करौबीसबायेरिज़ से वायरिंगसकीर शिकार खेलने आया रास्ता भूल गया था। गौडीवा उसको आर्डन के जंगल की ओर ऐंगलो-सैक्सन निज़ाम ब्यूरमिगासां के गांव ब्यूरुमगासहाम (र्मिंघम) की ओर जाने वाले डिरिटऐंड के दरिया रीया (डिगबब और बर्मिंघम सिटी सेंटर में बने बुल्ह रिंग शाॅपिंग सेंटर वाला स्थान) की ओर जाती पगडंडी दिखाने के लिए अपने साथ ले चली थी। रास्ते में उनके बीच रस्मी बातें ही चल रही थीं कि एकाएक तेज़ आँधी चलने लग पड़ी थी। पहले बारिश और फिर बर्फ़ गिरनी शुरू हो गई। फिज़ा में तूफान क़हर बरपा कर रहा था।
स्लोपसबेरिया जाने को ल्युफरिक को कम से कम तीन दिन लग जाते। इसलिए, गौडीवा के कहने पर उसने मौसम की खराबी के कारण कुछ दिन गौडीवा के पास शरण लेना ही बेहतर समझा।
इन कुछ दिनों के ठहराव के दौरान ल्युफरिक गौडीवा की मेहमाननवाज़ी का आनंद लेते हुए उसकी अदायें, नखरे, दूरदृष्टि और सुन्दरता के अलावा अनेक गुणों का कायल हो गया था। गौडीवा योद्धाओं वाले वीरतापूर्वक कारनामों के अलावा ऊन बंटने, सिलाई, कसीदे, कढ़ाई और भोजन बनाने जैसे घरेलू कामों में भी निपुण थी। सोलह कला संपूर्ण और खूबसूरत स्त्री के साथ विवाह करवाने के लिए ल्युफरिक का मन ललचा उठा था।
गौडीवा के माँ-बाप की मार्सिया और लिनडम के आसपास कई सम्पतŸिायाँ बिखरी हुई थीं। बाल अवस्था में ही अनाथ हो जाने के कारण गौडीवा को विरासत में भारी जागीरें, गहने-जेवर और धन-दौलत मिल गई थी जिसकी देख-रेख करना गौडीवा के लिए अपने अनुभव की कमी के साथ साथ बाल्यावस्था होने के कारण कठिन हो रहा था। ऐंगलो सैक्सन कानून के तहत अकेली स्त्री को मर्दाना हिस्सेदारी के बिना या किसी प्रकार की भी बिसवेदारी से रहित ज़मीन-जायदाद रखने का अधिकार है। कौफस टंी के अलावा सनौटिंघम (नोटिंघमशाइर) की £30,मैरीगडूनम (न्यूवार्क) की £55 मूल्य की ज़मीन को मिलाकर कुल £160 कीमत की भूमि की गौडीवा अकेली मालिक थी जो उसको केवल मार्सिया ही नहीं बल्कि ऐंगलीका (इंग्लैंड) की सबसे अमीर महिलाओं की सूची में सबसे आगे ला खड़ा करती थी।
सम्पतŸिा को दोगुना करने, सुरक्षा और घर बसाने के मकसद से गौडीवा ने ल्युफरिक द्वारा दिया गया विवाह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। गौडीवा का भाई हैरोल्ड लीनडम का अहलकार बनकर वहीं टिक गया था। हैरोल्ड भी ल्युफरिक के साथ रिश्ता गांठने के लिए तत्पर था। गौडीवा की बहन वौलविया को वरौप (वूलहौप), बकनल और हैरे (वेलज़ और मिडलैंड के दरम्यान का स्थान जिसको इस समय हैरेफोर्डशाइर कहा जाता है) के अनेक इलाके मिल गए थे, जिस कारण अपने साधू पति के साथ वह उधर व्यस्त रहती थी। गौडीवा के हिस्से गलैवम (ग्लौस्टर), कौफस टंी और विरोकौनियम (वरौकास्टर) की ज़मीनें आई थीं। वह आग बरसाती योवन की ऋतु में अकेलापन भी महसूस करती थी।
विवाह के उपरांत ल्युफरिक स्लोपसबेरिया छोड़कर कौफस टंी में गौडीवा के साथ रहने लग पड़ा था। गौडीवा के पुरखों ने ही पुरानी अंग्रेजी के शब्द कौरिलटाउवी (जिसका अर्थ खेतीबाड़ी करने वाले लोगों की ज़मीन होता है) से बदलकर इस जगह का नाम सैक्सन भाषा के शब्द कौफस टंी में परिवर्तित कर दिया था। गौडीवा के पूर्वज और मार्सिया के पहले सैक्सन राजा ओफा ने 770 में यहाँ की धरती पर आधिपत्य जमाकर बाड़ के रूप में आसपास पेड़ बो दिए थे। जिससे लोगों का ओफा के राज की हदबंदी का पता चल जाता था। यह ओफा के पेड़ों से ही इस जगह का नाम किंग ओवा के टंी (राजा के दरख़्त) अर्थात कौफस टंी पड़ गया है।
कौफस टंी ल्युफरिक को स्लोप्सबेरिया की अपेक्षा कहीं अधिक रास आ गई है। कौफस टंी में रहकर ल्युफरिक अपनी जागीर की हदों को फैलाता जा रहा है। आहिस्ता-आहिस्ता उसने राज महलों में अपनी पकड़ पहले से अधिक मजबूत कर ली है। ल्युफरिक ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और राजनीति के साथ रफ्ता-रफ्ता राजा कनिऊट से इनाम और विशेष पदवियाँ प्राप्त की हैं। पिछले महीने तो कनिऊट ने ल्युफरिक को खुश होकर प्रशस्ति-पत्र के साथ नौर्वे का सबसे कीमती और उम्दा नस्ल का साऊर का कुतŸा उपहार के तौर पर दिया था।
कौफस टंी के अपने महल में पहुँचकर ल्युफरिक ने अपनी निगरानी में कुर्क अमीन ओथो के साथ मिलकर उगाही के धन वाला सिक्कों से भरा डिब्बा मालखाने की तिजोरी में रखवाया अैर भोजनगृह की तरफ खाना खाने चला गया। भोजन के उपरांत ल्युफरिक बहीखाते लेकर सीधा अपने ख्वाबगाह की ओर गया।
दिनभर का अपना सारा हिसाब-किताब करके जब ल्युफरिक ने हिन्दसों (अंकों) का जोड़ किया तो उसकी हैरानी की सीमा न रही। इस बार उसकी उम्मीद से भी अधिक धन एकत्र हुआ है। ल्युफरिक ने खुश होते हुए अपने पास पड़ी साकी (जापान की पुरातन शराब) का मोटा-सा पैग भरा और एक ही सांस में खींच गया। उसके ठंड से बर्फ़ हुए शरीर के अंदर जब एकदम तासीर की गरम गरम शराब गई तो उसको धुड़धुड़ी आ गई। उसने अपने शरीर को एकबार फिर झटका और रोमनी बतŸाख के पंख से बनी कलम को स्याही में डुबोकर शाही खजानची को हिसाब-किताब का पैगाम लिखने लग पड़ा। इस बार भेजी जाने वाली रकम को उसने बड़ा और गाढ़ा करके लिखा। बाद में उसको अंडरलाइन करने का ख्याल आया तो उसने कुल जोड़ के नीचे एक लकीर खींच दी। रुक्के को दोबारा पढ़ते हुए ल्युफरिक ने एक और पैग बनाया और उसको पीते पीते ही सारा मज़मून पढ़ लिया। लाल पिघले सिक्के की मोहर लगाकर रुक्का सीलबंद कर दिया।
कल होने वाली घुड़ दौड़ों, मुर्गायुद्ध, शराब, जुए, तम्बाकू और चकले की रंडियों से मिलने वाला कर तय होने के कारण ल्युफरिक के खाते में पहले से ही आया हुआ है। पिछले साल सूखा पड़ जाने के कारण फसलें नष्ट हो गई थीं। पर इस बरस मौसम काश्तकारों पर मेहरबान रहा है। अगले महीने फसलों की कटाई खत्म होने के बाद तो कर और भी अधिक बढ़ जाएँगे। ल्युफरिक कयास लगाता हुआ गदगद हो उठा। धन को संभालने की योजनाएँ बनाता जाम खत्म करके ल्युफरिक ने ख़त वाला लिफाफा और हाथ में पकड़ा प्याला मेज़ पर रख दिया और कुछ देर आँखें मूंद कर एक अकथनीय-से सरूर को अनुभव करने लगा।
कुछ देर बाद उसने आँखें खोलीं और उमंग में भरकर ऊँची आवाज़ में चिल्लाया, “हाँ ! अब आएगा मज़ा ! बादशाह कैनिऊट बहुत खुशहोगा।"
इसके साथ ही ल्युफरिक अपने लिए एक और जाम बनाता हुआ अपने पीछे पलंग पर लेटी अपनी पत्नी गौडीवा के साथ उसकी ओर देखे बग़ैर अपनी खुशी साझी करने लगा, “गिफू ?... चैधराइन... ओ गूफी... ईवा ? तुझे पता है, इस बार पिछली बार से तीन गुणा अधिक लगान इकट्ठा हुआ है।"
“हाँ, आपने अवाम को पानी का एक और टैक्स जो लगा दिया है। इसलिए लोग अब हफ्ते में एक बार शुक्रबार को स्नान करते हैं और औरतें एक दिन सोमवार को कपड़े धोती हैं। नगर निवासी सप्ताह में तीन दिन फाके काटते हैं।"
गौडीवा के बोलने के अंदाज़ में तंज छुपा हुआ है, जिसको नीम शराबी हुआ ल्युफरिक समझ नहीं सका और गुस्सा हो उठा। ल्युफरिक ने अपने मन के अंदर की कड़वाहट को थूक कर बाहर फेंका, “मेरा बस चले तो मैं इनकी सांसों पर भी नया लगान ठोक दूँ। भैण के खसम !... मादर... नंगे लोग !!!"
गौडीवा ने कोई उतर नहीं दिया और चुपचाप करवट बदलकर बिस्तर पर लेटी रही। ल्युफरिक ने अपना प्याला छलकाया तो उसमें से बुलबुले उठे और शराब के ऊपर झाग की एक परत बन गई। ल्युफरिक ने गौडीवा का ध्यान खींचने के लिए आमंत्रण दिया, “थोड़ी शराब लोगी ?"
“नहीं। मैं घुड़सवारी करके बहुत थक गई हूँ और मुझे बहुत नींद आ
रही है।"
“कोई बात नहीं, छोटा-सा पैग ले ले बिल्लो... नींद अच्छी आ जाएगी... मैं डालूँ ?" ल्युफरिक ने नए प्याले के मुँह से सुराही लगाते हुए पूछा।
“नहीं, कोई ज़रूरत नहीं। मुझे ज़रूरत होगी तो मैं खुद ले लूँगी।" गौडीवा ने करवट बदल ली।
“मेरी माना तो बूंदभर ले लो... विदेशी शराब है। यह मुझे भिक्षु ओसवाल्ड ने दी है। उसको उसका कोई मित्र संत गौडरिक देकर गया था... यह घर की निकाली सिक्के जैसी गाढ़ी है... मैंने फाहा डुबोकर देखा है, जरा भी नहीं रुकता। दूसरी बार कसीदकर निकाली हुई लगती है। उंगली भिगोकर लौ के पास करें तो झट से आग पकड़ती है। धर्म से कलेजा चीरती जाती है, रोड़ी की लकीर की तरह। अंदर जाकर गिरती है तो दिमाग को भभूका-सा चढ़ता है। एकबार तो तुम्हारे छक्के छुुड़ा देगी। हठ न कर, ले ले ज़रा सी... और हवा-प्याजी हो जा, कैसे बूढ़ी भैंस की तरह पसरी पड़ी है।“ इतना कहकर जब ल्युफरिक ने पीठ घुमाकर गौडीवा की ओर मुँह किया तो देखा कि वह तो उसकी ओर पीठ किए पड़ी है। मच्छरदानी न लगी होने के कारण गौडीवा सिर से पैरों तक साफ़ दिखाई दे रही है। वह गौडीवा को निहारता हुआ आहिस्ता-आहिस्ता प्याला घूंट-घूंट करके पीने लग पड़ा।
कमरे में जलती मशाल के सतरंगी उजाले में गौडीवा का शरीर बेहद खूबसूरत लग रहा है, मानो अँधेरी रात में जुगनू चमकते हों। उसके गज़ गज़ लम्बे सूरज की किरणों जैसे सुनहरी बाल पूरे बिस्तर पर बिखरे पड़े हैं, जैसे किसान ने जल्दबाजी में बोझ न सहते हुए फूस की वजनी गांठ ज़मीन पर फेंककर बिखेर दी हो या टीले पर फलियाँ सूखने के लिए फैला रखी हों।
ल्युफरिक सोचता है कि दासियाँ - ओलरिका और हाइलडा सही फरमाती हैं। उनकी यह बात मान लेने लायक है कि गौडीवा के भारी, घने और लम्बे बालों में कंघी करते हुए उनकी कलाइयाँ दुखने लग जाती हैं।
ल्युफरिक ने अपना अन्तिम घूंट खत्म किया और अपना मुकुटनुमा टोप सिर से उतारकर मेज़ पर रख दिया। चोगा उतारा और नीचे पहना हुआ चमड़े का कवच (बुलटप्रूफ जैकेट की तरह चाकू-छुरी के वार से बचने के लिए जो उस समय रजवाड़े पहना करते थे) खोलता हुआ लड़खड़ाते कदमों से वह बिस्तर की ओर बढ़ा।
पलंग पर बैठते ही ल्युफरिक ने बायें हाथ से गौडीवा के बिखरे-फैले बाल सिरहाने की ओर सरकाकर इकट्ठे कर दिए। आज एक बार फिर ल्युफरिक को अपनी सुहागरात वाला वही दृश्य स्मरण हो आया। तब भी गौडीवा इसी प्रकार नींद में बोझिल सुहागरात के जोड़े में लिपटी इसी पलंग पर लेटी थी। गौडीवा ने दहेज में आया कौफस टंी और सारी जायदाद का पट्टा ‘आगाज़-ए-हयाती’ उपहार के रूप में आत्म-समर्पण के समय ल्युफरिक के सुपुर्द कर दिया था। ल्युफरिक ने भी मैडलीओडम, हीसी, वूलियाहीगौन, लोडलो के अलावा तमाम स्लोप्सबेरिया और स्क्रौबीसबायरिज़ की जागीरों के सनद गौडीवा को मुँह दिखाई की रस्म के तौर पर दिए थे। उस रात गौडीवा का रूप भोगकर ल्युफरिक को प्रतीत हुआ था मानो उसने स्वर्ग के झूले का आनन्द लिया हो। खुशी में मदमस्त होकर उसने सुबह के समय ‘शादी सम्पन्नता’ के तोहफ़े के तौर पर गौडीवा को घरबार की चाबियों का सारा गुच्छा दे दिया था।
इन दो वर्षों में गौडीवा की सुंदरता में इज़ाफा और उसके जिस्म का सेक पहले से कई गुणा अधिक हो गया है। गौडीवा के मुकाबले ल्युफरिक काफ़ी ठंडा पड़ गया है। ल्युफरिक शीघ्र ही बिस्तर में गिरकर उस समय ठंडा हो जाता है जिस समय गौडीवा उतŸोजना की आग में जलना प्रारंभ कर ही रही होती है। ल्युफरिक अक्सर सेज पर गौडीवा को सुलगते हुए देखता है तो उसको ठंडा करने के यत्न करता है। पर कुदरत के नियमों के आगे अक्सर उसका कोई उपाय, कोई ज़ोर नहीं चलता। वह अपनी निष्फलता और अपने अंदर उपजी हीनभावना को शराब पीकर छिपाने की कोशिश करता है।
ल्युफरिक के हाथ अपने आप ही गौडीवा के अंगवस्त्र की डोरियों को खोलने के लिए बढ़ गए। कांपते हाथों से ल्युफरिक ने गौडीवा की कमर को कस रही गांठ को खोला और फिर डोरियों के कांटों को दायें हाथ की तर्जनी डालकर काजों में से एक एक बटन को निकालते हुए गौडीवा की गर्दन की ओर बढ़ने लगा।
गौडीवा न हिली.. न डुली... न ही उसके मुँह से कोई शब्द निकाला। न सहमति प्रकट की, न विरोध किया। वह जैसे लेटी थी, उसी प्रकार ल्युफरिक की ओर पीठ किए लेटी रही। ल्युफरिक ने एक एक करके गौडीवा के गर्दन तक जाती सारी डोरियाँ खोल दीं और गौडीवा की चोली के दोनों पट अपने दोनों हाथों में लेकर किताब खोलने की तरह खोलकर गौडीवा की पूरी पीठ नंगी कर दी।
पलंग के सिरहाने के पास लगी मशाल की रौशनी और तेज़ जो गई।
काले रंग के सिल्की सीनाबंद में टिका गौडीवा का सफ़ेद प्याज के छिलकों जैसा मुलायम चमकता अर्द्धनग्न शरीर मशाल की रौशनी में सुनहरी रंगत लेकर ऐसा लगने लगता है मानो काले रंग की बेंत के छिक्कु में पुखराज हीरा पड़ा होता है। ल्युफरिक ने गौडीवा की पूरी पीठ को अपना लरजता हाथ फेरकर सहलाया... और निहारा। अधिक घुड़सवारी करने के कारण गौडीवा कुछ दुबली हो गई है। उसके कसे हुए अंग कुछ ढीले पड़ गए हैं। कमर के नीचे दायें-बायें का मांस भी काफ़ी हद तक ढल गया है। पर फिर भी उसके नितम्बों का आकर्षण पहले की भाँति बरकरार है। गौडीवा की मखमली चमड़ी, शीशे की चैंध की तरह चमक रही है।
गौडीवा की पीठ को चूमता और हल्के हल्के दांत गड़ाता हुआ ल्युफरिक बोला, “गिफ्फू ? मेरा चितŸा करता है कि मैं आज अपने होंठों और जीभ से तेरी कमर पर मार्सिया का नक्शा खींच दूँ। फिर तुझे यूँ ही पीछे से कसकर बाहों में भर लूँ और महसूस करूँ जैसे सारा मार्सिया मेरे आगोश में आ गया हो। मैं तुझे पूरे ऐंगलीका की महारानी बनाना चाहता हूँ। हीरे-जवाहरात जड़े सोने के तख़्त पर अपनी जांघों के बीच तुझे बैठी देखने की मेरी ख्वाहिश है।“
गौडीवा ने न कोई हुंकारा भरा, न इन्कार किया, न इसरार किया, न ही कोई इकरार या इज़हार। ऐसा लगता है, मानो गौडीवा के लब सिल दिए गए हों। या कोई हावभाव व्यक्त करने का सामथ्र्य उसके अंदर खत्म हो गया हो। एक मानसिक रोगी वाली स्थिति में से वह गुज़र रही है। जेहन में मानो किसी ज्वारभाटे को गौडीवा ने रोक रखा हो।
ल्युफरिक ने सांय सांय करते वेग के बहाव में आकर गौडीवा को बाजुओं से पकड़कर उसके बदन को अपनी ओर घुमा लिया। बिस्तर पर करवट लेकर गौडीवा उसके सम्मुख हो गई। रू-ब-रू। किंतु गौडीवा की आँखें मुंदी हुई हैं। आनन्द में नहीं, रोष में।
जैसे शिकारी पंछी-परिंदों को बलहीन करने के लिए गुलेल पत्थर फेंकते हैं, बिल्कुल वैसे ही ल्युफरिक ने उतावली में अपने और गौडीवा केउतारे हुए वस्त्र एक एक करके बिस्तर में से बाहर फेंके जो सामने कमरे की दीवार से टकराये.... और... फिर वे फर्श पर यूँ गिरे जैसे कोई चिडि़या घ् ाोंसला बनाने के लिए अपनी चोंच में तिनका ले जा रही हो और उसकी चोंच से छूटकर तिनका धीमी गति से रफ्ता-रफ्ता अर्श से फर्श पर आ गिरा हो।
मशाल की तपिश और तेज़ हो गई। मशाल का पिघलता हुआ तेल भाप छोड़ने लगा। उसमें से अंगारे पैदा होने लगे। मशाल की अग्नि और अध् िाक प्रचंड, तीव्र, वेगमयी होकर भड़क उठी। जलती हुई मशाल की लपटें लपलपाने लगीं और फिर जैसे हवा का कोई अनियंत्रित झोका आया हो, मशाल की अग्नि एकाएक भक्क से भड़की और मशाल बुझ गई।

अब ल्युफरिक लगभग सो चुका है। उसके खर्राटों का शोर रात के वातावरण में गूंज रहा है। गौडीवा ने ल्युफरिक को हिलाकर पूछा, “इजाज़त हो तो मैं अपने कपड़े पहन लूँ ?... मुझे बहुत ठंड लग रही है।"
“ऊँ...। जो मजऱ्ी कर। पहले कौन-सा तुम मेरे सारे हुक्मों का पालन करती है।“ ल्युफरिक ने अर्द्धनिद्रा में जवाब दिया।
बेलिबास गौडीवा उठी और वस्त्र पहनकर वापस पलंग पर सो गई।
अगली सुबह गौडीवा के जागने से पहले ही ल्युफरिक दीवान लगाने के लिए रवाना हो गया। मार्किट डे से अगले दिन शुक्रवार को पूरा दिन और पूरी रात लोग जश्न मनाते और मस्तियाँ करते हैं। गीत संगीत, रंगरास की महफि़लें सजती हैं। नृत्य होते हैं। खेलों, तलवारबाजियों के मुकाबले और कुश्तियाँ होती हैं। शराब के दौर चलते हैं और सारे कौफस टंी वाले रात को एक मैदान में तम्बाकू की धूनी (अलाव) लगाकर बैठ जाते हैं। तम्बाकू वाला धुआँ जब श्वांस क्रिया के दौरान नाक में चढ़ता है तो अजीब-सा नशा अनुभव होता है। सब स्त्रियाँ-पुरुष इस नशे का आनंद लेते हुए अपने आप को किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँचा हुआ महसूस करते हैं। जुए खेले जाते हैं। इसी दिन गुलामों और स्त्रियों की खरीदफरोख़्त भी होती है। या निर्धन लोग अमीरों को अपनी पत्नियाँ, बहुएँ और बेटिया धन के बदले में किराये पर भी दे दिया करते हैं। सदियों से यह दस्तूर चला आ रहा है। जूलियश सीज ़र के समय से। कभी कभार इन समारोहों में गौडीवा भी ल्युफरिक के साथ शिरकत करने के लिए आ जाया करती है। ऐसे अवसरों पर कई बार लड़ाई-झगड़े भी हो जाते हैं। ल्युफरिक मौके पर ही दोषी को सज़ा सुनकार योग्य दंड दे दिया करता है।
गौडीवा लगभग दोपहर तक निर्जीव-सी होकर निद्रा में होने का ढोंग करके पड़ी रहती है। ओसबरगा, ऐडिथ और माटील्डा आदि बांदियाँ अनेक बार उसकी ताबेदारी के लिए आईं। परंतु वह उनसे बिना कोई सेवा लिए उन्हें उल्टे पांव लौटती रही।
दोपहर के बाद गौडीवा होश में आई तो उसे अपने वजूद में से दुर्गन्ध आती महसूस हुई। गौडीवा ने दासी की मार्फ़त अपने घोड़ों के पालक बलज़ाक को संदेश भिजवाया कि घोड़ा तैयार कर दे, क्योंकि वह नदी पर स्नान करने जाना चाहती है। वैसे तो गौडीवा का निजी हमाम भी इजिप्थ (मिस्र) से मंगवाकर ल्युफरिक ने बहुत आलीशान बनवा रखा है। पर गौडीवा को कुदरत का बनाया हमाम अधिक भाता है। गरमियों के मौसम में अक्सर गौडीवा झरनों और नदियों में नहाना और तैरना पसंद करती है।
बलज़ाक तबेले में से गौडीवा के प्रिय सफ़ेद घोड़े कैलट पर काठी डालकर ले आया। गौडीवा तैयार होकर आई तो बलज़ाक घोड़े की लगाम पकड़े, गर्दन झुकाये खड़ा मिला। बलज़ाक के बायीं भुजा पर खुदा हुआ बाज़ जिसके पैर रस्सी से बंधे हए थे, गौडीवा को बहुत अच्छा लगता है।
गौडीवा ने बलज़ाक की ओर हसरतभरी निगाहों से देखा। गौडीवा के तन बदन में एक बिजली-सी लरज गई। घोड़े की जीन काठी ठीक से कसी है कि नहीं, इसका निरीक्षण करने के लिए बलज़ाक ने उसको अपनी मजबूत भुजाओं से हिला डुलाकर देखा तो गौडीवा के मन में आया कि काश! ये मजबूत भुजाएँ उसकी देह को अपनी गिरफ्त में ले लें। गौडीवा को अपने शरीर में एक पारा सिर से पैरों तक खून में मिलकर चक्कर लगाता महसूस हुआ।
यह भुजा पर उकेरा हुआ बाज़ ‘सीडनर’ (बीजक, बीज बोने वाले) कबीले की मोहर-छाप है। इन बीजक कबीले वालों को वंश-वृद्धि जाति के लोग भी कहा जाता है। बाज़ वाला पहचान-चिवन वे एक साल की आयु वाले हर बच्चे की भुजा पर दाग देते हैं। दस साल की उम्र तक बीजकों का बच्चा युद्ध-विद्या सीखता है और शस्त्रकला में निपुणता प्राप्त करता है। उसके बाद के पाँच साल वेश्याओं की संगत में रहकर स्त्री वशीकरण के गुर, तहजीबी गुफ्तगू, अलौकिक क्रीड़ायें और काम आसनों का अभ्यास करते हैं। पंद्रह वर्ष की आयु में उन्हें नीलाम कर दिया जाता है। बीजक कबीले के लोग शारीरिक तौर पर हृष्ट-पुष्ट होने तथा अपनी मर्दाना ताकत के कारण प्रसिद्ध हैं। यही कारण है कि इस जाति के मर्दों को ‘बुलमैन’ (बैल मर्द) भी कहा जाता है। इन लोगों को विवाह करवाने की इजाज़त नहीं है। इस कबीले के दस्तूर के अनुसार लड़के को पैदा होते ही माँ का दूध नहीं चुंघाया जाता, बल्कि जन्म घुट्टियाँ, मेवे, जड़ी-बूटियों के काहवे, वायग्रा (मर्दाना शक्ति को बढ़ाने वाली दवाइयाँ) तत्व भरपूर पौष्टिक और खनिज पदार्थ दिए जाते हैं। जब पुत्र जवान हो जाता है तो पिता उसको गुलाम मंडी में ले जाता है और निलामी करके बेच देता है। अमीर और रजवाड़े लोग इनको खरीद कर ले जाते हैं। इन ज़र-खरीद गुलामों का मुख्य कार्य अमीरों की स्त्रियों को यौन सुख प्रदान करना और उन्हें कामुक तृप्ति करवाना होता है जो नपुंसक हो चुके धनाढ़य व्यक्ति करने में असमर्थ होते हैं। बीजकों को बिना किसी रोकटोक के आठों पहर स्त्रियों के पास हरमों में जाने की अनुमति होती है। इन बुलमैनों का इस्तेमाल संतान उत्पतŸिा के लिए राजे-राणे सदियों से करते आए हैं। इन गुलामों द्वारा गर्भवती की गई औरत के बच्चे को देखने का इन्हें खुद को भी हक नहीं होता। उस बच्चे को रानी का पति अपना नाम देकर अपनी संतान मानकर पालता है। जिस राजा के औलाद नहीं होती, यह बुलमैन उसकी रानी के साथ दिन रात तब तक लेटा रहता है, जब तक वह हामला नहीं हो जाती। यद्यपि इसके लिए कई कई दिन और कभी कभी तो महीने भी लग जाते हैं। रानी की कोख हरी किए बग़ैर छोड़कर जाने वाले बुलमैन को मौके पर ही मौत के घाट उतार दिया जाता है। रानियों के बच्चा ठहरने के बाद बुलमैन को फिर मंडी में बेच दिया जाता है, जहाँ उसे कोई दूसरा ज़रूरतमंद खरीदकर ले जाता है। जब बुलमैन कमजोर या व्यर्थ हो जाते हैं तो इन्हें ज़हरीला तीर मारकर खत्म कर दिया जाता है। यह बुलमैन अंधे कुएं जैसे होते हैं। हांक लगाओ तो अंदर ही जज्ब हो जाती है, बाहर नहीं आती। एक मालिक का भेद दूसरे को नहीं बताते। दरियाओं, समुन्दरों से भी गहरे इनके दिलों में छिपे रहस्य इनके अंदर ही दफ़न होकर खत्म हो जाते हैं। अपने पूरे जीवन में इन बुलमैनों को केवल एक स्त्री को चुनना होता है जिससे पैदा हुए पुत्र को ये अपने कुल-देवता के सम्मुख अर्पण करके कबीले को दे देते हैं। जिसे बड़ा होकर भविष्य का बुलमैन बनना होता है। इस प्रकार कबीले को कभी नारी की आवश्यकता नहीं पड़ती। विशुद्ध मर्दाना कबीला है यह। जिस महिला का बच्चा कबीले में पहुँचता है, उसको एक और संतान देकर बुलमैन आगे बिक जाते हैं।
स्वस्थ और ज़ोरावर बुलमैन रखने का सनातनी रिवाज़ अमीरी और उच्च-पद का चिवन भी समझा जाता है। बलज़ाक को भी ल्युफरिक लूनियनबर्ग की मंडी से बरसों पहले खरीदकर लाया था। बलज़ाक की आमद के बाद गौडीवा के रुखसारों की लालिमा और अधिक गहरी हो गई हैं और उसकी सुंदरता और निखर आई है।
काठी के मखमली गद्दीदार झालरों वाले जीन को ठीक करके बलज़ाक घुटने टेककर धरती पर बैठ गया और उसने अपने दोनों हाथों की हथेलियाँ एक दूजे में फंसाकर गौडीवा के लिए घोड़े पर चढ़ने की खातिर एक सीढ़ी बना दी। किसी स्वप्नमयी दुनिया में से वापस यथार्थमयी दुनिया में पहुँचकर गौडीवा बलज़ाक के हाथों पर घुटनों तक पहने चमड़े के बूट वाला पैर रखकर घोड़े पर सवार हो गई, “अगुवाई।"
गौडीवा का हुक्म सुनकर बलज़ाक ने पालतू शाहबाज के पैरों में से रस्सी खोलकर उसको अंबर में उड़ा दिया और अपने मजीठे घोड़े पर सवार होकर गौडीवा के आगे उसने अपना घोड़ा लगा लिया।
गौडीवा चार महिला सैनिकों की छोटी-सी टुकड़ी लेकर संत इगविंग की ओर से अपने मुर्शद ईओफ्ज के नाम पर बसाये नगर ईओफ्जहैम (हैम यानि घर, अर्थात ईओफ का घर, अब का इवशम नगर) की ओर रवाना हो गई। आसमान में उड़ता बाज़ उनका मार्गदर्शन कर रहा है। बाज़ की स्थिति को देखकर बलज़ाक जंगली राहों में अपने लिए रास्ता ढूँढ़ता जा रहा है। गौडीवा के पीछे जंगजू और बहादुर अनुभवी महिला सिपाही और आगे सुरक्षा के लिए पहलवानी डीलडोल वाला बलज़ाक भी अपने घोड़े पर नंगी तलवार और तीर कमान उठाये जा रहा है।
पहले पहले परम्परा अनुसार गौडीवा केवल महिला सैनिकों का दस्ता ही साथ ले जाया करती थी। एक बार घोड़ा बिगड़ गया और गौडीवा उस पर नियंत्रण न रख सकी। घोड़े पर से गिरकर गौडीवा को चोट लग गई थी। उसके टखने में चोट आ गई थी और कई दिन गौडीवा को ज़हमत भोगनी पड़ी थी। उसके पश्चात गौडीवा ने दस्तूर बना लिया कि जब भी कहीं वह बाहर जाती है तो बलज़ाक को हमेशा साथ ले जाती है। बलज़ाक अडि़यल से अडि़यल घोड़े को भी काबू करने में माहिर है। बचपन मंें ही मुँहज़ोर और बिगड़ैल आवारा जंगली घोड़ों के बीच पला-बढ़ा है। और फिर, बलज़ाक युद्धविद्या में भी महारत रखता है और सबसे बड़ी बात यह मर्द है - जवान, सुंदर-सुशील, मध्यम कदवाला, भूरे रंग की काली-स्याह कौडि़यों वाले सांप जैसी आँखों वाला मर्द। जिसको अपने आसपास देखना गौडीवा को अच्छा लगता है। यद्यपि उन दोनों के बीच मालिक और नौकर के सिवाय अन्य कोई रिश्ता नहीं है।
ईओफ्जहैम की झील पर पहुँचकर बलज़ाक के हवाले घोड़े करके गौडीवा और उसकी अंगरक्षक स्त्रियाँ झील की ओर चल पड़ीं। बलज़ाक घोड़े चराने में व्यस्त हो गया।

गौडीवा ने अपने वस्त्र उतारकर दरख़्त पर टांग दिए और स्वयं दिगंबर होकर पानी में घुस गई। नदी के ठंडे पानी में गौडीवा को अपना शरीर तपता महसूस होता है। उसने सिर से पैरों तक अपने जिस्म को देखा, फिर पानी में पड़ रहे साये में से कुछ खोजने लगी। उसको लगा मानो उसके अंदर कुछ है। क्या ? उसका उŸार वह खुद भी नहीं जानती। पर है कुछ अवश्यं शायद कोई खोलता वेग...तपता लावा... जवानी की अगन या शायद काम भूख ! काफ़ी देर डुबकियाँ लगाने और तैरने के बाद वह नग्नावस्था में पानी से बाहर निकली और नदी किनारे बने झरने के नीचे जा खड़ी हुई।
तभी, एक तेज़ हवा का झोंका आया और गौडीवा के सारे वस्त्र उड ़कर बलज़ाक के मुँह पर जा गिरे। बलज़ाक गौडीवा के चोगे को हाथों में पकड़े देखता हुआ दुविधा में पड़ गया, “कपड़ों के बग़ैर लेडी गौडीवा कैसे आएगी ?“ नदी के नज़दीक जाने की बलज़ाक को आज्ञा नहीं है। वहाँ केवल महिला सैनिक ही जा सकते थे। बलज़ाक महिला सैनिकों के आकर कपड़े ले जाने का इंतज़ार करने लगा।
हवा अपना रुख बदलकर और तेज़ बहने लगी और आँधी तूफान में बदल गई। एक महिला सैनिक को जब आभास हुआ कि लेडी गौडीवा के वस्त्र उड़ गए हैं तो वह शेष महिला सैनिकों को संग लेकर हवा की गति की दिशा में वस्त्रों को खोजने चली गईं।
जब अधिक देर हो गई तो बलज़ाक नदी की ओर वस्त्र महिला सैनिकों को देने के उद्देश्य से चल पड़ा। नदी के निकट आकर बलज़ाक को जब कोई महिला सैनिक न दिखाई दी तो उसने चुपके चुपके उसी दरख़्त पर कपड़े टांग दिए, जहाँ से वे उड़े थे। अचानक बेलगाम हुई बलज ़ाक की निगाह झरने की ओर चली गई। गौडीवा पहाड़ी से गिरते पानी के नीचे निर्वस्त्र अपनी मस्ती में डूबी एक बुत बनी खड़ी थी। बलज़ाक ने एकदम अपनी नज़रों को लगाम लगाई और तेज़ कदमों से घोड़ों की ओर चल पड़ा।
वस्त्र न मिलने की सूरत में मायूस होकर वापस लौटी महिला सैनिकों ने जब उसी दरख़्त पर पड़े गौडीवा के वस्त्र देखे तो वे दंग रह गईं। उन्हें इस करिश्मे का भेद समझ में न आया और संत ईवौफ की जय-जयकार होने लग पड़ी थी।
दिन छिपते ही जब गौडीवा और महिला सैनिक वापस लौटीं तो बलज़ाक ने घोड़े उनके हवाले किए और सब उन पर सवार होकर कौफस टंी की ओर चल पड़े।
कौफस टंी की सरहद में प्रवेश करते ही गौडीवा का लोगों के एक भारी हुजूम ने स्वागत किया। लोगों का एक विशाल जनसमूह गौडीवा को सलाम करने लगा। फरियादी उसका राह रोककर अपने दुखड़े बताने लगे, अपनी समस्याओं से गौडीवा को परिचित करवाने लगे। कुछ गौडीवा के उपासक, प्रशंसक उसको तोहफ़े भेंट करने के लिए लेकर आए। कौफस टंी के लोग गौडीवा को एक नेक, दरियादिल, इंसाफपसंद और दयालू औरत मानते हैं और इसी कारण लोगों के मन में गौडीवा के प्रति आदरभावना है।

ल्युफरिक के बारे में उनका दृष्टिकोण इससे बिल्कुल उलट है। वे ल्युफरिक को तानाशाह, ज़ालिम और निर्दयी समझते हैं। क्योंकि ल्युफरिक द्वारा उगाहे जाने वाले नाजायज लगान हैरेगेल्ड से जनता बहुत तंग और दुखी है। यह लगान उनको अपने सिर पर लटकती तलवार प्रतीत होता है। अनेक लोगों ने आकर गौडीवा के सम्मुख इस लगान को माफ़ करवाने की फरियाद की, “अंगरक्षकों का इस्तेमाल बादशाह करता है, हम तो नहीं। जिस सेवा का हम उपयोग नहीं करते, उसका खर्च हम क्यों भरें ? बादशाह अपने शाही खजाने में से इस खर्च को उठाये।"
लोग रोये, गिड़गिड़ाये। उन्होंने गौडीवा के आगे प्रार्थनाएँ और याचनाएँ कीं। गौडीवा से जनता की चीख-पुकार सही न जा सकी। उसका हृदय इस प्रकार बिंध गया मानो किसी ने तीरों से छलनी कर दिया हो। गौडीवा ने आवाम को इस संबंध में ल्युफरिक के साथ प्राथमिकता के आधार पर विचार करने का भरोसा दिलाया और शीघ्र ही कोई ठोस कदम उठाने का वायदा किया।
महल में पहुँचकर जब गौडीवा घोड़े पर से उतरी और बलज़ाक ने घ् ाोड़े की लगाम पकड़ी तो गौडीवा रौब से बोली, “खादिम ! अपनी सीमायें पार करने की कोशिश न किया करो।"
“लेडी गौडीवा, मैं अपनी हदों को भलीभाँति जानता हूँ और मैंने अपनी मर्यादा का कभी उल्लंघन नहीं किया।“ बलज़ाक ने सिर झुकाकर नरमी से उतŸार दिया।
“तो फिर आज जब मैं चश्मे के नीचे नहा रही थी तो... ?“ हीरे-मोतियों से मढ़े चमड़े के कमरकसे में दोनों हाथों के अंगूठे फंसाकर कमर पर हाथ रखे खड़ी गौडीवा का आँख से बात करने का लहजा तुरंत बदलकर याराना हो गया।
बलज़ाक ने गौडीवा की आँखों में अपनी चमकती आँखें डालीं तो उसने देखा कि गौडीवा की सागर जैसी आँखों में वासना का सैलाब उमड़ रहा है। वह डर गया। गौडीवा थोड़ा मुस्कराई। मंद मंद हँसी। गौडीवा की गालों में पड़ते गड्ढ़े उसको और ज्यादा खूबसूरत बनाते हैं। उसकी पाजी मुस्कान किसी शरारत की सूचक लगती है।
गौडीवा नाक के आगे उंगली घुमाती हुई शरमा कर गर्दन झुकाये होंठों को चबाती हुई अदा के साथ दौड़कर महल की ओर भागी। बलज़ाक हिरनी की भाँति कुलांचे भरती गौडीवा के बांके नितम्ब निहारता रहा। दरवाज़े के पास जाकर गौडीवा ने पीछे मुड़कर बलज़ाक की ओर देखा और खिलखिला कर हँसती हुई अंदर प्रवेश कर गई। बलज़ाक इस भेदभरी बात का अर्थ न समझ सका।
एक दिन भरपूर सभा लगाने के उपरांत ल्युफरिक रात को महल में वापस लौटा तो मशालें जलाने का समय हो गया। खाना बाहर खाकर आया होने के कारण सीधे ही वह आरामगाह की ओर गया और वस्त्र बदलकर गौडीवा के साथ पलंग पर जा लेटा। मच्छरदानी लगा ली गई। गौडीवा सो चुकी है। ल्युफरिक टकटकी लगाकर गौडीवा को देखने लगा। वह कितनी ही देर गौडीवा के हसीन चेहरे को निहारता रहा। जितना वह देखता, उतना ही उसको गौडीवा सुंदर लगती। ल्युफरिक से रहा नहीं गया और उसने गौडीवा की गाल को चूम लिया। ल्युफरिक के पपड़ी जमे खुरदरे होंठों के स्पर्श से गौडीवा जाग गई।
“गिफ्फू ! तू सोई हुई बहुत आकर्षक लगती है, मेरी जान।“
“अच्छा ? फिर तो सदा की नींद ही सुला दो।“ गौडीवा ने ताना
मारा।
“जानम ! तेरी सांसों में तो मैं सांस लेता हूँ। तूने ऐसा क्यों कहा ?“
“प्रजा को भी तो मार रहे हो। इन्सान तो तुम्हारे लिए कीड़े-मकौड़े
हैं।"
“क्या मतलब है तेरा ? मैंने किसको मारा है ?“ ल्युफरिक की पी हुई
उतर गई।
“यह हैरेगेल्ड टैक्स फांसी का फंदा ही तो है जो लोगों का गला
दबा कर उन्हें मार रहा है। उनका सांस घोट रहा है। ज़बर की भी कोई इन्तहा होती है। स्वैरन दरिया पर बसे विओरोगोरनकास्टर (वूस्टर) में जनता ने इसी टैक्स से तंग आकर बगावत कर दी थी और देखते ही देखते सारा शहर तहस-नहस हो गया था। भूल गए, अभी पिछले साल की ही तो बात है। मुझे खदसा है कि कौफस टंी भी कहीं उसी तरह नेस्तोनाबूद न हो जाए। मैं नहीं चाहती कि मेरे पुरखों का यह नगर बैबिलियन (पाप नगरी) बन जाए।" गौडीवा ने चेतावनी दी।
“बकवास न कर। इन छोटे लोगों के अधिक मुँह नहीं लगा करते। अगर ये सुविधायें लेते हैं, ऐश करते हैं, जीवन का आनंद लेना चाहते हैं तो टैक्स भी इन्हीं को भरना पडे़गा। लगान देने के समय इन लोगों की जान निकलने लगती है।"
गौडीवा मन ही मन कुछ सोचती हुई ल्युफरिक के चेहरे की ओर देखती रही।
“चल छोड़ इन शलिंग (दो कौड़ी) के लोगों की बातों को। हम प्यार करते हैं। ला, एक चुम्मी तो दे दे।“
“लगान दो !"
“क्या कहा ?"
“हाँ, ऐश करनी है, आनंद उठाना है तो लगान दो। तुमने खुद ही तो कहा है।“ गौडीवा शेरनी की भाँति गरजी।
“शरारती औरत। मेरी बिल्ली मुझी को म्याऊँ। चल, मैं तुझे बादशाह कैयरलुडीयन (लंडन को बसाने वाला पहला राजा जिसके नाम से लंडन का नाम पड़ा) के शाही खजाने वाला हीरों का लुड्ड (लंडन का बना) हार लौनडीनियम (लंडन) से मंगाकर दूँगा। गले में पहनेगी तो नाभि तक लटकेगा। अपने महाराजा कैनिऊट का पुत्र ऐडवर्ड वहाँ राज करता है।“
“हार नहीं, मुझे कोई दूसरा लगान चाहिए।“ गौडीवा ब्याई कुतिया की तरह ल्युफरिक की ओर लपकी।
ल्युफरिक ने अपनी दरियादिली दिखाई, “बोल भागवान, तुझे लगान के रूप में क्या चाहिए ? चाँद-तारे जो कहे, तोड़कर तेरी झोली में डाल दूँगा। बेशक मेरी खाल की जूतियाँ बनवा ले। एकबार बस चुड़ैल की तरह चिपट जा।“
गौडीवा कुटिल मुस्कान लाते हुए बोली, “हैरेगेल्ड टैक्स की माफ़ी। वरना मुझे हाथ न लगाना।“
“दिमाग ठिकाने है तेरा। साली कुतŸाी, मैं उठाकर महल से बाहर फेंक दूँगा।“ ल्युफरिक गरजा।
“तुम भूल रहे हो। यह कौफस टंी मेरी पैतृक सम्पतŸिा है। सरकारी जायदाद सूची में यह मेरे नाम लिखी है।“ गौडीवा ने ल्युफरिक की ओर तिरछी नज़र से देखा।
क्रोध में दांत पीसता और कसकर मुट्ठियाँ भींचता हुआ ल्युफरिक मन ही मन गौडीवा को गालियाँ बकते हुए सो गया। पर आज गौडीवा के साथ उसकी हमबिस्तरी में फर्क है। चुम्बक और लोहे के मिलाप की तरह साथ-साथ चिपक कर पड़ने की बजाय उनके बीच समुन्दर के दो किनारों का अंतर है। धरती और आसमान-सी दूरी। एक न भरा जा सकने वाला विशाल फासला। ल्युफरिक को जि़न्दगी में आज पहली बार रात बहुत लम्बी प्रतीत हुई।
खै़र, जैसे-तैसे रात गुज़र गई। एक विशाल वक्फ़ा... असीम फासला उनके बीच पैदा हो गया। ऐसे ही एकांतमयी दूसरी रात बीती। फिर नीरस तीसरी भी बीत गई। बकबकी चैथी...बेज़ारीपूर्ण पाँचवी...गमगीन छठी...और संकटमयी एक महीना बीत गया।
गौडीवा ने हर तरह से अपने आपको ल्युफरिक से तोड़ लिया। न उसके साथ एकसाथ बैठती-उठती, न गैर सरकारी किसी काम में हिस्सा लेती। न वे घर में मिलकर कोई पारिवारिक बात करते। न बाहर मिल-जुलकर एक दम्पति की तरह विचरते। यहाँ तक कि बादशाह कनिऊट की ओर से करवाये धार्मिक भोज ‘माना’ में भी गौडीवा ने ल्युफरिक के साथ शिरकत नहीं की थी। ल्युफरिक जहाँ भी गौडीवा की उपस्थिति चाहता, वहाँ गौडीवा अनुपस्थित होती।
अतृप्त ल्युफरिक से अपने अंदर ठाठें मारता वासना का दरिया संभाला नहीं जा रहा है। कामचेष्टा की प्रज्जवलित ज्वाला से वह जलता-भुनता जा रहा है। उसने कई हथकंडे अपनाये। बहुत से लालच दिए। गौडीवा की तारीफ़ें भी कीं। गर्माया भी। लाखों यत्न किए कि गौडीवा हैरेगेल्ड की हठ छोड़कर उसकी बाहों में बिखर जाए। पर गौडीवा टस से मस न हुई। ल्युफरिक की जान मुट्ठी में आई पड़ी है। पूरा एक महीना हो गया है, उसको गौडीवा के साथ प्यार किए। अब तो उसके हाथ गौडीवा के स्पर्श का अहसास भी भूल चुके हैं। उसकी आँखों में से गौडीवा के नग्न जिस्म की तस्वीर भी बिसर गई है। अपनी ही पत्नी के साथ हर रोज़ सोने के बावजूद ल्युफरिक ने गौडीवा को महीने भर से वस्त्रहीन नहीं देखा। ल्युफरिक के दिमाग में वासना की लपटें तेज़ होने लगीं। ल्युफरिक अपना फंसी गाड़ी का पहिया निकालने की योजनाएँ बनाने लगा और अंत में, उसके जे़हन में एक योजना करवट लेने लगी। पर वह असमंजस में है कि वह अपना विचार गौडीवा के साथ साझा करे या नहीं। आखि़र, उससे रहा न गया और उसने कह दिया, “गिफ्फू ! मैं तुझे पाने के लिए हैरेगेल्ड माफ़ करने के लिए तैयार हूँ, पर मेरी एक शर्त है।“
“क्या ?" गौडीवा एकदम चैंकी।
“ऐसे नहीं। पहले कसम खा कि तू शर्त पूरी करेगी।“
“मुझे कौफस टंी की कसम।“
ल्युफरिक हाथ मलने लगा, “तुझे मार्किट-डे वाले दिन कौफस टंी की गलियों-बज़ारों में नग्न होकर चक्कर लगना पड़ेगा।"
ल्युफरिक को पूर्ण विश्वास है कि उसकी सति-सावित्री पत्नी गौडीवा तो उसके सम्मुख वस्त्र उतारते हुई भी झिझकती और शर्माया करती है, इसलिए वह यह शर्त पूरी नहीं कर सकेगी। गौडीवा की हठ को तोड़ने के लिए इससे बढि़या कोई अन्य तरीका या तरकीब ल्युफरिक के पास नहीं हो सकती।
गौडीवा अचंभित और आवाक् हुई ल्युफरिक के मुँह की ओर देखने लगी।
“कोई जल्दी नहीं। सुबह सोचकर जवाब दे देना।" ल्युफरिक को अपनी जीत प्रत्यक्ष नज़र आ रही है।
ल्युफरिक की शर्त सुनकर एकबार तो गौडीवा के मन पर बिजली गिर पड़ी। उसको लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर हथौड़ा मार दिया हो। गौडीवा खामोश हो गई। उसने ल्युफरिक को कोई जवाब न दिया। वह ल्युफरिक की ओर पीठ करके सारी रात पड़ी रही। न सोई और न ही उसको नींद आई। विचारों और सोचों की कशमकश में वह रातभर सोचती रही।
मशालों की रोशनी को रुखसत करके सूरज की किरणें पहरे पर आ बैठीं। दिन के उजाले में आज कोई कालिख घुली हुई है।
ल्युफरिक ने पलंग पर से उठकर बांहें ऊपर उठाईं, सुस्ती तोड़ी तो देखा, गौडीवा भी जाग चुकी है। वह इस बात से अनजान है कि गौडीवा रातभर सोई ही नहीं है। उसने तो जगराता काटा है।
ल्युफरिक पलंग पर फिर से आकर बैठ गया, “हाँ, फिर क्या सोचा है जानेमन ?"
“सोचना क्या है ? हाँ, मैं वस्त्रहीन होकर कौफस टंी की गलियों, बाज़ारों में भ्रमण करूँगी। बाज़ार कल ही लगने वाला है न ? यह काम मैं कल ही करूँगी। तुम अपने वायदे पर दृढ़ रहना।“ गौडीवा ने दृढ़ता से उतर दिया।
“ले जाने दे, मैं कहाँ भूला हूँ। ज्यादा डींगें नहीं मारा करते।"
“मैं सच कह रही हूँ। इसे मजाक न समझो।"
“देख लेंगे। चोर गया कि अंधेरा गया। कल आने में कौन सी देर है।"
ल्युफरिक कचेहरी लगाने चला गया। गौडीवा की एक बंदी ने छिपकर यह बात सुन ली और उसने सब दासियों और महिला सैनिकों में फैला दी। सब जानते हैं कि गौडीवा बहुत हठी है। धुन की पक्की जो धारण कर लेती है, वह करके छोड़ती है। सबको यह अंदेशा है कि कहीं गौडीवा सचमुच ही ऐसा कुछ न कर दे। कुछ ही घंटों में यह बात जंगल की आग की तरह सारे कौफस टंी में फैल गई।
बलज़ाक को जब इस बारे में पता चला तो वह सिर से पैरों तक कांप उठा। कौफस टंी की गलियों, बाज़ारों, मकानों, दुकानो-हट्टियों, भट्ठियों पर ल्युफरिक की इस अनौखी शर्त की चर्चा होने लगी। उस शाम बलज़ाक के उद्यम के कारण कौफस टंी के प्रतिष्ठित और बुजु़र्ग स्त्री-पुरुषों ने एक सभा बुलाई। सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास किया गया कि गौडीवा यह सब कुछ उनकी भलाई के लिए कर रही है, इसलिए बाज़ार वाले दिन कोई भी बाहर नहीं निकलेगा। सब लोग दरवाजे़-खिड़कियाँ बन्द करके पर्दे तान लंेगे और अपने अपने घरों में अंधेरा होने तक नज़रबंद रहेंगे। इससे लेडी गौडीवा ल्युफरिक की शर्त भी पूरी कर देगी और गौडीवा को शर्मिन्दगी और पश्चाताप का सामना भी नहीं करना पड़ेगा। उसकी इज्ज़त और उसका मान-सम्मान बरकरार रहेगा। जनता को हैरेगेल्ड टैक्स से मुक्ति भी मिल जाएगी। सबने बग़ैर किसी एतराज के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और उन्होंने खुद ही नहीं, अपने अपने परिवारों को भी वीरवार के दिन घरों में नज़रबन्द रहने की कसम उठवाई।
अगले दिन का सूरज चढ़ा। बाज़ार में दुकानें पहले की भाँति ही सजीं। गौडीवा बिस्तर पर से उठी और उसने अपने शयनवस्त्र के बटन नहीं खोले बल्कि गुस्से में आकर तोड़ दिए और अपना चोला फर्श पर पटक कर वह नग्नावस्था मंे ही गुसलखाने की ओर चली गई। इत्रजल से भरे हमाम कुंड में वह कितनी ही देर लेटी कुछ सोचती रही। जब गौडीवा बाहर निकली तो दासियों ने उसका बदन पोंछा और उसको वस्त्र पहनाने की पेशकश की। इस पेशकश को गौडीवा ने ठुकरा दिया और केवल एक चादर में अपना बदन लपेटकर सीधे शयनकक्ष में चली गई। ल्युफरिक रात में शराब अधिक पी जाने के कारण अभी तक सोया पड़ा है। गौडीवा ने उसको उठाया, “मेरे सरताज, मैं तुम्हारी शर्त पूरी करने जा रही हूँ। तुम मर्दों की तरह अपने वायदे पर दृढ़ रहना।"
गौडीवा ने सांपिन द्वारा केंचुली उतारने की तरह अपने इर्दगिर्द लपेटी हुई चादर उतारकर ज़मीन पर फेंक दी।
आँखें मलता हुआ ल्युफरिक उठा और निर्वस्त्र गौडीवा को देखकर दंग रह गया। वह जानता है कि पत्थर पर लकीर की तरह गौडीवा का फै़सला अटल है। ल्युफरिक को बोलने के लिए शब्द और हिलने के लिए कोई हरकत समझ में नहीं आ रही।
जांघों तक लटकते लम्बे घने स्वर्णिम बालों को खुला ही छोड़कर फौजियों की भाँति कवायद करती हुई गौडीवा शयनकक्ष से बाहर चली गई। ल्युफरिक यह हैरतअंगेज वाकया मुँह फाड़े देखता ही रह गया।
अगले ही पल गौडीवा दो घुड़सवार महिला सिपाहियों के साथ अपने सफ़ेद घोड़े पर निर्वस्त्र बैठकर कौफस टंी की गलियों में गश्त करने लगी। यहाँ तक कि उसने कोई गहना भी नहीं पहना। उसके तन पर एक भी कपड़ा नहीं है। लेकिन फिर भी वह नग्न नहीं दीखती। क्योंकि उसके गुप्त अंगों को उसके गज़-गज़भर लम्बे बालों ने ढक रखा है।
दिनभर वह कौफस टंी की गलियों, बाज़ारों में उसी प्रकार घूमती रही। उसको कोई बंदा तो क्या, कोई चिडि़या-परिंदा भी न टकराया। सूरज का गोला नीचे उतरते उतरते जब दूर पश्चिम की पहाड़ी पर आकर टिक गया, साये कद्दावर हुए तो गौडीवा महल में वापस लौट आई।
ल्युफरिक पराजित हुए जुआरी की भाँति ड्यौढ़ी में खड़ा गौडीवा की प्रतीक्षा कर रहा है।
“मैंने अपना प्रण पूरा कर दिया है, तुम अपना वचन पूरा करो।" गौडीवा एक विजयी और स्वाभिमानी मुस्कान चेहरे पर लाकर ल्युफरिक को सम्बोधित हुई।
ल्युफरिक अपने दफ्तर में गया और कलम सियाही की दवात में डुबोकर उसने शाही फरमान लिख दिया। नीचे अपनी लाल मोहर लगा दी। रुक्का गौडीवा ने पढ़ा। केवल कौफस टंी ही नहीं बल्कि सारे मार्सिया के अंदर ल्युफरिक के अधिकार क्षेत्र में आने वाले इलाकों में हैरेगेल्ड बन्द कर देने का आदेश दजऱ् हो गया। गौडीवा ने वह परवाना सेविकाओं के हाथ ढिंढोरची पीटर को भेजकर फौरन मुनादी करने का हुक्म दिया। नगाड़ा बजाने वाला जाॅन भी पीटर के साथ ल्युफरिक के शाही फरमान का ऐलान सारी जनता तक पहुँचाने के लिए चल पड़ा। चर्च की घंटियाँ लगातार बजने लगीं तो जाॅन ने चबूतरे पर चढ़कर नगाड़े पर चोट की और पीटर ने शाही ऐलाननामा पढ़ा कि आज और अभी इसी मौके से हैरेगेल्ड लगान बन्द है और किसी भी प्राणी को यह टैक्स नहीं देना होगा। लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। ‘लेडी गौडीवा जि़न्दाबाज...’ के नारों से आसमान गूंजने लगा।
“गौडीवा ! जुग जुग जिये !"
“गौडीवा अमर रहे !!"
“गूडी (अच्छी) वीवा (जिंदाबाद) !!!"
जय जयकार करते लोग बिखरने लगे।
एकदम बाज़ार में चहल-पहल नहीं बल्कि अफरा-तफरी शुरू हो गई। लोग रात पड़ने से भयभीत फुर्ती से खरीद-फरोख़्त करने लगे। सारी कौफस टंी में खुशी के गीत गाये जाने लगे। ढोल-बाजे, शहनाइयाँ, पीपनियाँ गूंजने लग पड़ीं। लोग नाचते-कूदते, दौड़ते-फिरते जश्न मनाने लग पड़े। स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के पकवान बनाने में जुट गईं। सारे पुरुष पत्थर बाज़ार वाले बड़े शराबखाने (मौजूदा काउंटीकोर्ट, कवैंटंी वाला स्थान) में जा एकत्र हुए। एक-दूसरे से जाम टकरा टकराकर मिलजुल कर शराब पीने लगे। सब खुश थे लेकिन बलज़ाक उदास है। वह एक कोने में अपनी शराब का मग लेकर सबसे बेख़बर बैठा है।
लोग लेडी गौडीवा की प्रशंसा का गुणगाण कर रहे हैं। कइयों के मन में शंका भी है।
मनचला डेविड बोला, “भला लेडी गौडीवा ने सचमुच नंगी होकर चक्कर लगाया होगा ?"
“हाँ, लगाया ही होगा। नहीं तो ज़ालिम लार्ड ल्युफरिक हैरेगेल्ड क्यों माफ़ करता।“ बुजुर्ग हकीम अल्बर्ट ने जवाब दिया ‘सिर चुकणी’ (एक विशेष दरख़्त की टहनी जिसको चबाने से सरूर महसूस होता है, ग्याहरवीं शताब्दी में यह बहुत प्रचलित नशा था।) दातुन मुँह में से बाहर निकालता हुआ नाई कोलियम वार्तालाप में हिस्सा लेता है, “भाऊ, वैसे यार यह बुरी बात है उसके लिए। अपनी औरत को नंगा करके शहर में घुमाया है। ससुरे को शरम नहीं आई। ये तो हम सबने समझदारी दिखाई कि अपने अपने घरों में नज़रबन्द रहे। नहीं तो सोचो भला, उसकी क्या इज्ज़त रहती ?"
“नहीं, लेडी गौडीवा बहुत सयानी और समझदार औरत है। उसने किसी तरह ल्युफरिक को मना लिया होगा। औरतों को आदमियों को फुसलाने का तरीका आता है भाई। उसने बिना कपड़ों के घर से बाहर होकर चक्कर नहीं लगाये होंगे।" जश्न में शामिल होने आया पादरी लैलसिस भी बातचीत में शरीक हुआ।
“बेतुकी बातें न करो। उसने बिना कपड़ों के सफ़ेद घोड़े पर चक्कर लगाये हैं। उसके चेहरे पर न नंगा होने की शरम, न डर और न ही कोई झिझक थी। वह तो शान से अपनी दूधिया जांघें चमकाती गलियों में घूमती फिरती थी। पूरे नखरे से कौडि़यों, याकूब और मोती जड़े कढ़ाईदार लाल कपड़े से सजे घोड़े पर नंगी बैठी थी, भाई।... मैंने अपनी आँखों से देखा है। मुझसे पूछो ?" दर्जी टाॅम शराब के नशे में ललकार कर बोला।
“तुझे कैसे पता ?“ सबकी एकसाथ एक सुर में आवाज़ निकली।
खी-खी करके हँसते हुए वह बोला, “मैंने भाई अपनी खिड़की में छोटी-सी मोरी कर ली थी। मुझसे यार रहा नहीं गया। मैं जब लेडी गौडीवा की पोशाकें सिला करता था, तो नाप के लिए उसकी कोई पुरानी पोशाक आती थी। उसी के हिसाब से मैं नई पोशाक सिलता था। लेडी गौडीवा उलाहना भी देती थी। कभी खुली बन बई और कभी तंग। मैंने सोचा, मौका मिला है, इसबार आँखों से पक्का ही नाप ले लिया जाए। अब उलाहना देकर देखे। मेरे घर के आगे तो घोड़ा लेकर वह बहुत देर तक खड़ी रही। हमारे दरवाज़ों के आगे वाले रोमन नलके से तो उसने पानी भी पिया।“ टाॅम कुछ अधिक ही चैड़ा होकर बोलता गया।
सब लोग उस पर टूट पड़े, “अरे कोढ़ी ! तूने ये पाप कमाया। कंजूस, तुझे शैतान दोज़ख की भट्ठी में ले जाकर फेंकेगा। भगवान इशु मसीह तुझे इसकी सज़ा देगा। तूने मौत के फरिश्तों को खुद आवाज़ दी है।"
पादरी का वृद्ध शरीर उतोजित हो उठा, “कमीने ! तूने वर्जिन मैरी की भक्तिन का अपमान किया है। सारी जनता घरों के अंदर बैठी रही, तेरे से टिककर नहीं बैठा गया ? तूने अपने व्यवसाय को कलंकित किा है। दर्जी का काम कपड़े सिलकर नंग ढकना होता है न कि नंगेज़ देखना। तुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी।"
“हाँ हाँ बूढ़े, तू तो जैसे स्वर्ग में सीधी सीढ़ी लगाकर चढ़ जाएगा ? मेरा मुँह न खुला। मैं तो सीवन उधेड़ दूँ। अपनी तो बगलों में दूसरों की हाथ में ! दूसरे को कुछ कहने से पहले अपने पीढ़े के नीचे सोटा मार। मैं तेरी तरह लोगों की धी-बहनों की जि़न्दगियाँ तो खराब नहीं करता। तू अपनी पोथियों में से कहानियाँ सुना सुनाकर कितनी ही औरतें पीछे लगाये घूमता है। सैंट मेरी चर्च में मैं खुद मिला हूँ। आठ नौ अल्हड़ सी उम्र की जवान लड़कियों को इसने नन बना लिया है। कहता है, तुम सारी उम्र विवाह नहीं करवाओगी। भक्ति में लीन रहोगी। परमेश्वर से लौ लगानी है। ज़रा बताओ तो यह कोई उनकी उम्र है भगवान से लौ लगाने की। इस उम्र में तो उन्हें मेरे जैसे के साथ पल्लू बंधना चाहिए। साला पाखंडी ये सुन्दर सुन्दर औरतों को जीसस की तरह क्रास पर टांग लेता है। जब दिल करता है जिसे चाहे सिस्टर-सिस्टर करके पकड़ लेता है और अँधेरी कोठरी में ले जाकर कैसा आध्यात्मवाद का पाठ पढ़ाने का ढांेग करता है ? पता है हमें जो सबक तू पढ़ाता है। रजाई ही गरम करता है। जब किसी औरत से गुनाह हो जाता है तो तू खुश हो जाता है। क्योंकि पापों का पश्चाताप करने के लिए उसे रातें तेरे साथ बितानी होती हैं। तू उसका पाप धोता नहीं, बल्कि नारी को कलंकित करता है। तू भूल को माफ़ करवाने के बहाने उनका रजामंदी के साथ बलात्कार करता है। मेरा तो कई बार दिल करता है, मैं भी पादरी बन जाऊँ।“ टाॅम अपनी मूंछों को मरोड़ा देने लग पड़ा है।
चैकीदार कूपर ने विवाद को बढ़ता देख बीच में टोका, “टाॅमी, नीच बुद्धि, मोटे दिमाग ! मुँह नहीं अच्छा, बात तो अच्छी कर लिया कर।“
“अली अली करके क्यों पीछे पड़ते हो ? मैंने तो यार यूँ ही थोड़ा-सा झांका था। मैंने क्या गुड्डी के जेवर उतार लिए। चिडि़या चोंच भरके ले गई, नदी न घटियो नीर...। छड़े आदमी के दिल को खुश करने पर तो वैसे ही पुण्य होता है भाई। मैंने कौन-सा कुक्कड़ काणा कर दिया (ज्व बवबो मलमे वनज - उस समय का प्रचलित मुहावरा जिसका अर्थ है - कोई नुकसान नहीं हुआ।) तुम मुझे काटने को पड़ रहे हो।... हद हो गई। अकेले आदमी का जीने का कोई स्वाद है ? छड़े आदमी का क्या है, न आगे, न पीछे। छड़ा आदमी तो बियाबान में खड़े जंड के पेड़ जैसा होता है। मेरी तो किस्मत ही खराब है। बचपन में भी कोई सहेलियों के साथ खेलने नहीं देता था।“ टाॅम ने अपना शराब वाला सारा पैग एक ही सांस में खींच लिया।
यह वार्तालाप सुनकर बलज़ाक के कान खड़े हो गए। वह उठा और टाॅम के पास आया, “टाॅम, ओ टाॅमी... चल, तुझे घर छोड़ आऊँ। यूँ ही बखेड़ा डालकर बैठा है। तुझे ज्यादा चढ़ गई है। यहाँ कोई रंग में भंग पड़ जाएगा।“
“भाई, ले जा इसको यहाँ से, यूँ ही किसी से मार खा लेगा।“
लकड़हारे हैरी के इतना कहने पर टाॅम भड़क उठा और जाकर उस पर झपट पड़ा, “भैण के... लकड़े ! मुझे हाथ तो लगाकर देख ? तेरे टुकड़े न कर दूँ तो टाॅम टेलर (दरजी) कौन कहेगा। भैण का टका, मेरे साथ पंगा लेता है। बखिये उधेड़कर रख दूँ। गड़ावी, तेरे से तो नंबरदार के पास गिरवी रखी अपनी बहन और औरत अभी तक छुड़ाई नहीं गई, बातें बनाता है बड़ा सांड !"
टाॅम और कूपर को आपस में गुत्थमगुत्था होता देखा मौके पर उपस्थिति लोगों ने उन्हें हटा दिया। बलज़ाक ने टाॅम की बगल में सिर देकर उसको बांहों में भर लिया और शराबखाने से निकालकर उसको घर की ओर ले चला।
रास्ते में जाते हुए टाॅम थुथलाती आवाज़ में कहने लगा, “बल्ले यार, यह साले समझते नहीं। औरतों वाले हैं न, तभी। अब तू भी छड़ा है, मैं भी छड़ा। तू मेरा भाई, मैं तेरा भाई। हम एक-दूजे का दुख समझते हैं।“ हिचकियाँ लेता टाॅम ऊँची आवाज़ में गीत गाने लग पड़ा, “हो...अ...हो... चिड़िया चोंच भर ले गयी... घाटो ना नाद को नीर... दान डियो धन ना घाटो... केह गये भगत कबीर पी ली, तेरा की गया? बंद झट जे बंदे दी जून जी लिया...। बता, बल्ले, मुझसे अगर रहा नहीं गया तो इसके मेरा क्या कसूर है ? मैंने कौन सा बताशे चूरा कर दिए ? वो न निकलती नंगी होकर ?"
“बकवास न कर। मुँह बन्द कर। मैं तुझे तेरे घर सुआ कर (सुलाकर) आता हूँ।"
“सूती तो यार गायें हैं या जूंएं। तू बंदे कब से सुआने लग पड़ा ?"
“चला चल... चला चल... लड़खड़ाकर कहीं गिर न पड़ना।“ बलज़ाक ने टाॅम के लड़खड़ाते कदम संभाले।
“बल्ले यार... ससुरी के बाल ही इतने लम्बे लम्बे हैं कि दिखाई तो कुछ भी नहीं दिया। पर फिर भी नशा-सा चढ़ा गई। धर्म से, औरत तो पहले तोड़ की शराब जैसी है। तू पतंदर उसके पास हर समय रहता है। मज़ा सा आ जाता होगा जब गुटकूं गुटकूं करती घूमती को देखता होगा। तेरे आगे तो महल में मोरों की तरह नाचती रहती होगी, है न ? लठ (मजबूत कदकाठी का नौजवान) जैसा आदमी तो वह खोजती है।"
बलज़ाक कुछ न बोला। टाॅम को उसके घर बिस्तर पर लिटाकर बलज़ाक तबेले के साथ बनी अपनी रिहायशगाह में आ गया। उसने अपने पहने हुए गहने उतारे। कमर में बांधी हुई पेटी खोली तो उसमें पड़ा चाकू इन्सानी खून से सना हुआ था। बलज़ाक ने रूई के फाहे पानी में भिगोकर चाकू साफ़ किया और सो गया।
उस रात लाॅर्ड ल्युफरिक और लेडी गौडीवा पति-पत्नी की तरह सोये और उन्होंने एक दूसरे को जी भरकर प्यार किया। सारी रात उनके कमरे की मशालें जलती रहीं।
अगली सवेर बलज़ाक देर तक सोया रहा। जब वह उठा तो स्थानीय गिरजाघर का घडि़याल तीन बार बजा। फिर एक मिनट के अंतर पर तीन घंटियाँ बजी। एक मिनट के अंतराल के बाद तीन और घंटे बजे। सब नगर निवासी अपने अपने कामधंधे छोड़कर खड़े हो गए, “अरे ! नौ घंटियाँ ? नाइन टैलर मेक्स ए मैन ! (किसी पुरुष के मरने की सूचना देने के लिए नौ घंटियाँ बजाई जाती हैं।) अर्थात किसी पुरुष का निधन हो गया है ?“
पूरे कौफस टंी में टाॅम की मौत की ख़बर जंगल की आग की तरह पलभर में फैल गई। किसी ने रात को टाॅम की आँखें निकालकर उसको जान से मार दिया है। लोगों ने इसको ‘कुदरत का क्रोध’ नाम दे दिया। पादरी लैलसिस बाइबिल के हवाले देकर लोगों को व्याख्यान देने लगा कि बुरे कर्म का बुरा परिणाम होता है। उसी दिन ही टाॅम को दफ़नाकर उसकी आत्मा की शांति के लिए गिरजाघर में प्रार्थना कर दी गई।

अगले दिन से कौफस टंी में सबकुछ सामान्य सा हो गया। टाॅम को उसके कुकर्म की इतनी जल्द सज़ा ? ल्युफरिक टाॅम के दोष से अपने गुनाह की तुलना करते हुए कांप-सा गया। इस घटना के बाद ल्युफरिक बहुत बदल गया। उसमें एक खास धर्म-परिवर्तन आया। उसकी शखि़्सयत में निहायत तब्दीली आ गई। पश्चाताप करने के लिए उसने ईसाई मठों को दान-पुण्य करना प्रारंभ कर दिया। गौडीवा अपने महल वाले हमाम की बजाय झील पर स्नान करने को तरज़ीह देने लगी।
अगले दिन से कौफस टंी में सबकुछ सामान्य सा हो गया। टाॅम को उसके कुकर्म की इतनी जल्द सज़ा ? ल्युफरिक टाॅम के दोष से अपने गुनाह की तुलना करते हुए कांप-सा गया। इस घटना के बाद ल्युफरिक बहुत बदल गया। उसमें एक खास धर्म-परिवर्तन आया। उसकी शखि़्सयत में निहायत तब्दीली आ गई। पश्चाताप करने के लिए उसने ईसाई मठों को दान-पुण्य करना प्रारंभ कर दिया। गौडीवा अपने महल वाले हमाम की बजाय झील पर स्नान करने को तरज़ीह देने लगी।
सालभर बाद ल्युफरिक के घर गौडीवा की कोख से एक पुत्र ऐलफगार ने जन्म लिया। ऐलफगार बलज़ाक के साथ खेलकर बड़ा होने लगा। बलज़ाक ने ऐलफगार को घुड़सवारी, शस्त्र विद्या सिखाई। तलवारबाज़ी और तीरअंदाज़ी में निपुण किया।
ल्युफरिक ने राजा ऐडवर्ड कौनफैसर को राजी करके 1051 ई. में पूरे देश में से हैरेगेल्ड की उगाही बन्द करवा दी। जब ऐलफगार चैदह वर्ष का हुआ तो ल्युफरिक के निधन के घंटे बज उठे।
ऐलफगार के अभी बच्चा होने के कारण गौडीवा ने बलज़ाक को तरक्की देकर अपना निजी सचिव बना लिया। बलज़ाक उसके सरकारी कामों में सहयोग देने लग पड़ा। गौडीवा ने एक एक करके सभी लगान बन्द करने शुरू कर दिए। अपनी आमदनी का बहुत सा भाग वह ईसाई मठों को और गरीबों को दान कर देती। यहाँ तक कि गहनों की शौकीन होने के बावजूद वह अपने पहने हुए गहने भी उतार कर अर्पित कर देती।
नोरमन (नोरमैंडी, फ्रांस के निवासी) फौजों ने मार्सिया पर आक्रमण करने प्रारंभ कर दिए। ऐलफगार चैबीस वर्ष का नौजवान हो गया। बलज़ाक की भाँति दर्शनीय, तगड़ा, फौलादी देह वाला और गौडीवा जैसा सुंदर, आकर्षक और ऊँचा-लम्बा। ल्युफरिक की तरह तेज़ दिमाग, चुस्त-फुर्तीला और सियासती ! रजवाड़ों की भाँति ऐलफगार बड़े पलंग पर न सोता। बल्कि सैनिकों की तरह छोटे कमजोर बाही वाली चारपाई पर सोने का अभ्यस्त हो गया। इतनी छोटी चारपाई पर कि जिस पर सिर्फ़ धड़ ही टिकता और टांगें धरती पर लगाकर सोना पड़ता। बलज़ाक ने ऐसी चारपाइयों पर सोने के भेद बताते हुए ऐलफगार को बताया था कि ऐसी चारपाइयों पर सैनिक इसलिए सोते हैं कि अगर दुश्मन रात में सोये हुए व्यक्ति की बाहें बांध दें तो वह चारपाई सहित खड़ा हो सके, चारपाई की बाहियों को तोड़कर अपने आप को आज़ाद किया जा सका। बलज़ाक ने ऐलफगार को अव्वल दर्जे का योद्धा बना दिया।
कई वर्षों तक नाकाम हमले करने के बाद नोरमन फौजों ने हेस्टिंग की जंग में ऐडवर्ड के वारिस हैरोल्ड गौडविन्सन को करारी हार देकर ऐंग्लिका (इंग्लैंड) के सिंहासन पर अपना कब्ज़ा कर लिया। नोरमैंडी के रजवाड़ों ने ऐलफगार की बहादुरी के किस्से सुने हुए हैं। फ्रांसिसी हुक्मरानों की ओर से ऐलफगार को अपनी सेना में भर्ती करने के प्रस्ताव आने लग पड़े।
गौडीवा ने अभी ऐलफगार के सिर पर सारी जिम्मेदारियाँ डालने के विषय में सोच ही रही थी कि कौफस टंी में प्लेग नाम की एक भयानक बीमारी फैल गई। लोग मरने लगे। वैद्यों, हकीमों के पास उसका कोई इलाज उपलब्ध नहीं है। ऐलफगार भी इसी नामुराद बीमारी से कई दिनों तक पीडि़त रहने के बाद चल बसा। ऐलफगार की मौत के उपरांत गौडीवा बुरी तरह टूट गई। गौडीवा ने महल में से बाहर जाना कम कर दिया। दिनभर वह अपने शयन कक्ष में शराब पीकर पड़ी रहती। बलज़ाक उसका कामकाज संभालता। जब कभी किसी सरकारी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करवाने होते या किसी काम के लिए बलज़ाक को गौडीवा से मिलना होता तो उसको गौडीवा की हालत देखकर रोना आ जाता। वह गौडीवा को समझाता। उसकी मिन्नतें करता। कसमें खिलाता और कभी कभी मोह में आकर इसरार भी करता। बलज़ाक गौडीवा के अंदर जीने की लालसा पैदा करता और कई बार तो फर्श पर गिरी हुई गौडीवा को उठाकर ऊपर बिस्तर पर भी लिटाता। ऐलफगार के देहांत के सालभर बाद नोरमन फौजों ने स्क्रौबीसबायरिज पर हमला बोलकर कब्ज़ा कर लिया। 1066 ई. से ही नौरमनों ने सैक्सनों के कानून भंग करके अपनी प्रथा चला दी जिसके अनुसार आज़ाद और अकेली स्त्री को कोई संपŸिा रखने का अधिकार नहीं रहने दिया। चाहे वह जागीर वसीयत के माध्यम से ही मिली हो या औरत के स्वर्गवासी पति की ही क्यों न हो। ल्युफरिक की जागीर जो गौडीवा को मिली थी, आक्रमणकारियों द्वारा ज़ब्त कर ली गई। गौडीवा को इसका गहरा सदमा लगा। गौडीवा अचानक बीमार हो गई।
कई दिन बीमार रहने के उपरांत गौडीवा की मौत की ख़बर महल से आई। गिरजाघर का घडि़याल छह बार बजा। गौडीवा की मृतक देह को ऐबी गिरजाघर के साथ वाले बैनेडिक्टाइन ईसाई मठ के कब्रिस्तान में ल्युफरिक की कब्र के साथ दफ़ना दिया गया। लेकिन किसी ने गौडीवा का मुँह देखकर उसके अन्तिम दर्शन नहीं किए क्योंकि कौफस टंी के वहमी लोगों की धारणा है कि यदि मृत व्यक्ति का अन्तिम यात्रा के समय मुँह न देखा जाए तो वह स्वर्ग में जाता है और तुम्हें कभी न कभी किसी न किसी रूप में अवश्य मिलता है। कौफस टंी के लोगों पर गौडीवा ने अनेक उपकार किए हैं। इसलिए लोगों में वह हरमन प्यारी है। सब उसको दुबारा मिलना चाहते हैं। कौफस टंी में सिर्फ़ घोड़ों के लगान के सवाय सभी लगान गौडीवा द्वारा बन्द कर दिए गए हैं।
गौडीवा के पंख-पखेरू पड़ने की सूचना मिलते ही राजा विलियम ने गौडीवा की समूची संपŸिा ज़ब्त कर ली।
उस दिन के बाद बलज़ाक और गौडीवा का प्यारा सफ़ेद घोड़ा किसी को दिखाई नहीं दिया।
कुछ वर्षों के बाद एक रोज़ हौली टिंन्टी गिरजाघर ईओफज़हैम का पादरी गिरजाघर आया तो उसने चर्च के कब्रिस्तान में एक नई बनी कब्र देखी। पादरी को चैकीदार ने बताया कि रात में इस कब्र पर उसने किसी मध्यम कद के हट्टे-कट्टे पुरुष को फूल चढ़ाते और रोते हुए देखा था जिसके बाल सफे़द थे और जिसकी बाजू पर बाज़ खुदा हुआ था।
अंतिका: इसके उपरांत गौडीवा कहानियों, नाटकों और तस्वीरों में आई। कवेंटंी के कथीडर्ल शाॅपिंग सेंटर में गौडीवा का विशाल बुत स्थापित है। दूसरे बुत में नग्न घुड़सवार गौडीवा निकलती है और टाॅम टेलर झांककर खिड़की में घुस जाता है। यह झांकने की प्रक्रिया हर घंटे बाद घड़ी की मिनट वाली सुई बारह के अंक पर आने के समय दोहराई जाती है। आज भी कवेंटंी में हर साल जुलाई महीने में गौडीवा की याद में एक जुलूस निकलता है और मेला लगता है जिसको गौडीवा फेस्टिवल कहा जाता है।

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