नीम गुलाबी रंग का सूर्य उदय होता है तो कांगड़े की रानी गुद्दण और साहिब सिंह की विधवा रानी रतन कौर तथा अपनी महारानियों के मध्य पड़ा शेर-ए-पंजाब रणजीत सिंह अपने बिस्तर से उठता है और तैयार होकर दरबार लगाने के लिए चला जाता है।
महाराजा रणजीत सिंह को गुप्तचर अकाल सेना द्वारा सूचना मिलती है कि अफ़गानी कबीलाई यूसफजई पठानों ने लाहौर पर आँख गड़ा रखी है और वह सरकार-ए-खालसा पर आक्रमण करने के मंसूबे बना रहे हैं। रणजीत सिंह तैश में आ जाता है और पठानों को पहले ही कुचल देने का इरादा बना लेता है।
महाराजा आपातकालीन सभा बुलाता है जिसमें दल सिंह, जीवन सिंह, मुल्तान का गवर्नर दीवान सावन मल्ल 1⁄4हशमुख राय का पुत्र1⁄2, डोगरा ज़ोरावार सिंह खलूरिया 1⁄41786-18411⁄2, हुक्म सिंह चिमनी, ‘गुरदासपुरी जलाहा’ वीर सिंह ढिल्लों1⁄41792-18421⁄2, दीवान मोती राम 1⁄4दीवान मोहकम चंद अकालगढि़ये का पुत्र1⁄2, ज़फ़र जंग, बोस्तान खां, हरी सिंह नलुवा 1⁄41791-18371⁄2, राजा महां सिंह मीरपुरी 1⁄4मृत्यु 18441⁄2, अलेक्जेंडर गार्डनर उर्फ़ गोरदाना खान1⁄41785-1877 आयरिश मूल का यह जनरल नेपोलियन बोनापार्ट की फौज में कर्नल रह चुका था और वाॅटरलू की लड़ाई में नेपोलियन के बंदी बनाये जाने के बाद ईरान और अफ़गानिस्तान होता हुआ रणजीत सिंह के पास आकर उसकी फौज में भर्ती हो गया था1⁄2, कंवर खड़क सिंह 1⁄422.2.1801 - 5.11.18401⁄2, शहजादा शेर सिंह 1⁄4दिसंबर 1807-16.10.18431⁄2, कैनोरा 1⁄4अमेरिकी जनरल1⁄2, हैस्ट 1⁄4यूनानी जनरल1⁄2, धन्ना सिंह मलवई और तोपखाने का पूर्व दरोगा गौस खान का पुत्र सुल्तान महमूद खान आदि शामिल होते
हैं।
पूरे तीन घंटे जरनलों के बीच विचार-विमर्श होता है। युद्ध नीति तैयार करते हुए दीवान मोती राम महाराजा को आगाह करता है कि यदि इस जंग में पेशावर के उŸार और पश्चिमी इलाके से यूसफज़ई पठानों का साथ दक्खिन और पूर्वी इलाके के अफ़रीदी पठानों ने दे दिया तो हो सकता है, मध्य के ख़लीली कबीले भी जंग मे कूद पड़ें। उससे लाहौर सरकार को बहुत हानि हो सकती है। शेष जनरल भी उसकी बात से अपनी सहमति प्रकट करते हैं।
दूरदर्शी महाराजा तुरंत नसीरी कबीले के सरदार ज़बार खान को सन्देशा भेज देता है कि अफ़रीदियों को यूसफ़जई पठानों का साथ देने से रोके ताकि खालसा फौज यूसफजई पठानों को बिना अपना नुकसान करते हुए आसानी से सबक सिखा सके।
नसीरी कबीले के बहादुर और जंगजू लोगों का पेशा भेड ़-बकरियाँ और घोड़े आदि पालना या लूटपाट करना हुआ करता था। हिंदुस्तान को लूटने के लिए महान सिकन्दर द्वारा दर्रा-ए-खैबर का मुँह खोले जाने के बाद से जब भी कोई बाहरी हमलावर भारत में आया करता था तो इसी कबीले वालों का सहयोग लिया करता था और वापसी के दौरान लूट का माल का कुछ हिस्सा इन्हंे भी इनाम के तौर पर दे जाया करता था। इन नसीरी कबीले के लोगों ने बाबर, दारा गुस्तासप, मुहम्मद गोरी, तैमूर लंग, नादिर शाह, शेर शाह सूरी और अहमद शाह अब्दाली को दिल्ली और देश पंजाब को लूटने में भरपूर सहयोग दिया था। यह तो इनका दुर्भाग्य था कि जब चोरों का मोर पड़ गए, अथार्त सिक्खों ने अब्दाली को लूटना आरंभ कर दिया तो इन नसीरी कबीले वालों को पीछे हटकर न केवल अपनी खोहों में छिपना पड़ा, बल्कि सिक्ख महाराजा रणजीत सिंह के लाहौर पर काबिज़ होने के उपरांत विवश होकर उसके साथ सुलहनामा भी करना पड़ा। संधी की शर्तों के अनुसार इन्हें सरकार-ए-खालसा को लगान देना पड़ता, घोड़े और आवश्यकता पड़ने पर जंगी सहायता भी मुहैया करवानी पड़ती है।
इस्माइल खान पर्वत के निकट कोह-सुलेमान की चारागाहों में डेरा लगाए बैठे नसीरी कबीले के सरदार ज़बार खान को जब महाराजा रणजीत सिंह का शाही फरमान आता है तो वह हुक्म का पालन करते हुए अपने साथियों सहित आधी रात को अचानक अफ़रीदियों पर धावा बोल देता है। अकस्मात् हमला होने के परिणामस्वरूप बहुत से अफ़रीदी डरकर जान बचाते हुए भाग खड़े होते हैं और अफरा-तफरी में मारे भी जाते हैं। इस हमले के दौरान भागने की कोशिश कर रहे अफरीदियों के सरदार सैयद समसद बेग के पुत्र सुल्तान याकूब का घोड़ी पर बैठे हुए ही ज़बार खान द्वारा सिर कलम कर दिया जाता है। ज्यों ही घोड़ी से उसका सिर कटा धड़ नीचे गिरता है तो ज़बार खान उसकी घोड़ी की लगाम पकड़ लेता है और अपना घोड़ा अपने साथियों के हवाले करके उस दूधिया रंग की घोड़ी पर सवार हो जाता है।
ज़बार खान द्वारा घोड़ी को ऐड़ी मारने की देर होती है कि घोड़ी 55 मोरां का महाराजा
हवा को चीरती हुई कुछ ही देर में ज़बार खान को उसकी मंजि़ल-ए-मकसूद 1⁄4गंतव्य1⁄2 तक ले जाती है। ज़बार खान का उस घोड़ी के साथ उसी पल से माशूकों जैसा मोह पैदा हो जाता है।
कुछ दिनों बाद रणजीत सिंह के कुछ अहलकार ज़बार खान का शुक्रिया अदा करने और इनाम भेंट करने कोह-सलेमान की चारागाहों में आते हैं। ज़बार खान उस समय शिकार खेल रहा होता है। ज़बार खान की कुतिया शिकार हुए जानवर को इतनी फुर्ती से दबोचती है कि शिकारी कुतिया की रफ़्तार देखकर रणजीत सिंह के सिक्ख सिपाही दंग रह जाते हैं। वापस लौटकर वह महाराजा को उस कुतिया के बारे में बताते हैं तो महाराजा की लार टपकने लगती है। अत्यधिक हठी स्वभाव के रणजीत सिंह की यह भी एक खासियत है कि जब उसका दिल किसी वस्तु पर आ जाता है तो वह उसकी प्राप्ति के लिए मचल जाया करता है।
महाराजा रणजीत सिंह उसी समय अपने सिपाहियों को ज़बार खान से उस कुतिया को खरीदकर ले आने को कहता है। पर सप्ताहभर बाद अहलकार खाली हाथ उल्टे पांव लौट आते हैं और रणजीत सिंह को बताते हैं कि ज़बार खान ने कहा है, “इस कुतिया के पैदा होते ही इसकी माँ मर गई थी और इसे मैंने रूई के फाहों से अपने हाथों दूध पिलाकर बच्चों की तरह पाला है। यह मुझे अपनी जान से भी ज्यादा अज़ीज है। मैं इसको किसी भी नहीं दूँगा।“
“फिर उसकी जान लेकर कुतिया को ले आते...।“ रणजीत सिंह खादिमों पर टूट पड़ता है।
महाराजा का क्रोध देखकर सब भयभीत हो जाते हैं और निरुŸार खड़े महाराजा के अगले आदेश की प्रतीक्षा करते हैं। रणजीत सिंह दाढ़ी पर हाथ फेरता हुए सेनापति ज़फ़र जंग और घोड़ों के दरोगा खुदा बख़्श को हुक्म देता है, “लश्कर लेकर जाओ। चाहे युद्ध करना पड़े या ज़बार खान की बलि लेनी पड़े। मुझे हर हाल में वह कुतिया चाहिए।“
दरबार में उपस्थिति सरदार हरी सिंह नलुवा महाराजा को बीच में टोकता है, “सिंह साहिब, खून खराबा करने की ज़रूरत नहीं। मैं चार-पाँच सिपाहियों का जत्था ले जाकर कुतिया को ले आता हूँ।“
“ठीक है, करो कोशिश।“ महाराजा गंभीर और कोमल स्वर में कहता है।
हरी सिंह नलुवा जब अपने चार घुड़सवारों के साथ चला जता है तो
रणजीत सिंह बैठे-बैठे गर्दन झुकाकर घुटनों पर कोहनियाँ टिका लेता है और कनपटियों पर हाथ रखकर आँखें बंद करता हुआ हरी सिंह के विषय में सोचने लग जाता है। रणजीत सिंह के स्मृति पटल पर वह घटना उभर आती है जब एक बार शिकार खेलने गए रणजीत सिंह और हरी सिंह के आगे अचानक एक शेर आ जाता है। रणजीत सिंह का तो अभी किरपाण की मूठपर हाथ गया भी नहीं था कि हरी सिंह झपटकर शेर के जबाड़ों में हाथ डाल देता है और उसे पटकी मारकर धरती पर फेंक देता है। पलक झपकते ही नीम बेहोश शेर को तलवार के एक ही वार से मौत के घाट उतार देता है। इस ढंग से शेर का शिकार राजा नल किया करता था। इससे खुश
होकर रणजीत सिंह ने हरी सिंह को न केवल शेर-ए-दिल सेना 1⁄4जिसमें 300 पैदल और 200 घुड़सवार सैनिक थे1⁄2 का सरदार बनाया बल्कि नल 1⁄4शेर1⁄2 पर भारी पड़ने के कारण उसे ‘नलुवे’ का खिताब भी बख़्शा।
सप्ताह बाद हरी सिंह नलुवा ‘हवाई’ नामक वह कुतिया लाकर महाराजा को पेश कर देता है। रणजीत सिंह अपनी बंदूक उठाकर मिसर लाल सिंह और मिसर तेज सिंह को संग लेकर कुतिया को परखने के लिए उसी समय शिकार खेलने चल पड़ता है।
शिकारी कुतिया आँख के फेर में जंगली हिरन को दबोच लेती है। कुतिया का करतब देखकर रणजीत सिंह भौंचक्क रह जाता है। वह मिसर लाल सिंह से सवाल करता है, “कमाल है ! लाल सिंह, बिना डराये-ध् ामकाए या लहू बहाये यह कुतिया कैसे हासिल कर ली ?“
“महाराज, यह तो मैं नहीं जानता कि सरदार हरी सिंह ने तम्बू में जाकर ज़बार खान के साथ क्या बातचीत की। हम तो बाहर झरने के पास खड़े थे।... हाँ, हमने आपके मतलब की एक और चीज़ ज़बार खान के पास देखी है।“
“वह क्या ?“ रणजीत सिंह एकदम लाल सिह के चेहरे पर दृष्टि गड़ा लेता है।
“जब हम वहाँ टहल रहे थे तो हमने वहाँ एक अल्हड़ औरत देखी। सबसे बेखबर... पहाड़ी वादियों में नाचती, गाती घूमती थी। गाती भी कमाल का है कि सुनने वाला कह सकता है कि उसके गले में सरस्वती का वास है और नृत्य देखकर आप खुद कहेंगे कि उसके सिर पर नटराज ने कृपा का हाथ रखा हुआ है।“
तेज सिंह लाल सिंह की बात काटता हुआ कहता है, “महाराज, धर्म से सुन्दर भी खूब है। मोरां सरकार से भी ज्यादा खूबसूरत और एक बिलांद ऊँची। गोरी-चिट्टी, सुडोल शरीर, मान सरोवर झील जैसी गहरी नीली आँखें, काले-स्याह केश तो कमरे से भी नीचे लटकते हैं। कोहकाफ़ की हूर ! हिरणी जैसी चाल है, चलती क्या है, बस समझो जलमुर्गी जैसी तैरती जाती है। आपके हरम की सारी सुन्दरता फीकी कर देगी यदि वह लाहौर दरबार में आ जाए। आपको मशालें जलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी जनाब। अँधेरे से रौशनी करने वाली है, निरी चैहदवीं का चाँद। आपकी सभी दासियों और रानियों को गूठ में लगा देगी। आप देखोेगे तो मूर्छित होकर गिर पड़ोगे। आप उसके रूप को झेल नहीं सकेंगे।“
“बस करो... बस करो। मेरा तो अब चिŸा डावांडोल होने लग पड़ा है।“ रणजीत सिंह अपनी छाती मलने लग पड़ता है, “अच्छा ? इतनी सुन्दर है ? फिर कंजरो, उसको छोड़ क्यों आए ? उठा ले आते। मोरां सरकार भी गर्भवती है और रानी गुड्डां... उस अकेली से भी मेरा ज़ोर झेला नहीं जाता आजकल। बाकी राम देवी, दया कौर, सदा कौर 1⁄4रणजीत सिंह की सास नहीं, रानी1⁄2, गुलाब कौर, महताब देवी, रूप कौर, चाँद कौर, राज बंसो, रानी राज देवी, रानी दवनो देवी, रानी हरदेवी, रानी राम देवी, दया कौर, चाँद कौर, समण कौर, हिलाइशी, लक्ष्मी कौर और पुरानी दासियों से मन ऊबा पड़ा है। मेरे हरम में अब नये फूल की ख़ास ज़रूरत है। फ़कीर अज़ीज़-उद-दीन भी सोने की भस्म और शिलाजीत वाली औषधियाँ मुझे खिलाने से नहीं हटता पतंदर। मैं तंग-सा ही रहता हूँ आजकल...।“
लाल सिंह मुस्कराता है, “मैं तो उठाने लगा था हुज़ूर ?“
“फिर क्या बिल्ली ने छींक मार दी ?“
“वो महाराज, हरी सिंह सरदार ने मुझे गर्दन से पकड़ लिया और
कहने लगा - ख़बरदार अगर किसी स्त्री की ओर बुरी नज़र से देखा तो ! महाराज, मैं क्या करता अगर वो मेरा गला दबा देता तो ! ऊपर से मेरी आँखें निकल आतीं और नीचे से जान। छाती से सांस तो ऊपर चढ़ना ही नहीं था।“ लाल सिंह अपना गला सलहाने लग जाता है मानो वह अभी भी दुख रहा हो।
तेज सिंह, लाल सिंह की बात का समर्थन करता है, “महाराज, आप तो जानते ही हैं, उसके ऊँचे-पवित्र किरदार को। वह दर्रा-ए-खै़बर वाली बात भूल गए ? जब गुलबानो नाम की एक अफगानी स्त्री इसकी मर्दानगी पर मर मिटी थी और अपने प्रेमी गुलफाम को छोड़ कर तम्बू में आकर नलुवे सरदार से कहने लगी थी कि सरदार, मैं तेरे साथ विवाह करवाने आई हूँ, ताकि मुझसे नलुवे जैसा बहादुर पुत्र पैदा हो। जवाब में वह बोला था - विवाह तो बीबी मैं तेरे साथ नहीं करवा सकता। मैं शादीशुदा हूँ। पर तुझे नलुवे जैसा पुत्र क्यों चाहिए ? नलुवा ही तेरा पुत्र बन जाता है। मैं तुझे माँ कह देता हूँ। आज से मैं तेरा बेटा हूँ।“
महाराजा के मन में साजि़शें करवटें लेने लगी हैं, “हूँ...! नलुवे की ऐसी हरकतों पर तो कई बार मुझे भी बहुत खीझ आती है। वह ऊँचे आचरण की जो गठरी उठाये फिरता है, पता नहीं कहाँ लेकर जाएगा।“
लाल सिंह महाराजा की बात के समर्थन में कहता है, “यही तो मैं कहता हूँ। अकाली फूला सिंह भी गृहस्थ जीवन व्यतीत किए बग़ैर चले गए। महाराज, यदि उस पठानी के साथ सरदार विवाह करवा लेता तो सिक्ख कौम में पाँच-दस नलुवे आज और पैदा हो गए होते। बच्चे पैदा करने में पठानी स्त्रियाँ का हाथ अपनी स्त्रियों से ज़रा खुला होता है।“
महाराजा रणजीत सिंह लाल सिंह की बात सुनकर हँसता है, “पर सभी रणजीत सिंह नहीं बन सकते।... लाल सिंह, उस दिलफरेब हसीना के बारे में बताकर तुमने मुझे तड़पाकर रख दिया है। यार, कुछ पता करो कि वह कौन है ?“
“महाराज, हमने सब पता लगा लिया है। उसका नाम भी गुलबानो है और मुश्किल से अट्ठारह साल की होगी। उसकी सौतेली माँ खुद चाहती है कि वह लाहौर सरकार के हरम की शोभा बने और वह उसको आप तक पहुँचाने में पूरा ज़ोर लगा देगी। पर ज़बार खान का फाना बीच में अड़ा हुआ है।“
“मैं शेर-ए-पंजाब यूँ ही नहीं बन गया, अब तक राह की सब बाधाएँ दूर की हैं। लेकिन नलुवे ने यह ठीक नहीं किया। कुतिया बेशक न लाता, पर गुलबानो नहीं छोड़नी चाहिए थी। समझ में नहीं आता, क्या करें अब ?“
“आप शाम सिंह अटारी को भेजकर देखंे।“ 58 मोरां का महाराजा
“मिसर तेज सिंह, तू हर वक्त मुझे उल्टी सलाह दिया कर। मिसर का मतलब होता है, नेक सलाह देने वाला विद्वान मित्र। तू तो अपनी उपाधि का भी ख़याल नहीं रख रहा। भूल गया, मोरां के समय मुझे अकाल बुंगे बुलाकर इन्होंने तनखाहिया करार दिया था। तब मोरां की बहन मोमला की चालाकी से मैं कोड़ों की मार से बच गया था। अब तो बचूँगा भी नहीं। मोरां के साथ विवाह करवाने पर नाराज़ हुए सिक्खों को हैदराबाद के नवाब द्वारा तोहफे में दी गई चाँदनी दरबार साहिब को चढ़ाकर ठंडा किया था।“
“परंतु अब तो खड़क सिंह के बेटे, आपके पोते नौनिहाल सिंह 1⁄49 मार्च 1821 - 6 नवम्बर 18401⁄2 के साथ उसकी बेटी नानकी का विवाह तय हो चुका है। अब अटारीवाला ऐसा नहीं करेगा। आपकी तो रिश्तेदारी भी उल्टी है।“
“तेज सिंह... तेरा मतलब मैं होने वाले समधियों से कहूँ कि वे मेरे लिए औरतें उठाकर लाएँ ? मेरी सफ़ेद दाढ़ी में मिट्टी डलवा तू...।“
“फिर... महाराज, आप जरनैल हीरा सिंह 1⁄4डोगरे ध्यान सिंह का पुत्र1⁄2 को भेजें। आपने तो ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ का नाम बदलकर उसके नाम पर हीरा मंडी रख दिया है। और फिर उसके साथ तो आपकी हर बात खुली है।“
“नहीं, यह उसके बस का रोग नहीं। वह केवल राजपूतानियों और हिंदू रानियों को ही ला सकता है मेरे लिए। पठानी औरत को काबू करना उसको नहीं आता।“
महाराजा रणजीत सिंह की बात सुनकर तेजा सिंह सिर हिलाते हुए कहता है, “महाराज, फिर तो अपने हाथों अपना काम संवारें। आपको खुद ही हिम्मत करनी पड़ेगी।“
इस प्रकार की बातें करते हुए वे जैसे ही शाही किले में पहुँचते हैं, महाराजा को सूचित किया जाता है कि अफरीदी पठानों के कुछ कासिद 1⁄4हरकारे1⁄2 फ़रियाद लेकर आए हैं और महाराजा से मिलने की इच्छा प्रकट कर रहे हैं। महाराजा दरबार में जाकर उनसे आने का मकसद पूछता है।
बुजु़र्ग कासिद संदेशा सुनाने लगता है, “महाराज, हमारे सरदार सैयद समसद बेग ने विनती की है कि अफ़रीद कबीले ने कभी भी लाहौर सरकार की शान में कोई गुस्ताख़ी नहीं की। चुनांचे फिर भी लाहौर सरकार ने हमारा बिना वजह जानी और माली नुकसान करके हम पर क़हर ढाया है। यह सरासर जु़ल्म है, आप तो अपने आप को बहुत ही दयालु और कृपालु कहलवाते हो। आपका दीन पता नहीं क्या कहता है, लेकिन इस्लाम इसको ‘गुनाह-ए-अज़ीम’ कहता है। इस हमले में हमारे बहुत सारे लोगों के साथ सरदार का इकलौता बेटा सुल्तान याकूब भी शहीद हो गया है। बेटे को अपने हाथों सुपर्दे-खाक करके सरदार ने इसको अल्ला ताला की मजऱ्ी समझकर सब्र-संतोष कर लिया है। उसको अब न हम वापस ला सकते हैं, ना आप। लेकिन अजऱ् है कि जो लाहौर सरकार ने हमले के दौरान ‘सफ़ेद परी’ नाम की घोड़ी लूटी है, वह हमें लौटा दे तो हम उसके वजन के बराबर सोना तोलकर देने के लिए तैयार हैं।“
“ऐसी क्या ख़ासियत है उस घोड़ी में ?“ रणजीत सिंह के कान खड़े हो जाते हैं।
“महाराज, वह हज़रत मुहम्मद साहिब की घोड़ी की नस्ल में से है। सरदार के खानदान से पुश्त-दर-पुश्त उसकी नस्लें पैदा होती आई हैं। इसलिए वह हमें बहुत अज़ीज़ है।“
महाराजा माथे की लकीरों को दायें हाथ की उंगलियों से रगड़ता हुआ कुछ सोचकर बोलता है, “बेशक यह हमला लाहौर सरकार की तरफ से था, पर इस हमले में लाहौर सरकार का एक भी सिपाही शामिल नहीं था। इसलिए हमें उस घोड़ी के बारे में कोई जानकारी नहीं है। मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ कि ‘सफ़ेद परी’ के बारे में पता करके आपको ख़बर कर दूँगा। अपने सरदार को हमारा पैगाम दे देना कि लाहौर सरकार अपनी गलती के लिए दुःखी है। हमें आपके सरदार के बेटे की मौत पर गहरा दुःख है। भविष्य में लाहौर सरकार की ओर से आपको कोई दुःख-तकलीफ़ नहीं पहुँचाई जाएगी। लाहौर सरकार 50,000 सोने की मोहरें आपके हुए नुकसान के लिए इवज़ाने के तौर पर अदा करती है और आपके सरदार के फ़रमंद की पर्दा-ए-कब्र के लिए सुनहरी तिल्लेदार चादर भेंट करते हैं। अब आप मेहमानखाने में जाकर आराम करो। आपके लिए भोजन और सोने के लिए इंतज़ाम कर दिया जाएगा। आज की रात ठहरकर कल रवाना हो जाना।“
उनके जाने के पश्चात रणजीत सिंह ज़बार खान से घोड़ी और गुलबानो लेने के लिए खुदा बख़्श, लहणा सिंह मजीठिया और गरबा सिंह जरनैल को भेज देता है।
ज़बार खान के लोग रणजीत सिंह के सिपाहियों को दूर से आता देखकर उसको सूचित करते हैं। ज़बार खान समझ जाता है कि इस बार अवश्य वह सफ़ेद परी को लेने आ रहे होंगे। वह गुलबानों को सफ़ेद परी लेकर दूर एलामी पर्वत के पीछे जाकर तब तक छिपे रहने के लिए कहता है, जब तक वह उसे न बुलाये।
गुलबानो ऐसा ही करती है और रणजीत सिंह के सिपाहियों के पहुँचने से पहले घोड़ी पर सवार हो कर दूर कहीं गायब हो जाती है।
खुदा बख़्श जब ज़बार खान को अपने आने का मकसद बताता है तो ज़बार खान झूठ बोल देता है, “दरोगा साहब, हमने अफ़रीदियों का न तो कोई माल लूटा है और न ही कोई उनकी घोड़ी लेकर आए हैं। आपको किसी ने गलत ख़बर दी है। आप चाहो तो तलाशी ले सकते हो।“
खुदा बख़्श समझ जाता है कि तलाशी लेने का कोई फ़ायदा नहीं। इसके उपरांत वह महाराजा की गुलबानों वाली अगली इच्छा ज़बार खान के समक्ष रख देता है।
यह सुनकर ज़बार खान खामोश हो जाता है और चिंता में डूबे होने का ढांेग करते हुए कुछ देर रुककर बोलता है, “यह तो आपने मुझे और भी गंभीर संकट में डाल दिया। मेरी बच्ची महाराजा साहिब की शरीक-ए-हयात बनती, इससे बड़ी मेरे लिए खुशी की और क्या बात हो सकती थी। यह तो मुझ पर लाहौर सरकार का उपकार है। परंतु, मसला यह है कि उसका निकाह होना निश्चित है। दिया हुआ कौल तोड़ना हमारे मज़्हब में गवारा नहीं है। मैं अपने हाथों अपनी बेटी को क़त्ल कर सकता हूँ, लेकिन उसका निकाह कहीं दूसरी जगह नहीं कर सकता। माफ़ करना इस मामले में भी मैं
आपके लिए कुछ भी करने में असमर्थ हूँ। आप लाहौर सरकार को मेरा माफ़ीनामा पेश कर देना।“
“संकट में तुम नहीं, दुविधा में तो तुमने हमें डाल दिया है। कौन-सा मुँह लेकर लाहौर सरकार के पास हम खाली हाथ जाएँगे।“ गरबा सिंह, ज ़बार खान के चेहरे को घूरते हुए कहता है।
ज़बार खान उठता है और एक संदूक में से तलवार निकालकर खुदा बख़्श से पेश करता है, “मैं आपको खाली हाथ नहीं जाने दूँगा। यह हज़रत बाकर साहिब की हमारे पुरखों को बख़्शी हुई खुरासानी तलवार है। इसको ‘इलाही’ कहते हैं। यह कोई मामूली तलवार नहीं है और इसकी विशेषत यह है कि यह कभी भोथरी नहीं होती और इसको कभी धार पर लगाने की ज ़रूरत नहीं है।“
“ख़ैर, तुम्हारा नज़राना तो मैं महाराज तक पहुँचा दूँगा, पर मुझे लगता नहीं इससे महाराज को तसल्ली मिलेगी।“ लहणा सिंह, ज़बार खान के पास से उठता हुआ कहता है।
खुदा बख़्श वापस लौटकर रणजीत सिंह से सारी बातचीत बताते हुए जब तलवार पेश करता है तो रणजीत सिंह मुस्कराता है, “खुदा बख़्श, तुम इसका मतलब समझते हो ?“
“नहीं महाराज।“
“यह खुलेआम बगावत का प्रतीक है। ज़बार खान कह रहा है कि हम तुम्हारी गुलामी स्वीकार नहीं करते और हमारे में तुम्हारा मुकाबला करने का साहस है। पर जो तुम चाहते हो, वो तुम्हें मिलेगा नहीं। इसको भूल जाओ।“
रणजीत सिंह ने अभी यह वाक्य पूरा ही किया होता है कि उसको सूचित किया जाता है कि कोई नसीरी कबीले का नौजवान महाराजा से मिलना चाहता है। रणजीत सिंह उसको मिलने की अनुमति दे देता है।
वह नौजवान अपना परिचय अल्लादिŸाा के तौर पर करवाता है और रणजीत सिंह को बताता है कि सफ़ेद परी ज़बार खान के पास है। वह रणजीत सिंह को उस तक पहुँचा सकता है, अगर रणजीत सिंह उसको अपनी रियासत में पनाह दे और उसकी शादी गुलबानो से करवा दे।
रणजीत सिंह को उस नौजवान पर संदेह होता है और वह सवाल करता है, “ज़बार खान के साथ गद्दारी करके सफ़ेद परी के बारे में सूचना देने के लिए तू हमारे पास क्यों आया है ?“
“महाराज, असल में मैं बचपन से ही गुल चिराग उर्फ़ गुलबानो से प्यार करता हूँ। गुलबानो ज़बार खान की सगी औलाद नहीं है। डकैती के समय उससे एक औरत का क़त्ल हो गया था और यह उसकी बेटी है। लावारिस छोड़कर आने की बजाय यह उस पर रहम करके लूट के माल के साथ अपने पास उठा लाया था। लेकिन ज़बार खान ने उसको अपनी सगी औलाद से भी बढ़कर पाला है। तीन शादियाँ करने के बावजूद उसके कोई औलाद नहीं हुई। यह उसकी इकलौती औलाद है।“
“फिर... क्या यह सही है कि उसका जल्दी ही निकाह हो रहा है ?“ “बिल्कुल सही है यह बात। हमारे कबीले के दस्तूर के मुताबिक एक
61 मोरां का महाराजा
रस्म है जिसको हम ‘उकाबपंजा’ कहते हैं। जब हमारे कबीले की कोई लड़की शादी के योग्य हो जाती है तो उसका पिता उकाबपंजे कीघोषणा कर देता है। लड़की से शादी करने के इच्छुक सभी नौजवान
लड़की के पिता के आगे अपने अपने दावे पेश करते हैं। फिर एक तय किए गए दिन लड़की का पिता सबको बुला लेता है। रस्म के अनुसार लड़की घोड़े पर बैठकर पहले घोड़ा दौड़ा लेती है और उसके आँखों से ओझल होने के बाद सभी दावेदार घोड़ों पर उस लड़की का पीछा करते हैं। जो लड़का उस घोड़े पर बैठी लड़की को उठा लाए, लड़की उसी की हो जाती है। पर इसमें एक ही शर्त है कि यदि कोई अन्य कबीले की ओर वापस लौटते हुए उस लड़की को उस लड़के से छीन ले तो लड़की नये लूटने वाले की हो जाती है।“
“अच्छा ! अगर तुम्हारी यह रस्म है तो फिर हम तेरा निकाह उसके साथ कैसे करवा सकते हैं ?“
“आपने मुझे अपनी बात तो पूरी नहीं करने दी। महाराज, कुछ रोज़ पहले ज़बार खान ने उकाबपंजा आयोजित किया था और मैं गुलबानों को उठा लाया था। मेरे से मेरे ही चाचा का बेटा दीन बेग गुलबानो को छीनकर ले गया और मैं उसी दिन से अपनी किस्मत को कोस रहा हूँ।“ इतना बताते हुए अल्लादिŸाा का गला भर आया।
“कोई बात नहीं, तू घबरा मत। कुछ दिन तू हमारी रियासत में रुक सकता है। हम इसका कोई हल सोचते हैं।“
“नहीं महाराज, फिर तो बहुत देर हो जाएगी। क्योंकि आपके सिपाहियों के रुखसत होने के बाद ज़बार खान ने सारे कबीले को इकट्ठा करके कहा था कि अब लाहौर सरकार हम पर हमला करेगी। इसलिए यह जगह छोड़कर सब काबुल पार हीरत चल जाएँ। अब तक तो वे जाने की तैयारी भी कर चुके होंगे।“ अल्लादिŸाा एक सांस में बयान करता है।
यह सुनकर रणजीत सिंह हरकत में आ जाता है और अपने कुछ अहलकारों को ज़बर खान के कबीले पर आक्रमण करके सफ़ेद परी और गुलबानो को लाने के लिए आदेश देता है। स्वयं महाराजा मोरां सरकार, हरी सिंह नलुवा, शेख इलाही बख़्श, शाम सिंह आदि को लेकर लार्ड विलियम बैंटिक से मिलने सतलुज की ओर चल पड़ता है।
उधर अपना माल-असबाब एकत्र करते और तम्बू उखाड़ते हुए नसीरी एक-दूजे के साथ बातें करते हुए कहते हैं, “कयामत ही आ गई है। वह भी कोई समय था जब ‘सोने की चिडि़या’ कहलाने वाले इनके देश को हम लूटा करते थे। इनमें यह कहावत बनी हुई थी कि खाया-पिया लाहे का, बाकी अहमद शाहे का।“
“मौला के रंग हैं। अब नौबत यहाँ तक आ गई है कि हम अपने बच्चों को डराकर सुलाते हुए कहते हैं - सो जा, नहीं तो हरी सिंह नलुवा आ जाएगा।“
“कभी हम इन्हें लूट कर इनकी बहु-बेटियों को उठाकर लाते थे और अब ये हमें लूटने और हमारी बहु-बेटियों पर बुरी नज़र रखने लग पड़े हैं। हमें अपनी जान की सलामती के लिए इन्हें खैरात देनी पड़ती है।
दर्रा-ए-खैबर पर छोड़े इनके ‘बोले सो निहाल’ के जैकारे की गूंज काबुल तक सुनाई देती है।“
महाराजा रणजीत सिंह के सिपाहियों को ख़बर हो जाती है कि नसीरी कोह सुलेमान छोड़कर माणकाणे घोलसई के किले में पहुँच गए हैं जहाँ कुछ दिन आराम करने के उपरांत वे दर्रा-ए-खैबर के पास से रात के अँधेरे का फायदा उठाकर काबुल की ओर कूच कर जाएँगे।
महाराजा रणजीत सिंह की फौजें मणकाणे में ही नसीरियों पर आक्रमण कर देती हैं। एक छोटी-सी झड़प के बाद नसीरी हाथ खड़े कर देते हैं क्योंकि अल्लादिŸाा नसीरियों की सारी कमज़ोरियाँ रणजीत सिंह को बता चुका होता है। लाहौर सरकार के सिपाही सफ़ेद परी और गुलबानो को उठा लाते हैं।
महाराजा रणजीत सिंह के हरम में पहुँचने पर गुलबानो की सेवा के लिए जैनब खातून नाम की अफ़गान दासी तैनात कर दी जाती है। एक-दो दिन में ही गुलबानो जैनब खातून के साथ इतना खुल जाती है मानो वे माँ-बेटी हों। इसका एकमात्र कारण यह भी कहा जा सकता है कि वे दोनों एक ही मिट्टी से जन्मी थीं।
“मैंने सुना है, यह सिक्ख रणजीत सिंह बड़ा ज़ालिम और निर्दयी राजा है ?“ यकायक गुलबानो के मुँह से निकल जाता है।
जैनब खातून महाराजा की पैरवी करने लगती है, “नहीं, ऐसा नहीं है। तूने गलत सुना है। वह बहुत ही नेक और दरियादिल पुरुष है। ले फिर सुन उसके बारे में...। एक बार महाराजा कहीं जा रहा था और कुछ बच्चे बेर तोड़ने के लिए बेरी को पत्थर मार रहे थे। एक पत्थर अचानक आकर रणजीत सिंह को लगा और सिपाही बच्चों को डाँटने-फटकारने लगे। रणजीत सिंह ने बच्चे से पत्थर मारने का कारण पूछा। इस पर बच्चे ने बताया कि वह बेरी के पेड़ को पत्थर मारता है तो बेर गिरते हैं। यह सुनकर रणजीत सिंह ने सभी बच्चों को कुछ मोहरें प्रदान की और कहा कि अगर बेरी पत्थर मारने पर तुम्हें बेर देती है तो पत्थर लगने पर राजा से भी तुम्हें कुछ मिलना चाहिए। ऐसा है हमारा महाराजा।“
“पर, मैंने तो सुना है कि वह काफि़र इतना अत्याचारी और खुदगर्ज़ है कि उसको किसी से मोह नहीं। सिवाय अपने आप के वह किसी दूसरे के बारे में नहीं सोचता। यहाँ तक कि वह अपने घोड़े पर भी किसी दूसरे को नहीं बैठने देता। हमारे कबीले वाले बातें किया करते थे कि एक बार उसका बेटा उसके घोड़े पर बैठ गया तो उसने बेरहमी से उसको भी पीटा।“
“यह बात भी सही है। वैसे वह अच्छों के संग अच्छा और बुरों के संग बुरा है। पर दिलफरेब औरतों के आगे तो वह बीन की तान पर नाचती नागिन की तरह डोलने लग जाता है। मोरां सरकार को ही ले लो। महाराजा को उसने अपनी अदाओं से कठपुतली बना रखा है। जैसा वह कहती है, वह वैसा ही करता है। यदि मोरां दिन को रात कहे तो वह कहेगा रात। अगर मोरां रात को दिन करे तो वह कहेगा दिन। सारा दिन मोरां मोरां करते की जीभ नहीं थकती।“
“यह मोरां सरकार कौन है ?“ गुलबानो कान खड़े कर लेती है। 63 मोरां का महाराजा
“महाराजा की बाईस दासियों और अट्ठाईस रानियों में से एक रानी है। उसके बारे में फिर कभी बताऊँगी। बस, यह समझ ले, काला जादू करने वाली बंगाल की जादूगरनी है। पर तुझे इतना चेतन और चैकन्ना करती हूँ कि उससे बचकर रहना और कभी उसकी बात का यकीन न करना। बाकी मैं सब संभाल लूँगी। तू चिंता न कर।“ जैनब खातून गुलबानो का सिर सहलाती है।
मोरां का नाम सुनकर और महाराजा की अटठाईस रानियों तथा अनेक दासियों के बारे में जानने के बाद गुलबानो अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो उठती है, “न मालूम, मेरे साथ सिक्ख महाराजा कैसा सलूक करेगा ?“
“रणजीत सिंह कामवासना का बहुत भूखा है और महाराजा जैसे जिन्न को बोतल में बन्द करने के गुर मैं तुझे सिखा दूँगी। पिछले पंद्रह साल से मैं इस शाही महल में सेवा कर रही हूँ। यहाँ बहने वाली हवाओं से भी मैं खूब वाकिफ़ हूँ।“
जैनब खातून की बातें सुनकर गुलबानो को कुछ हौसला-सा हो जाता है और वह प्यार से उसको मौसी कहकर पुकारने लग जाती है। जैनब खातून उसको महल के सारे कार्य-व्यवहार, रणजीत सिंह की ताकत व कमज़ोरियों की जानकारी के साथ साथ महाराजा को खुश रखने के सारे ढंग सिखा देती है। हाँ, शाही हरम में चलते षड्यंत्रों का मुकाबला करने के उपाय और सुझाव भी विशेष तौर पर देती है।
सप्ताह भर में ही गुलबानो के हुस्न का चर्चा सारे राजमहल में फैल जाता है। जिससे महाराजा की रानियों और दासियों में तो शोक की लहर दौड़ जाती है, लेकिन महाराजा के सिंह सरदार जरनैलों की बांछे खिल जाती हैं। क्योंकि मोरां से महाराजा का ध्यान हटाने का उन्हें काफ़ी समय से कोई हल नहीं मिल रहा था।
मालखाने का दरोगा कान्ह सिंह ज्ञानी गुरमुख सिंह को घेरकर बताता है, “मैंने सुना है, यह गुलबानो ईरान के बादशाह कैखुसरो सयाबख़्श के वंश में से है और इसकी माँ अरब के शाही परिवार से संबंध रखती थी।“
“शाही खून हो या न, पर कम से कम कंजर घराने की तो नहीं है। कहते हैं, हसीन तो बहुत है। अगर यह थोड़ी समझदार भी हुई तो महाराजा का उस भूतनी मोरां से पीछा ज़रूर छुड़वा देगी।“ ज्ञानी गुरमुख सिंह अपनी दलील पेश करता है।
“खालसा जी, वाहेगुरू करे ऐसा ही हो। मेरा दिल कहता है, यह गुलबानो दासी तो महाराजा के लिए होगी। लेकिन खालसा पंथ के लिए तो गजनाल 1⁄4हाथियों द्वारा खींचकर प्रयोग में लाई जाने वाली विशाल तोप1⁄2 है, जो मुझे विश्वास है कि मोरां जैसे किले को भी ध्वस्त कर देगी।“ मिŸा सिंह पधानियां जंगी जरनैल अपने मन की कहता है।
इस प्रकार, मोरां से दुःखी सातांे सिक्ख अहलकारों के दिलों में गुलबानो बिना कुछ किए ही घर कर जाती है।
कर्नल वैड की अधीनता में ब्रितानवी गर्वनर जनरल लार्ड ओकलैंड जाॅर्ज ईडन 1⁄41791-18371⁄2 की ओर से नियुक्त किए गए अफ़सर जाॅसफ डेविड कनिंघम 1⁄4जो बाद में सिक्ख इतिहासकार के रूप में प्रसिद्ध हुआ1⁄2 और लार्ड विलियम बैंटिंक के साथ कोई विशेष संधि 1⁄415-26 अक्तूबर 1831 की रोपड़ संधि1⁄2 करने के उपरांत महाराजा लाहौर शाही किले में लौटता है। महाराजा काफ़ी खीझा हुआ है क्योंकि यह संधि उसको विवशता में करनी पड़ी है। इस संधि का अर्थ है कि महाराजा की फौजें कभी भी सतलुज के पार के क्षेत्रों में नहीं जा सकेंगी। महाराजा का सपना था कि वह सतलुज पार के इलाकों को भी अपनी रियासत अर्थात सिक्ख सल्तनत में शामिल करे। परंतु सतलुज पार के राजा फिरंगियों से मिल गए जिसके कारण महाराजा की सारी ख्वाहिशें मिट्टी में मिल गई हैं। यदि महाराजा यह संधि न करता तो उसको फिरंगियों के सतलुज पार करके उसके अधिकार क्षेत्र में आने का डर बना रहता। महाराजा अपने दिल को समझाता है कि चलो, इधर का इलाका नहीं तो न सही। अब मैं अफ़गानिस्तान को एकाग्र होकर तो जीत ही सकता हूँ।
शाही किले में पहुँचकर घोड़े से उतरते ही महाराजा को सफे़द परी दिखाई देती है। महाराजा का गुस्सा और थकावट से मायूस हुआ चेहरा खुशी से खिल उठता है। वह घोड़ी की रेशमी धागों जैसी मुलायम पीठ को सहलाने लग जाता है। मिसर तेज सिंह महाराजा के करीब आकर कानाफूसी करता है, “महाराजा गुलबानो भी ले आए हैं।“
यह सुनकर महाराजा घोड़ी को थपथपाता है और महल की आरामगाह की तरफ चल पड़ता है।
शराब का जाम बनाकर महाराजा जैनब खातून को बुलाकर आदेश देता है कि आज की रात वह केवल गुलबानो के साथ बिताएगा। जैनब खातून गुलबानो को तैयार करके शबस्तान में भेजने का इकरार करती लौट जाती है।
गुलबानो को इत्रजल वाले स्नान कुंड में नहला-धुलाकर जैनब खातून उसका शृंगार करती है और महाराजा के शयनकक्ष में छोड़ आती है। मल्हार सेज पर ताज़ा गुलाब और चमेली के फूल बिखेरे जाते हैं।
महाराजा कमरे में प्रवेश करता है तो गुलबानो गहनों से लदी और सजी-धजी पलंग पर बैठी होती है। महाराजा को देखकर सहमी हुई वह और अधिक डर जाती है। जब महाराजा उसके पास जाकर खंखारते हुए बैठता है तो वह और अधिक खौफ़ज़दा हो उठती है। महाराजा अपने सिरहाने के नीचे मोहरों की थैली रखकर पलंग पर बैठ जाता है और गुलबानो की ओर देखता है। बहुत देर तक महाराजा की निगाह गुलबानो की हेम पर्वत जैसी उभरी ठोस छाती पर टिकी रहती है।
हकलाती हुई जु़बान से वह महाराजा को सलाम बुलाती है और गर्दन झुका लेती है। महाराजा एकदम चैंककर अपने आपको संभालता है और गुलबानो की ठोड़ी के नीचे अपना हाथ का आसरा देकर जब उसका चेहरा देखता है तो अपने आप महाराजा के मुँह से निकल जाता है, “आफ ़रीन... आफ़रीन... चैहदवीं का चाँद नहीं, तू तो निरा आफ़ताब है आफ़ताब !“
गुलबानो आँखें बन्द कर लेती है। महाराजा गुलबानो के करीब खिसककर अपनी आँख मूंदता है और नाक से अंदर की ओर सांस खींचता है। गुलबानो के बदन की महक महाराजा के नाक से होती हुई पहले उसके
65 मोरां का महाराजा
दिमाग को चढ़ती है, फिर उसके शरीर में दौड़ते खून में मिलकर पैरों के तलुवों तक पहुँच जाती है। महाराजा को यूँ सुरूर चढ़ता है मानो उसने अफ ़गानी कबीलों की बनाई शराब जु़मरमा पी ली हो।
महाराजा गुलबानो के कांपते अधरों का एकटक देखने के बाद उन पर दायीं ओर से शुरू करके बायीं ओर आहिस्ता आहिस्ता अपनी उंगली फिराना प्रारंभ कर देता है। महाराजा की उंगली के स्पर्श से गुलबानो के होंठ और अधिक थिरकने लग जाते हैं। जब महाराजा की उंगली गुलबानो के लबों के दूसरे किनारे पर पहुँचती है तो महाराजा गुलबानो की बायीं रुखसार पर अपना हाथ टिका लेता है और गुलबानो के करीब होकर उसकी सुनहरी नत्थ नाक से उतार देता है। फिर महाराजा गुलबानो का मुख अपनी दोनों हाथों में लेकर उसके कंपकंपाते होंठों की ओर अपने होंठ बढ़ाता हुआ कहता है, “कसम गुरू की, फुर्सत में बैठकर बनाया है रब ने तुझे। ऐसा हसीन मुखड़ा मैंने जि़न्दगी में पहले कभी नहीं देखा। क्या खाकर पैदा करती हैं तुम्हारी माँएँ तुम्हें ?“
इतना सुनते ही गुलबानो की आँखों में से अश्रुओं की अविरल धारा बहने लगती है। महाराजा का आश्किाना अंदाज एकदम गंभीर हो जाता है।
“क्या बात है ?“
गुलबानों बोलने की बजाय ज़ारोज़ार रोना शुरू कर देती है।
“रो क्यों रही है ? मैंने क्या तुझे लाठी-डंडा मारा है या भंगियों की
तोप 1⁄4ज़मज़मा1⁄2 चला दी है ?“
“बादशाह सलामत, मैंने अपने माँ-बाप को नहीं देखा। आपने
माँ की याद दिलाई तो मैं अपने आँसू रोक नहीं पाई।“
“ओह, अच्छा यह बात है। माफ़ करना, मुझे याद नहीं रहा था। एक
तरह से मैं भी तेरे जैसा ही बदकिस्मत हूँ। अभी बहुत छोटा था कि मेरे बाप का निधन हो गया। मैं भी बाप के लाड़-प्यार से महरूम रहा हूँ। मेरी माता का साथ भी मेरे साथ अधिक नहीं रहा। मैं समझ सकता हूँ, तेरे दुःख को। बस, ईश्वर की मजऱ्ी मानकर सब्र करने के सिवाय इन्सान और कुछ नहीं कर सकता। मरना सच है और जन्म लेना झूठ, इस महावाक्य के अनुसार जो भी आया है, उसको एक दिन तो इस नश्वर संसार से जाना ही है। पर तू रो न। रोने से कुछ नहीं होता। अब वह वापस आने से रहे।“ महाराजा गुलबानो की आँखें पोंछने लग पड़ता है।
कुछ देर सिसकियाँ भरकर गुलबानो शांत हो जाती है। महाराजा वातावरण को बदलने के लिए सवाल करता है, “कुछ अपने विषय में बता। मैं तेरी बीती जि़न्दगी के बारे में जानना चाहता हूँ।“
“बताने को है ही क्या ? मेरे माँ-बाप कौन थे, कौन नहीं, मैं नहीं जानती। कबीले वालों से सुना था कि मैं छह-सात महीने की थी, जब अब्बा ज़बार खान को मैं मिली थी। उन्होंने मुझे सगे पिता से भी अधिक प्यार दिया है। हाँ, सौतेली माँओं की बदसलूकी मैं अवश्य सहन करती आई हूँ। बस, कबीले वालों के साथ रहकर पली और बड़ी हुई। और...।“
“हूँ... और क्या ?“ महाराजा करीब रखे शराब के प्याले को मुँह लगाते हुए कहता है।
“और अब आप उठा लाए हो। अभी पता नहीं किस्मत मुझे क्या क्या रंग दिखाती है।“
“गुलबानो, ग्रंथों में लिखा है कि बीते पर पछताना, वर्तमान को नहीं संभालना और भविष्य की चिंता करना मूर्खता है। यहाँ तुझे कोई दुः ख-तकलीफ़ नहीं होगी। मैं तेरी हर सुख-सुविधा का ख़याल रखूँगा। ज़रा सोच, कबीले में ही तेरा विवाह कौन-सा तेरी इच्छा से होना था ? वहाँ भी तुझे उसी का बनना था जो तुझे उठाकर ले जाता। समझ ले, उकाबपंजे की रस्म में शेर-ए-पंजाब रणजीत सिह भी शामिल था। अपनी किस्मत इन्सान स्वयं लिखता है। यदि तुझे मैं अपने बारे में बताने लग जाऊँ तो तू हैरान रह जाएगी कि मेरे साथ किस्मत ने कितने धोखे किए हैं। पहले पिता की मौत... फिर चेचक की बीमारी... जिसने न सिर्फ़ मेरा चेहरा ही खराब किया बल्कि मेरी एक आँख भी सदा के लिए छीन ली। पर मैंने परवाह नहीं की। यदि ईश्वर दूसरी भी छीन लेता तो मैं क्या करता ? मैं इसी एक आँख से दो आँखों जितना काम लेता हूँ। जिस चीज़ पर मेरी यह आँख टिक जाए, मैं उसको हासिल करके ही छोड़ता हूँ। मिसाल के तौर पर मेरे लैला घोड़े की ही बात ले ले। पूरा 60 लाख रुपयों और 12,000 सैनिकों की जानें न्योछावर कीं और अपने पुत्र शेर सिंह और नेपोलियन बोनापार्ट के लिए कई जंग लड़ चुके पैदल सेना के प्यारे फ्रांसिसी जरनैल ज़ीन बैपटीस्टो वैंटिउरा 1⁄41794 -18581⁄2 की जि़न्दगी दांव पर लगाई, पर मैं सुल्तान मुहम्मद से घोड़ा प्राप्त करके ही माना। पूरा सैंतीस लाख खर्च किया है मैंने उसके दोशाले और जड ़ाऊ साज पर... जब लैला पर सवार होकर जाता हूँ तो लोग कहते हैं, वो देखो... शुक्रचक्किये बुध सिंह का पड़पोता जा रहा है...।“
गुलबानो कोई हुंकारा नहीं भरती, मानो उसने सुना ही नहीं हो। महाराजा अपने आप ही बोलना जारी रखता है, “इस लाहौर के किले को ही देख। एकबार यहाँ से गुज़रते हुए मेरी आँख इस किले पर पड़ गई। मैंने उसी समय मन में निश्चय कर लिया कि इस किले को फतह करना है। मैंने उसी दिन अपने विश्वासपात्र अब्दुल रहमान को पूरा जायज़ा लेने के लिए लाहौर भेज दिया। शाह शुजाह के वापस लौट जाने के बाद लाहौर पर भंगी रियासत के लोगों ने कब्ज़ा कर लिया था। भंगी मिसल के तीनों सरदार - साहिब सिंह, चेत सिंह और मोहर सिंह आपस में लड़ते रहते थे। जब मुझे काज़ी रहमान ने आकर बताया तो मैं समझ गया कि अब बात बन सकती है। उससे बढि़या बात यह हुई कि कसूर का नवाब निज़ाम दीन भी लाहौर पर कब्ज़ा करने को घूमता था। लाहौर की प्रजा पहले ही अफ़गानियों से दुखी हुई पड़ी थी। फिर भंगी मिसल से तंग आ गई। ऊपर से उन्हें निज़ाम दीन का डर था। वे खुद चाहते थे कि लाहौर पर मैं कब्ज़ा कर लूँ। इस काम के लिए मैंने शहर के हिंदू, सिक्ख और मुसलमान के कुछ सम्मानित व्यक्तियों जैसे हकीम हाकिम राय, मियां मुहकम दीन, मियां मुहम्मद बाकर, मियां मुहम्मद ताहिर, मियां आशक मुहम्मद, भाई गुरबख्श सिंह आदि को अपने संग मिला लिया। फिर मैं अपनी सास सदा कौर 1⁄41762-18321⁄2 को फौज सहित बटाला से लाया और हम पच्चीस हज़ार फौज़ इकट्ठी करके लाहौर के निकट वज़ीर खां के बाग में आ रुके। फौज को मेरी सास ने दो भागों में
बांट दिया। एक की कमान मैंने संभाली और एक की मेरी सास ने। मैं छोटी-सी टुकड़ी लेकर लाहौरी दरवाजे़ की ओर हो गया और मेरी सास बाकी फौज को संग लेकर दिल्ली दरवाज़े की ओर हो गई। शेष बची फौज दूसरे दस दरवाज़ों 1⁄4अकबरी, मोची, भट्टी, टकसाली, कश्मीरी, शेरां वाली, मस्ती, रौशनाई, यक्की, खिलज़ी1⁄2 की ओर बिखेर कर हमने रात में ही हल्ला बोल दिया। साहिब सिंह और मोहर सिंह तो भाग गए। चेत सिंह किले में छिप गया। मियां मुहकम दीन के इशारे पर दरवाज़े खुले और हमने लाहौर पर कब्ज़ा कर लिया।“
महाराजा की बातें सुनकर गुलबानो की उत्सुकता भी जाग पड़ी, “और आपकी आँख किस किस चीज़ पर टिकी ?“
“मेरा गणेशमुखी हाथी देखा है तूने ? जब मेरी आँख इसपर टिकी, मुझे जम्मू के राजा पर चढ़ाई करनी पड़ी। मैंने भी कहा, मैं नौध सिंह का पड ़पोता नहीं अगर मैंने इस हाथी की सवारी न की। मैंने मीरोवाल, नारोवाल, सियालकोट, दिलावरगढ़ भी इस हाथी को पाने के लिए जीते।“ अपनी प्रशंसा के किस्से सुनाते हुए रणजीत सिंह को जब अहसास हुआ कि वह अकेला ही बोले जा रहा है और गुलबानो का ध्यान कहीं और है तो उसने गुलबानो को कंधा पकड़कर झिंझोड़ा, “तू सुन रही है न कि मैं अकेला ही बोले जा रहा हूँ ?“
“बादशाह सलामत ! मैं सोच रही थी कि अभी तो आपकी एक आँख है जो इतने पंगे डाले जा रही है। यदि दो होती, फिर आप क्या करते?“
“फिर मैं एक आँख तेरे हुस्न को देखने के लिए रख लेता और दूसरी बाकी दुनिया के लिए।“
महाराजा की हाजि़र जवाबी देखकर गुलबानो खिलखिलाकर हँस पड़ी। गुलबानो को हँसते देखकर महाराजा के भी गुदगुदी होने लग पड़ी और वह भी मुस्कराये बिना नहीं रह सका। महाराजा ने अच्छा अवसर भांपकर गुलबानो को अपनी बांहों में कस लिया। गुलबानो ने भी ढीले से हाथों से महाराजा को आलिंगन में ले लिया। महाराजा के शरीर में झनझनाहट सी दौड़ गई।
“गुल, एकबार ज़ोर से कस मुझे अपनी बांहों में।“ महाराजा को आनन्द-सा आने लगा।
गुलबानो ने हल्का-सा महाराजा का शरीर कसा।
“नहीं, बात नहीं बनी। ठीक से दबा। पठानी स्त्रियाँ तो जफ्फी में दबाकर आदमी मार दिया करती हैं। इतना ज़ोर भी नहीं तेरे में।“
गुलबानो ने इस बार अपनी देह का पूरा ज़ोर लगाकर महाराजा को अपनी बांहों में भींच लिया। महाराजा ने भी गुलबानों के शरीर को कसा। महाराजा को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे बिना लड़े उसने सारे अफगानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया हो।
महाराजा आलिंगन को ढीला करके गुलबानो को चूमते-चूमते बिस्तर पर लिटा देता है और उसके अंगवस्त्र की फीतियों को खोलने लग जाता है। गुलबानो के जिस्म को बेपर्दा करके उसके पेट पर हाथ फेरते फेरते छाती की ओर बढ़ने लगता है और इस तरह महाराजा उसके पूरे बदन को सहलाने
68 मोरां का महाराजा
लग जाता है। फिर वह गुलबानो को दायीं बाजू से पकड़कर करवट दिलाता हुआ पेट के बल लिटाते हुए कहता है, “मैंने सुना है, पठानी औरतों का पीछा बहुत सुंदर होता है।“
गुलबानो की दरियाई घोड़ी जैसी कदकाठी और कश्मीरी रजाई जैसी मखमली पीठ देखकर महाराजा की आँखें चुंधिया जाती हैं। वह गुलबानो की पीठ पर हल्का-हल्का और धीरे-धीरे यूँ हाथ फेरता है मानो धूप में सूखने के लिए डाले गए दानों को फैला रहा हो। इतना करते ही महाराजा की कामुकता का घड़ा छलकने लग पड़ता है और वह वेग में आकर अंधाधुंध गुलबानो की नंगे नितम्बों पर अपने चुम्बनों के ठप्पे लगाने लग पड़ता है। जब गुलबानो भी आनन्द में डूबने लगती है तो उसे सीधा करके रणजीत सिंह मुठभेड़ आरंभ कर देता है।
अगले दिन सूरज जब शिखर आसमान पर होता है तो महाराजा उठकर अपने वस्त्र पहनता है और आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर अपनी दाढ़ी में कंघा करता हुए जब अपने चेहरे को निहारता है तो उसको यूँ प्रतीत होता है मानो उसके मुख पर से चेचक के दाग गायब हो गए हों और वह बहुत निखर आया हो। उसको अपना लाल हुआ चेहरा देखकर यकीन ही नहीं आता कि यह पहले वाला रणजीत सिंह ही है। महाराजा मूंछों को मरोड़े देकर मन ही मन मुस्कराता है।
भाई राम सिंह महाराजा के सिरहाने के नीचे से मोहरों वाली थैली उठाकर रोज़ के नियम के अनुसार गरीबों में जाकर दान कर देता है।
तैयार होकर महाराजा दरबार लगा लेता है। अल्लादिŸाा दरबार में आ उपस्थिति होता है और महाराजा को सिजदा करता है, “नसीरियों पर जीत मुबारक हो महाराज। आपकी सफ़ेद परी को प्राप्त करने की ख्वाहिश पूरी हो गई।“
“तेरी मदद से ही यह सब संभव हो सका है। मैं खुदा बख़्श से कहता हूँ, वह तुम्हें घोडि़यों के रसाले में किसी न किसी काम पर लगा देगा या गौरखा मताबर सिंह से कहता हूँ, तुझे पहरेदार भर्ती कर लेगा।“
“महाराज, मैं आपका अहसान जि़न्दगी भर नहीं भूलूँगा। अब आप मेरा और गुलबानो का शीघ्र निकाह करवा दें। मैं हमेशा आपका वफ़ादार रहूँगा और ज़रूरत पड़ने पर आपके लिए जान भी दे दूँगा।“
“बहुत अच्छा। समझ ले, तेरी जान हमने ही ले ली।“
“जी, मैं समझा नहीं।“
“गुलबानो अब लाहौर सरकार के हरम में रहेगी। लाहौर दरबार में
वह नाचा और गाया करेगी। बिल्लो, पारो और नसरीन बाई के नगमे सुन सुनकर हमारे कान पक गए हैं। तू गुलबानों को यह समझकर भूल जा कि उसको उकाबपंजे की खेल में तेरे चचेरे भाई ने नहीं, रणजीत सिंह ने तुझसे छीना था। तेरे निकाह के लिए कोई दूसरी औरत तलाश देंगे। हम तुझे अपनी रियासत में रहने की आज्ञा ही नहीं देते, तुझे नौकरी और रिहायशगाह भी मुहैया करवाएँगे।... चल, तू भी क्या याद रखेगा, मैं मिसर बेली राम को कहता हूँ कि तुझे कोई योग्य चाकरी दे दे। सरकारी खजाने और तोशेखाने की सारी जिम्मेदारी उसके और उसके भाइयों के पास है।“ महाराजा
अल्लादिŸाा को लालच देकर उसका ध्यान गुलबानो से हटाने के मंतव्य से कहता है।
“पर आपने मेरे साथ वायदा किया था कि...।“
“वायदे किए ही तोड़ने के लिए जाते हैं बरखुरदार। हमने तो वायदा ही किया था। तुम लोग तो कसमें खाकर मुकर जाते हो। अब गुलबानो हमें अपना चुकी है और अंग भी लगा चुकी है। वह सही जगह पहुँच गई है। उसकी जगह तम्बुओं में नहीं, शाही महलों में है। तू उसकी जि़न्दगी खराब न कर। सयाना बनकर मेरा कहना मान ले।“
यह सुनकर मायूस-सा होकर अल्लादिŸाा दरबार में से चला जाता है।
“महाराज, अल्लादिŸाा को रियासत में रखने की आप गलती कर रहे हैं। एक दिन बागी होकर वह लाहौर सरकार को नुकसान पहुँचाने की कोशिश ज़रूर करेगा।“ जरनैल चेत सिंह बाजवा महाराजा को सलाह देता है।
“फिर ये तलवार और लाहौर सरकार के पास कैदखाने किसलिए हैं? घबराओ नहीं, इन तिलों में इतना तेल नहीं है। न खंडर गिरेंगे, न शमशीर उठेगी। ये बाजू हमारे आजमाये हुए हैं। फिर भी इस पर निगाह रखो।... तुम सोचते होगे कि मैंने उसको झूठ बोला था। शासन करने के लिए सियासत का इस्तेमाल करना पड़ता है। सियासत का अर्थ ही यह होता है - स्याह और सत अर्थात झूठ का अर्क ! उसके साथ वायदा रणजीत सिंह ने नहीं एक हुक्मरान ने किया था।“
रणजीत सिंह हालांकि दरबार की कार्रवाइयाँ कर रहा है, किंतु उसका सारा ध्यान गुलबानो में ही है। उसके दिमाग में गुलबानो का चेहरा चक्रवात की तरह घूम रहा है। दरबार की कार्रवाइयाँ जब लगभग समाप्त होने के करीब आती हैं तो वह समय से पहले ही दरबार खारिज कर देता है और दस्तूरन होने वाले नाच-गाने का आनन्द उठाने की बजाय तबीयत ठीक न होने का बहाना बनाकर अपनी आरामगाह की ओर चला जाता है। शयनकक्ष में जाते ही वह गुलबानो को तलब करता है और गुलबानो के उपस्थित होते ही कमरे के दरवाज़े पूरे दिन के लिए बन्द हो जाते हैं।
इसके उपरांत तो यह एक किस्म का दस्तूर-सा ही बन जाता है। महाराजा दरबार की कार्रवाई खानापूर्ति की तरह जल्दी जल्दी निपटाता और दिन में ही गुलबानो को लेकर कमरे में घुस जाता। यदि महाराजा को दो-चार दिन के लिए शाही महल से बाहर जाने की आवश्यकता पड़ती तो वह गुलबानो को भी अपने संग ही ले जाता।
गुलबानो को लाहौर और अमृतसर के रंडी बाज़ार में बाइयों के पास उसकी नृत्यकला को तराशने के लिए भेजा जाता है। लाहौर दरबार में गुलबानो के मुज़रे रंग बांधने लग जाते हैं।
महाराजा को फिरंगियों की दावत का निमंत्रण मिलता है और जिसमें शिरकत करने का अर्थ होता है कि महाराजा को पूरे दो सप्ताह लाहौर से दूर जाना पड़ेगा। महाराजा रानी देवनो, रानी हरदेवी, रानी रतन कौर आदि रानियों के साथ गुलबानो को भी ले जाता है। ऐसा पहली बार होता है कि
महाराजा फिरंगियों की दावत में शराब का सेवन नहीं करता। क्योंकि वह शराब पीकर ढेरी होने की अपेक्षा गुलबानो के बदन की महक का आनन्द लेना चाहता है। सूफी रहने का एक लाभ महाराजा को यह होता है कि महाराजा को फिरंगी फौज का जायज़ा लेने का अवसर मिल जाता है। महाराजा जब फिरंगी सेना को कवायद करते देखता है तो उसको हैरानी होती है कि वह जंगी अभ्यास करने के बजाय यह क्या कर रहे हैं। महाराजा जब इसकी पड़ताल करता है तो उसको बताया जाता है कि फौज को तंदुरुस्त और चुस्त रखने के लिए यह भी ज़रूरी है।
‘मेरी फौज यूँ ही नित्य जंगी अभ्यास करके तेगें खाली करती रहती है।’ महाराजा मन ही मन सोचता है। फिरंगियों की इस चीज़ से वह बहुतप्रभावित होता है और फिरंगी फौज की वर्दी भी उसको काफ़ी प्रभावित करती है। वह अपने सेवकों के माध्यम से कंपनी के तीन-चार मुलाजि़मों को लालच देकर अपनी फौज में नौकरी करने के लिए तैयार कर लेता है। ये मुलाजि़म महाराजा की फौज में भर्ती होकर फौज को कवायद सिखाने और करवाने के लिए रखे जाते हैं। महाराजा धौकल सिंह और जसवंत सिंह को फिरंगियों की फौज में भर्ती करवा देता है ताकि वे कवायद सीखने के उपरांत कंपनी की नौकरी छोड़कर उसकी फौज-ए-खास में पुनः भर्ती हो जाएँ।
जब गुलबानो को इस बारे में पता चलता है तो वह इस संदर्भ में महाराजा को दुबारा विचार करने के लिए सुझाव देती है और कहती है कि कहीं यह महाराजा द्वारा बिना सोचे-समझे उठाया गया गलत कदम न हो। वह इसके पीछे फिरंगी सरकार द्वारा खालसा फौज में सेंध लगाने की ओर भी संकेत करती है। लेकिन महाराजा गुलबानो की बात की ओर कोई ध्यान नहीं देता। परंतु, इस बात से महाराजा को अपने प्रति गुलबानो की वफ़ादारी साबित हो जाती है और वह गुलबानो को पहले से अधिक चाहने लग पड़ता है।
गुलबानो अपनी सूझ-बूझ, योग्यता, शिष्टता और सृहृयता से महाराजा के मन में दिनोंदिन गहरे उतरती चली जाती है। महाराजा के दिलोदिमाग में गुलबानो के रूप की छाप गहरी करने में सिक्ख अहलकार भी विशेष भूमिका निभाते हैं। वे शौंधे, छिब्बर, सावणयार और बुध सिंह जैसे कवियों और शायरों को पैसे देकर गुलबानो की तारीफ़ों में कविताएँ लिखवाकर महाराजा को सुनाते रहते हैं।
मोरां को लेकर ज़हर उगलने वाले जब गुलबानो का कोई विरोध नहीं करते तो महाराजा को भी संतोष-सा रहता है।
एक दोपहर गुलबानो के साथ प्यार करने के उपरांत महाराजा का मन सैर करने को होता है। वह गुलबानो के पास से उठता है, “मैं ज़रा बाहर जा रहा हूँ। घुड़सवारी करने को मन कर रहा है।“
“मैं भी चलूँ आपके साथ ? बहुत समय हो गया है, मैंने भी घुड ़सवारी करके नहीं देखी।“
“तुझे घुड़सवारी आती है ?“
“हाँ, घुड़सवारी, तीरअंदाजी, तलवारबाजी, नेज़ेबाजी, तैराकी तो हमारे कबीले में हर लड़के-लड़की को बचपन से सिखलाई जाती है।
बंदूक लाओ, मैं आपको अपना निशाना भी दिखा सकती हूँ।“
गुलबानो के मुँह से ऐसा सुनकर महाराजा रणजीत सिंह को आश्चर्य होता है। क्योंकि अब तक महाराजा उसको केवल अपने बिस्तर पर खेलने के लिए बना महज एक काम-खिलौना ही समझता आ रहा है। गले में वरमाला बनकर पड़ने वाले हाथ शस्त्र भी चला सकते हैं ? महाराजा को गुलबानो द्व ारा कही बात की सच्चाई पर कोई शक नहीं होता, पर दूसरी तरफ उसको यकीन भी नहीं आता। सच की तसदीक करने के लिए वह गुलबानो को संग ले जाता है।
लाहौर से बाहर जाकर महाराजा बराबर दूसरे घोड़े पर बैठी गुलबानो को तीखी आँखों से देखता है, “गुल, क्यों न हमारे बीच एक घुड ़दौड़ का मुकाबला हो जाए ?“
“रहने दो बादशाह सलामत, आप हार जाएँगे। हार जाने के बाद आपके दिल मेें मेरे प्रति भावनाओं में बदलाव आ सकता है। मैं आपसे जीतना नहीं चाहती और अपनी हार मुझे मंजूर नहीं। लोग क्या कहेंगे कि एक पठानी दासी ने सिक्ख बादशाह को मात दे दी।“ इतना कहकर गुलबानो हँसने लगती है। उसकी गालों में पड़ते गड्ढे़ रणजीत सिंह का दिल निकाल लेते हैं। महाराजा को गुलबानो का चेहरा सिर पर खड़े सूरज की भाँति चमकता प्रतीत होता है। वह कितनी ही देर एकटक सूरजमुखी गुलबानो को निहारता रहता है। धूप के प्रताप से गोरे रंग से गुलाबी हुए उसके कपोल उसको और भी अधिक खूबसूरत बना रहे हैं।
“मेरा तो नाम ही रण में जीतने वाला है। रणजीत सिंह ने सिर्फ़ जीतना सीखा है, हारना नहीं। मैं बांहें पसार लूँ तो सफलताएँ मेरे कदम चूमने लग जाती हैं। मैं शमशीर उठा लूँ तो विजय मुझे खुद आकर बगलगीर होती है। इसकी तू चिंता न कर। यह तो महज एक खेल है। कोई जंग नहीं। पराजित हुआ तो फिर क्या ?“
“अगर मैं आपसे जीत जाऊँ तो इनाम क्या दोगे ?“
“यदि तू जीत गई तो मैं तुझे पूरी रात प्यार करुँगा। अगर तू हार गई तो सारी रात तू मुझे प्यार करेगी।“
“वाह महाराज, इसका मतलब चिŸा भी आपकी और पट भी आपकी। आपका भी जवाब नहीं। ठीक है फिर, मुझे घोड़े की लगामें खोल लेने दो।“ घोड़ी पर से उतरकर गुलबानो उसकी लगामें उतार देती है, “आओ फिर बादशाह सलामत, मैं तैयार हूँ।“
“लगामों के बग़ैर घोड़ी कैसे दौड़ाएगी ?“
“घोडि़यों को लगामें नहीं, घुड़सवार दौड़ाया करते हैं बादशाह सलामत।“
दौड़ प्रारंभ होते ही गुलबानो की घोड़ी महाराजा के घोड़े को पछाड़ देती है। दो-चार कोस दौड़ने के बाद तो यह फासला और भी ज्यादा हो जाता है और महाराजा अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है। महाराजा को अपने हारने के दुःख से अधिक चिंता इस बात की होती है कि गुलबानो एक बढि़या घुड़सवार है, बिना लगाम घोड़ा दौड़ा सकती है। महाराजा के मन में यह भी शंका पैदा हो उठती है कि वह अधिक समय उसके पास टिक
नहीं पाएगी। महाराजा अपनी और गुलबानो की आयु के बीच इकŸाीस साल के अंतर को भी आँख से ओझल नहीं कर सकता है, इसलिए महाराजा तुरंत ही अपने मन में गुलबानो से विवाह करवाने का विचार बना लेता है।
शाही महल में आते ही वह राज ज्योतिषी से मुहूरत निकलवाता है और योग्य लग्न कुछ महीने के बाद 27 सितम्बर 1832 का निकलता है। ठीक उसी तिथि को पूरी शानोशौकत से महाराजा का गुलबानो के साथ निकाह हो जाता है और वह गुलबानो से गुल बहार बेगम बन जाती है।
मोरां सरकार के मन में गुल बहार के हुस्न को लेकर ईष्र्या तो पहले ही थी, पर अब जब महाराजा ने उसको मोरां के बराबर का दजऱ्ा दे दिया है तो मोरां के दिल में यह नफ़रत और ईष्र्या और अधिक बढ़ गई है।
एक शाम मोरां महाराजा को अपने साथ रात गुज़ारने के लिए उकसाती है तो महाराजा मोरां का प्रस्ताव ठुकराकर गुल बहार बेगम के साथ रात रंगीन करने की मंशा बता देता है। मोरां के मन में गुलबहार के प्रति क्रोध शिखर छूने लगता है। वह अपनी दासी के हाथ दूध का गिलास गुल बहार को भेजती है, “यह लो बेगम साहिबा, मैं आपके लिए मेवों वाला दूध लेकर आई हूँ। मोरां सरकार ने भेजा है और कहा है कि इसको पीने से आप में ताकत आ जाएगी। आजकल महाराजा साहिब सुना है, आपकी काफ़ी वजिऱ्श करवा रहे हैं।“
“शुक्रिया।“ गुलबहार दूध का गिलास जैसे ही पकड़ती है, तभी किसी के उधर आने की आहट होती है। दासी अपने कमरे में चली जाती है।
लड़खड़ाता हुआ महाराजा कमरे में आ जाता है।
“मोरां की दासी क्या करने आई थी ?“
“यह दूध का गिलास मोरां सरकार ने भेजा है।“
“दूध को मार गोली... आज शराब पीते हैं। यह सोना, चाँदी और
कीमती मोती डालकर मैंने खास तौर पर तेरे लिए ही बनवाई है।“
“जो हुक्म मेरे आका ! बादशाह सलामत को मैं नाराज़ नहीं
करुँगी।“ गुलबहार दूध का गिलास दूर टांड पर रख देती है।
महाराजा जाम बनाकर देता है, “मैं तो केवल महाराजा हूँ, तू मुझे
बादशाह क्यों कहती रहती है ?“
गुलबहार बेगम शराब का घूंट भरती है, “मैं एक खानाबदोश औरत
थी। चारागाह में रहने वाली। हमारे कबीले में एक दस्तूर है। कुछ सालों बाद एक विशेष त्योहार मनाया जाता है। जिसमें सभी औरतें और मर्द अँधेरी गुफा में निर्वस्त्र घुसते हैं और चिराग बुझा देते हैं। कोई भी मर्द हाथ में आई किसी भी औरत को भोग सकता है। तमाम रात यह जश्न चलता है। मेरे जन्म से वर्षों पहले यह त्योहार मनाया गया था। मेरे माँ-बाप का किसी को नहीं पता। मेरी सौतेली माँएँ मुझे गुलचिराग की पैदाइश कहकर ताने देती रहती थीं।“
गुलबहार बेगम शराब के कुछ घूंट भरती है और अपनी बात जारी रखती है, “आपने मुझे गुलचिराग उर्फ़ गुलबानो से गुलबहार बेगम बना दिया है तो क्या मैं महाराजा की जगह आपको बादशाह नहीं पुकार सकती ? मेरे लिए तो दोनों ही शब्दों के एक ही अर्थ हैं।“
गुलबहार बेगम अपने अंदर और शराब फेंकती है, “आपके बारे में सही सुना है कि एकबार कोई सीधी सी औरत आपके साथ लोहे का तवा यह सोचकर घिसने लग पडी़ कि आपको पारस कहा जाता है, तो उसका तवा भी सोने का हो जाएगा। फिर आपने उसको उस तवे के वजन बराबर सोना दान कर दिया था...। बादशाह सलामत आपने मुझे साधारण लकड़ी से चंदन बना दिया है। मैं तो आपको बादशाह ही कहा करुँगी।“
“चलो, जैसे तेरी मजऱ्ी। वैसे बेगम साहिबा, हम भी कोई पुश्तैनी रजवाड़े नहीं। यह राजभाग का मालिक मैं अपने बलबूते पर बना हूँ। मेरे पुरखे मामूली मज़दूर और पशुपालक थे। ये गुजरांवाले के इलाके में गूजरों के कबीलों पर हमारे सांसियों के कबीले ने कब्ज़ा किया। खान के बसाये खानपुर को खानपुर सांसिया कहा जाने लगा और हमारे सांसियों ने ग्यारह गांव बसाये। जिनमें से एक गांव की नींव शुक्रवार वाले दिन परमात्मा का शुक्र करके रखी गई और उस गांव का नाम शुक्रचक्क रख दिया गया। जहाँ के निवासी होने के कारण हमारी मिसल शुक्रचक्किया चली।“ इतना कहते हुए महाराजा शराब वाला पैमाना खाली करके नीचे रख देता है।
गुलबहार बेगम भी अपना जाम खाली करके प्याला एकतरफ रख देती है। महाराजा गुलबहार बेगम की बिखरी हुई लट संवारने लग जाता है। गुलबहार एकदम महाराजा से लिपट जाती है। हवस का सैलाब उन्हें अपने साथ बहाकर ले जाता है। महाराजा गुल बहार की कमर में बंधी उसकी अंगिया की तनी पकड़कर एक झटके से खोलता है और गुलबहार को अपने ऊपर लिटा लेता है। दोनों एक-दूजे में समा जाते हैं।
अगली सुबह गुलबहार बेगम के सोते हुए ही जैनब खातून रात वाला दूध का गिलास वैसे का वैसा भरा हुआ वापस ले जाती है और वह दूध बिल्ली को पिला देती है। वापस हरम की ओर आते हुए रणवास मुबारक 1⁄4महल की स्त्रियों वाला विभाग1⁄2 में जैनब खातून का सामना मोरां सरकार से होता है और वह ज्यों ही मोरां सरकार को आदाब अजऱ् करती है, मोरां सरकार झट से प्रश्न दाग देती है, “तेरी बेगम साहिबा का क्या हाल है ? देख लेना था, उठ खड़ी है या नहीं ? कहीं रात...।“
जैनब खातून कोई उŸार नहीं देती। लेकिन उसको गुलबहार की चिंता अवश्य होती है। वह दौड़कर गुलबहार के पास जाती है और उसको सही-सलामत देखकर इत्मीनान से उसके पास बैठ जाती है। साधारण बातें करते हुए गुलबहार मोरां द्वारा भेजे गए दूध के बारे में जैनब खातून को बताती है। जैनब खातून फौरन बिल्ली की खोज में भोग खड़ी होती है और बिल्ली उसको बावर्ची खाने के पास मरी पड़ी मिलती है। जैनब खातून सारा माज़रा समझ जाती है, पर बिना कोई बात किसी से किए सर्तक हो जाती है।
उस दिन के पश्चात जैनब खातून गुलबहार की खाने-पीने की वस्तुओं को पहले खुद चखना शुरू कर देती है। इस बात को लेकर मोरां सरकार जैनब खातून पर काफ़ी खफ़ा हो जाती है।
कुछ महीनों के अंतराल के बाद मोरां सरकार स्वयं अफ़ीम लेकर गुलबहार बेगम के पास आती है, “बेगम, यह यारकंद की अफ़ीम मैंने अपने लिए मंगवाई थी। पूरी शुद्ध है। सोचा, थोड़ी-सा आपको भी इसका स्वाद चखा दूँ।“ मोरां सरकार अफ़ीमदानी में से थोड़ी अफ़ीम तोड़कर जैनब खातून की ओर बढ़ाती है, “मौसी खातून, लो, पहले आप इसका जायका चखकर देखो। बहिश्त में घूमते फिरोगे।“
जैनब खातून अफ़ीम की गोली बनाकर मुँह के अंदर फेंक लेती है और कुछ देर चूसने के बाद चखकर अंदर निगल लेती है। जैनब खातून को अफ़ीम का स्वाद कुछ अलग-सा ही महसूस होता है। वह मोरां सरकार से अफ़ीम की डिब्बी पकड़कर रख लेती है और कह देती है कि रोज़ वह थोड़ी थोड़ी करके गुलबहार बेगम को देती रहेगी। लेकिन मोरां सरकार के जाने के बाद जैनब खातून अफ़ीम को कुरेदकर निरखती है। उसको उसमें सफ़ेद कशगरी और रस कपूर 1⁄4ॅीपजम स्मंक ंदक ब्वततवेपअम ैनइसपउंजम1⁄2 की बू आती महसूस होती है। जैनब खातून सब कुछ गुलबहार बेगम को समझा देती है कि वह अफ़ीम नहीं बल्कि धीमीगति से असर करने वाला ज़हर है। अगली सुबह जैनब खातून की तबीयत खराब होने लगती है। वह दूध वाले ज़हर के बारे में बताकर और अफ़ीम महाराजा को दिखाकर सिद्ध कर देती है कि मोरां सरकार से गुलबहार को ख़तरा है।
महाराजा मोरां सरकार के ऐसे षड्यंत्र के बारे में अनेक बार सुन चुका है। रानी राज बंस 1⁄4महताब देवी की बहन1⁄2 की अफ़ीम खाकर आत्महत्या करने वाली घटना भी महाराजा की आँखों के सामने घूमने लग जाती है। उसके मन में राज बंसो की मौत के पीछे मोरां का हाथ होने का संदेह पैदा हो जाता है। पत्थर पर पानी की बूँद निरंतर गिरती रहे तो वह भी गलने लग जाता है। महाराजा तो फिर भी एक सुलझा हुआ पुरुष होता है। जैनब खातून की बात उसकी समझ में आ जाती है। यूँ भी उसका मोरां सरकार से दिल भर चुका होता है, और फिर अब तो मोरां सरकार से अधिक सुशील, सुन्दर गुलबहार बेगम भी उसके पास होती है।
दो बार हल्दी और हरम मसाले वाला काढ़ा पीकर हमल गिराने के बाद मोरां फिर तीसरी बार गर्भवती होती है। महाराजा फिरंगियों से मिलने के बहाने मोरां सरकार का धोखे से पठानकोट के किले में ले जाता है और वहाँ मोरां के सप्ताहभर मुज़रे चलते हैं। जिनमें कुछ और अमीर, वज़ीर, रजवाड़ों के अलावा कुछ फिरंगी अफ़सर भी शिरकत करते हैं। इनमें एक अंग्रेज सैलानी बैरन हूगल 1⁄4ब्ंतस ।समगंदकमत ।देमसउ ठंतवद अवद भ्नहमसए 1795.18701⁄2 भी होता है जो महाराजा के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बगै़र नहीं रह पाता। सप्ताहभर बाद महाराजा मोरां को हमेशा के लिए पठानकोट के लिए में रहने का आदेश देकर, उसके नाम गुज़ारे के लिए जागीर लगाकर स्वयं लाहौर लौट आता है। मोरां सरकार के पास महाराजा का हुक्म मानने और पिंजरे में पड़े परिंदे की तरह फड़फड़ाने के सिवाय और कोई चारा नहीं रहता है।
अब मोरां सरकार वाले सारे ओहदे और पदवियाँ गुलबहार बेगम को मिल जाती हैं। महाराजा लाहौर में ही राम बाग के पास गुलबहार बेगम के नाम पर एक आलीशान बाग बनवाता है। गुलबहार बेगम के बादाम खाने के शौक को देखते हुए महाराजा एक अन्य बाग गुलबहार बेगम के नाम पर
बनवाता है, जिसमें बादाम उगाये जाते हैं। 1⁄4कुछ समय बाद इस बाग का नाम ‘बादामी बाग’ पड़ जाता है1⁄2। गुलबहार बेगम के लिए महाराजा लाहौर में ही एक मंिस्जद का निर्माण भी करवाता है और कुछ अन्य वस्तुओं का नामकरण गुलबहार के नाम पर कर देता है। गुलबहार मुंशी राम दयाल की सज़ा माफ़ करवाकर उसको जेल से रिहा करवाती है।खरादियों के मुहल्ले के मियां मुहम्मद बख़्श 1⁄41815-19401⁄2 जैसे दरबारी चित्रकार महाराजा और गुलबहार के अनेक चित्र बनाते हैं। महाराजा मोरां सरकार की जगह अब गुलबहार बेगम के जिस्म की गुफ़ा में अक्सर गुम रहने लगता है।
महाराजा का विदेशी होम्योपैथी डाॅक्टर ज.म. होनीबर्गर महाराजा को बाकायदा मर्दाना ताकत बढ़ाने की दवाइयाँ और खनिज पदार्थ देता रहता है। सिक्ख राज और महाराजा रणजीत सिंह की बादशाहत का सतरंगा सूरज पूरे शबाब और शिखर पर होता है।
जैसे पहले लाहौर 1⁄417991⁄2, फिर अमृतसर 1⁄418021⁄2, कसूर 1⁄418071⁄2, कांगड़ा 1⁄418091⁄2, मुल्तान1⁄4 18101⁄2, पट्टी 1⁄418111⁄2, सतलुज, पंजाब, अटक1⁄418131⁄2, कश्मीर 1⁄418191⁄2, जम्मू, मुंघेर 1⁄418211⁄2, हज़ारा 1⁄418231⁄2, नुशहिरा 1⁄418231⁄2, पशोर 1⁄418341⁄2, लद्दाख 1⁄418341⁄2, पिशावर 1⁄418341⁄2, चनयोट, डेरा गाज़ी खान, मनखैरा, डेरा इस्माइल खान, जमरौद 1⁄418371⁄2 आदि एक एक करके महाराजा की रियासत के इलाके बढ़ते गए हैं। वैसे ही महाराजा की हरम में महताब कौर 1⁄41796 में ब्याही गुरबख्श सिंह कन्हैया की पुत्री1⁄2, राज कौर उर्फ़ दातार कौर 1⁄41803 में ब्याही राम सिंह नकई की पुत्री1⁄2, रानी हर देवी 1⁄41804 मं ब्याही सलेरिया राजपूत चैधरी राम की पुत्री1⁄2, रानी राज देवी1⁄41806 में ब्याही पदमा राजपूत की पुत्री1⁄2, रानी रजनो कौर1⁄41808 में ब्याही शाद भारी की पुत्री1⁄2, रतन कौर और रानी दया कौर 1⁄41811 में साहिब सिंह भंगी की दोनों विधवा पत्नियों पर चादरें डालीं1⁄2, रानी रूप कौर 1⁄41815 में ब्याही कोटव सैयद मुहम्मद के जै सिंह की पुत्री1⁄2, रानी चाँद कौर 1⁄41815 में चिन्नापुर, अमृतसर के जै सिंह की पुत्री1⁄2, रानी गुलाब कौर 1⁄41816 में ब्याही जगदेव, अमृतसर के जागीदार की पुत्री1⁄2, लक्ष्मी कौर 1⁄41820 में ब्याही जोगकी खान के देसा सिंह वड़पग्गा की पुत्री1⁄2, रानी महताब कौर 1⁄41822 में ब्याही चैधरी सज्जण सिंह की पुत्री1⁄2, रानी राज बंसो और महताब देवी 1⁄4दोनों सगी बहनें और कांगड़े के राजा संसार चंद कटोच-2 की पुत्रियों से हिंदू रीतिनुसार फेरे लिए1⁄2, रानी राम देवी 1⁄41830 बिना विवाह से रखी कौर सिंह छिछड़ीवाले की सुपुत्री1⁄2, समण कौर 1⁄41832 में ब्याही सूबा सिंह की पुत्री1⁄2, मोरां सरकार, हिलाइसी, गुलबहार आदि एक-एक करके रानियों और दासियों की संख्या भी बढ़ती गई है। किन्तु, फिर भी न तो गुलबहार बेगम के मन में महाराजा के प्रति स्नेह घटता है और न ही महाराजा गुलबहार बेगम के लिए अपने कर्तव्यों से मुँह चुराता है।
एक रात महाराजा रानी लक्ष्मी देवी, रानी तब्बसुम और दासी नूरां के साथ सोता है। पर करीब आधी रात को रात में उठकर दिल की प्यास मिटाने के लिए गुलबहार बेगम के शिवर में आकर उसके साथ लेट जाता है। वह सोई हुई गुल बेगम के बालों पर प्यार से हाथ फेरने लग पड़ता है। गुलबहार बेगम जाग जाती है और कहती है, “क्या बात हुज़ूर, मेरे बिना दिल नहीं लगा ?“
“नहीं, मेरी जान, तेरे वाला रस मेरी किसी भी दासी या रानी में नहीं 76 मोरां का महाराजा
है। तेरा स्वाद ही अलग है। तू निरी सहारनपुर के आमों जैसी है।“ टेढ़ा होकर पड़ा रणजीत सिंह अपनी टांग गुलबहार बेगम की टांगों पर रख
लेता है।
गुलबहार बेगम नखरा दिखाती है, “हटो झूठे ! आप मुल्तानी गेहूं
जैसे हो। जिसकी फसल देखने में कम होती है, पर दाना लम्बा और वज़नी होता है। यदि मैं इतनी ही जायकेदार हूँ तो मेरी सौतनों के पास गए ही क्यों
थे ?“
“वह तो मैं उनका उलाहना-सा उतारने गया था।“ रणजीत सिंह
गुलबहार बेगम को प्यार करने लग जाता है।
गुलबहार बेगम महाराजा की बांह का सिरहाना बनाकर पड़ी होती है
और दोनों दुख-सुख कुरेद रहे होते हैं। यकायक महाराजा सवाल करता है, “बेगम, अच्छा बता, तेरे विचार से मेरे सातों पुत्रों में से मेरे तख़्त का योग्य वारिस कौन है ?“
“सच पूछो तो कोई भी नहीं। क्योंकि हरेक में कोई न कोई ऐसी कमी है जो उन्हें राज करने के योग्य नहीं बनाती। हाँ, यदि फिर भी उनमें से किसी एक को चुनना हो तो मुझे आपके पोते नौनिहाल सिंह में महाराजा बनने के कुछ गुण दिखाई देते हैं।“
महाराजा सुस्ती त्याग कर एकदम चेतन हो जाता है और बिस्तर पर से उठकर बैठ जाता है, “तुमने ठीक फरमाया है बेगम साहिबा। इस बात की मुझे चिंता दिन रात तोड़ तोड़कर खाए जाती है। इसमें मेरा ही कसूर है। मुझे बहुत पछतावा है, मैं अपनी संतान की परवरिश की तरफ सही ध्यान नहीं दे सका।“
“जिल्ले इलाही, अब पछताने का कोई फायदा नहीं। बहुत देर हो चुकी है। बंदा बचपन में गलती करता है, जवानी में पछताता है और बुढ़ापे में पश्चाताप करता है।... अब आप केवल पश्चाताप ही कर सकते हो।“
गुलबहार बेगम के मुँह से यह बात सुनकर महाराजा गंभीर सोच में डूब जाता है और अगले कई दिन तक इस मुद्दे को लेकर परेशान और विचारग्रस्त रहता है।
कंवर नौनिहाल की शादी का जश्न समाप्त होने के बाद बारादरी में रणजीत सिंह की छाती से टेक लगाकर बैठी गुलबहार बेगम महाराजा रणजीत सिंह को खामोश और उदास देखकर पूछती है, “आज आप बड़े शांत हो, कोई रियासत का मसला पैदा हो गया है ?“
“बेगम, जिस दिन से हरी सिंह नलुवे की शहादत के बारे में सुना है, तब से मेरा मन नहीं लगता। नलुवा मेरा बहुत प्यारा और होनहार जनरल था। हीरा था हीरा। निडर और बहादुर इतना कि पूछो ही मत। दर्रा-ए-खैबर पर खड़ा हो जाता था तो हवा भी इधर आने का साहस नहीं करती थी। मुझे अच्छी तरह याद है, 1805 की बसंत पंचमी में पहली बार मैंने उसको देखा था। मेरे दरबार में शस्त्र विद्या के जौहर दिखाकर उसने मुझे मुग्ध कर लिया था। मैंने अपने सिंहासन से उठकर उसके गले में सोने का कंठा पहनाया था और हमेशा के लिए उसको अपनी खिदमत में रख लिया था। उसके दोनों पुत्र जवाहर सिंह और अर्जन सिंह भी मेरी फौज में सेवा निभा रहे हैं। राजा ध्यान सिंह ने जब मुझे उसकी मौत की ख़बर वाली चिट्ठी पढ़कर सुनाई, मेरे हाथ में लुटिया थी, मैंने क्रोध में फेंककर ध्यान सिंह के टखनों में दे मारी। काश ! नौनिहान की शादी के कारण फौजें लाहौर न आई हांेती। काश ! मुझे पहले पता चल जाता, मैं नलुवे को समय रहते और फौज भेज देता तो यह अनहोनी घटित न होती। मुझे बहुत दुःख और नुकसान हुआ है उसकी मौत का।“
“अब अफ़सोस करने से क्या होगा, बादशाह सलामत ? अल्लाह की मजऱ्ी के आगे इन्सान कर ही क्या सकता है ? जरनैल तो मैदानेजंग में मरने के लिए ही जन्मा करते हैं। पर आपने तो उसकी जागीरें भी जब्त कर ली थीं, नहीं ?“
“वह बात ही कुछ ऐसी हुई थी। मेरे वली अहद के बारे में प्रश्न उठा था। मैंने कहा, निःसंदेह खड़क सिंह मेरा उŸाराधिकारी होगा। सबने इसका समर्थन भी किया, लेकिन नलुवा कहने लगा कि खालसा राज कायम करने के लिए खालसा फौज ने अपनी जानें न्योछावर की हैं, लहू बहाया है, कुर्बानियाँ दी हैं और अनेक सिंह केसरी निशान साहिब झूलता देखने के लिए बिना वेतन के लड़ते रहे हैं। इसलिए मेरे बाद इस राज की बागडौर पाँच प्यारों की संस्था को सौंप दी जाए। नहीं तो राज प्रबंध सही ढंग से नहीं चल सकेगा। एक पुरुषीय राज के हक में नहीं था वह। मुझे इसलिए गुस्सा आ गया था और राजा ध्यान सिंह के उकसाने पर मैं वह गलती कर बैठा था।“
“जान बख़्शना बादशाह सलामत ! आप कोई बच्चे या अनजान नहीं थे जिसको ध्यान सिंह ने बरगला लिया। एक हुक्मरान के मुँह से ऐसे शब्द अच्छे नहीं लगते। वैसे नलुवे की बात तो सोलह आने सही थी।“
महाराजा रणजीत सिंह भड़क उठता है, “लो, मैं यह विशाल राजपाठ अपने पुत्र-पोतियों की बजाय किसी अन्य को कैसे दे दूँ ? मेरी संतान उम्रभर मुझे गालियाँ देगी।“
“पर जहाँपनाह, बुरा न मनाना, गलती आपकी है। आप अँधे घोड़े पर सवार की तरह जिधर मुँह किया, उधर चलते रहे हो। आप हरम में स्त्रियों की संख्या बढ़ाने की भाँति अपनी रियासत के इलाके बढ़ाने पर ही ज़ोर देते रहे। आप इसे कार्यकुशलता से चलाने के नियम नहीं बना सके। न ही आप अपने पुत्रों को राज करने की तालीम दे सके हो। राज कौर की कोख से जन्मा खड़क सिंह आपसे ज्यादा शराब पीता और अफ़ीम खाता है। उसे तो बहुत बार अपनी भी होश नहीं रहती। और फिर, बेशक खड़क सिंह के बड़ा होने के कारण राजगद्दी पर उसका हक बनता है, पर शहजादा शेर सिंह 1⁄4असल मे शेर सिंह निहाल सिंह जुलाहे की संतान थी। शहजादा तारा सिंह और ईश्वर सिंह की तरह उसको भी गोद लिया गया था, क्योंकि महताब कौर रणजीत सिंह का बच्चा पैदा नहीं करना चाहती थी1⁄2 के मन मंे आता है कि उसकी माँ के साथ आपने पहले विवाह करवाया था। इसलिए उसका हक पहला है। दोनों, अलग अलग रानियों से पैदा होने के कारण उनमें इसी बात को लेकर अदृश्य द्वंदयुद्ध भी चलता है। खुदा न खास्ता, आपके बाद इस बात को लेकर कोई ...।“ बोलती बोलती गुलबहार बेगम अचानक चुप हो जाती है।
महाराजा काफ़ी देर कुछ सोचने के बाद जाम-दर-जाम तब तक 78 मोरां का महाराजा
शराब पीता रहता है, जब तक वह बेहोश नहीं हो जाता।
सन् 1837 आ जाता है। लार्ड ओकलैंड जाॅर्ज ईडन और उसकी बहन ऐमली ईडन 1⁄41797-18691⁄2 दोनों लाहौर दरबार में महाराजा से मिलने आते हैं। इस अवसर पर ऐमली ईडन महाराजा से गुलबहार बेगम के हुस्न की तारीफ़ करती है जिसे सुनकर महाराजा का सीना कई गज़ फूल जाता है। ऐमली ईडन महाराजा और गुलबहार बेगम की एक तस्वीर भी बनाती है।
मई 1839 को अचानक महाराजा को शराब का बहुत अधिक सेवन करने के कारण अधरंग का दौरा पड़ जाता है। महाराजा बिस्तर से लग जाता है। फिरंगी सरकार की ओर से महाराजा के इलाज के लिए एक डाॅक्टर भेजा जाता है। करीम अल्ला जैसे वैद हकीम महाराजा का इलाज करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। महाराजा की बीमारी में कुछ सुधार होने लगता है तो डोगरे डा. जोसिया हार्नल 1⁄41799-1871 अमेरिकी1⁄2 को महाराजा का इलाज करने के लिए नियुक्त कर देते हैं। महाराजा की हालत बिगड़नी आरंभ हो जाती है।
एक दिन फ़कीर अज़ीज-उद-दीन आकर डा. हार्नल की ओर से महाराजा को दी जाने वाली दवाइयों का निरीक्षण करता है तो चकित रह जाता है। डा. हार्नल महाराजा को गलत दवाइयाँ दे रहा होता है। ऐन उसी पल फ़कीर अज़ीज-उद-दीन के जेहन में करीब दो वर्ष पहले का वह वाकया घूम जाता है जब काबुल के बादशाह दोस्त मुहम्मद 1⁄4क्मबमउइमत 23ए 1793 दृ श्रनदम 9ए 18631⁄2 से महाराजा ने संधि करने के लिए उसके साथ डा. हार्नल को भेजा था और दोस्त मुहम्मद अहदनामा भूलकर उन दोनों को कै़द कर लेता है। उस वक्त फ़कीर अज़ीज-उद-दीन तो अपनी चालाकी से दोस्त मुहम्मद की कै़द से आज़ाद हो गया था, लेकिन फ़कीर अज़ीज-उद-दीन की हैरानी की तब कोई सीमा न रही जब उसके पहुँचने से पहले ही डाॅक्टर हार्नल लाहौर पहुँचा हुआ था। डाॅ. हार्नल के गद्दार होने के बारे में अज़ीज-उद-दीन को शक तो उसी वक्त हो गया था। परंतु उसके पास कोई सुबूत नहीं था।
फ़कीर अज़ीज-उद-दीन महाराजा को सारा मामला समझाता है। महाराजा डाॅ. हार्नल की गिरफ्तारी के हुक्म जारी कर देता है। डाॅ. हार्नल डोगरों की ओर से ही महाराजा के पास भर्ती करवाया गया था। इसलिए डोगरा ध्यान सिंह उसको गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी लेता है। डाॅ. हार्नल रातोंरात अपना घर छोड़कर कहीं चला जाता है और राजा ध्यान सिंह, डाॅ. हार्नल के गायब हो जाने के बारे में बताकर महाराजा के सम्मुख उसको बंदी न बना सकने की अपनी असमर्थता प्रकट कर देता है।
लाख इलाज करने के बावजूद महाराजा की हालत में कोई सुधार नहीं आता। उसकी तबीयत दिनोंदिन बिगड़ती चली जाती है। गुलबहार बेगम दूसरी रानियों की तरह महाराजा की सेवा में कोई कसर शेष नहीं छोड़ती।
समय की विडम्बना देखो, लाहौर से जेहलम तक 102 मील का रास्ता एक दिन में घोड़े पर बैठकर तय करने वाला रणजीत सिंह आज एक पल के लिए बिस्तर से उठकर बैठ नहीं सकता। महाराजा अपना अन्तिम समय निकट जानकर हजूरी बाग में आखि़री बार दरबार लगाता है। अटक जैसे दरियाओं को रोकने वाला आज खुद अटका पड़ा है। महाराजा को पालकी में लिटाकर हजूरी बाग ले जाया जाता है। पालकी जब बाग के चबूतरे पर रखी जाती है तो सिक्ख सरदारों को पालकी में पड़ा महाराजा रणजीत सिंह ऐसा लगता है मानो कोई शेर पिंजरे में बन्द हो। इस दृश्य को देखकर सिक्ख सरदारों की आँखें नम हो जाती हैं।
सरदारों, अहलकारों, वज़ीरों और योद्धाओं की उपस्थिति में महाराजा टिक्का खड़क सिंह को अपना गद्दी का उतराधिकारी नियुक्त करता है। 10 साल की उम्र में राम नगर शिकार खेलते हुए चट्ठे हशमत खान का सिर तलवार के एक ही वार से उतारने वाले हाथ आज बेटे के मस्तक पर तिलक लगाने में भी असमर्थ होते हैं। महाराजा के लरजते शक्तिहीन हाथ पकड़कर खड़क सिंह का राज तिलक करवाया जाता है। जिसके द्वारा लगाये जयकारे की गर्जना से हिमालय पर्वत तक कांप जाता था, उसके मुँह से बहुत कठिनाई से थिरकते हुए शब्द निकलते हैं। ध्यान सिंह डोगरे को खड़क सिंह की बांह पकड़ाकर बड़ी धीमी आवाज़ में महाराजा बोलता है, “मेरे स्थान पर अब से महाराजा खड़क सिंह होगा और तुम इनके वज़ीर... ख़याल रखना।“
राजा ध्यान सिंह भगवत गीता पर हाथ रखकर महाराजा के प्रति वफ़ादार और राजभक्त होने की सौगंध उठाता है।
महाराजा जनसमूह को मुखातिब होता है, “खालसा जी ! पंथ को मेरा एक आखि़री सन्देश है। एकबार मनुष्य के हाथ की सभी उंगलियाँ आपस में लड़ पड़ीं। अंगूठा कहने लगा, मेरी अहमियत ज्यादा है क्योंकि मेरे से ही राजतिलक किया जाता है। उसके साथ वाली पहली उंगली कहने लगी, मेरा महत्व अधिक है क्योंकि जब किसी को राह बताना होता है तो मैं ही प्रयोग में लाई जाती हूँ। बीच की उंगली कहने लगी, मैं तो हूँ ही सबसे बड़ी, मुझे तो कोई सफाई देने की ज़रूरत ही नहीं, मेरा बड़ा कद देख लो। चैथी उंगली कहने लगी, जब विवाह होता है तो अंगूठी मेरे में ही डाली जाती है और रिश्ता कायम होता है। सबसे छोटी और अंतिम उंगली कहने लगी, मैं न होऊँ तो हाथ की सुंदरता ही बिगड़ जाएगी। हाथ कहने लगा, मुझे तुम सभी की ज़रूरत है, जब तुम सभी इकट्ठी हो जाती हो तो मुक्का बन जाता है और तुम सब मेरी ताकत बन जाती हो। लोग मुझसे डरने लग जाते हैं। मेरी यही विनती है कि मिलकर रहना। फूट का शिकार न होना। यदि तुम एकसाथ रहोगे, एक जान रहोगे तो तुम्हारी हवा की ओर भी कोई नहीं झांक सकता। इस विशाल सल्तनत को कायम करके मैं अपने हिस्से की सेवा पूरी कर चला हूँ, भविष्य में इसकी बागडोर तुम्हारे ही हाथों में है। संघर्षों और कुर्बानियों से हासिल किए इस सिक्ख राज को संभालकर रखना।“ बोलते बोलते महाराजा बेहोश हो जाता है। उसको पालकी में वापस राजमहल में ले जाया जाता है।
27 जून 1839 को दोपहर बाद महाराजा मुसम्मन बुर्ज़ में हमेशा की नींद सो जाता है। उसके द्वारा आँखें मूंदते ही लाहौर किले की दीवारें, छतें और ज़मीन में से अनेक साजि़शें, चालें और षड्यंत्र अपने मुँह बाहर निकालने शुरू कर देते हैं। शहजादा शेर सिंह अपनी जान के ख़तरे को भांपता हुआ आरामगाह में पड़ी महाराजा की मृत देह के अन्तिम दर्शन किए बग़ैर ही भाग जाता है। 1⁄4शेर सिंह उस समय तक अंत्येष्टि पर वापस नहीं आता, जब तक अंग्रेज सरकार द्वारा बीच में पड़कर उसको ख़तरे से मुक्त नहीं करा दिया जाता1⁄2।
अगले दिन हजूरी बाग 1⁄4डेरा साहिब गुरद्वारे के निकट1⁄2 महाराजा की देसी घी में डूबी हुई चंदन की लकडि़यों वाली चिता को खालसा राज का दूसरा महाराजा, सरदार खड़क सिंह डगमगाते कदमों और कांपते हाथों से अग्नि देता है।
दूर गेरू रंग का सूरज अस्त होना प्रारंभ कर देता है। नीम मदहोश महाराजा खड़कसिंह को उस वक्त कतई अहसास नहीं होता कि दूर डूबता सूरज अपने साथ क्या क्या लेकर डूब रहा है...।
ब्रितानवी गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिंक ने यद्यपि 7 दिसम्बर 1829 को सती प्रथा बंद करने का कानून हिंदुस्तान में लागू कर दिया था, पर राजपूताने और पंजाब ने उसको अभी तक स्वीकारा नहीं था। 1⁄41847 में पूरे भारत में यह प्रथा बंद हुई थी1⁄2।
महाराजा की जलती चिता में महताब देवी सुहाग का जोड़ा और लाल चूड़ा पहनकर बैठ जाती है। उसके पीछे पीछे रानी हर देवी, रानी राज देवी, रानी रजनो कौर, रानी लक्ष्मी कौर और रानी राम देवी एक एक करके महाराजा की कुल छह रानियाँ और छह दासियाँ सती होती जाती हैं।
जब गुल बहार चिता में बैठने लगती है तो उसको जैनब खातून यह कहकर रोक देती है कि वह तो मुसलमान है ओर इस्लाम में यह रस्म वर्जित है। समीप खड़ी मोरां सरकार के कानों में यह बात पड़ जाती है।
महारानी जिंद कौर मोरां सरकार से मुखातिब होती है, “मोरां बहन क्यों, तू नहीं सती होगी ? महाराजा साहिब ने तेरे लिए कितना कुछ किया है। सारी जि़न्दगी तेरे इर्दगिर्द चकरी की तरह घूमते रहे हैं।“
मोरां झट से दहाड़ती है, “इस्लाम में इसकी मनाही है। मैं मुसलमानी हूँ। तुम सती होवो।““सिक्ख धर्म में भी इसकी मनाही है।“ महारानी जिंद कौर का विलाप और ऊँचा हो जाता है।
यह वार्तालाप सुनते ही राजा ध्यान सिंह उड़ने को तत्पर पंछी की भाँति अपनी बांहें दोनों तरफ फैलाकर कंधों के बराबर करता है और बुक्का मारकर महाराजा की जलती चिता की ओर बढ़ता है, “महा...रा...ज...! मैं भी आ रहा हूँ आपके साथ। मैं आपके बिना नहीं रह सकूँगा।“
जैसे ही राजा ध्यान सिंह चिता के करीब पहुँचता है, उसकी एक बांह उसका भाई राजा गुलाब सिंह और दूसरी बांह चाचा ज़मादार खुशहाल सिंह पकड़कर उसको आग में कूदने से बचाने के लिए पीछे की ओर खींच लेते हैं। इतने में तेज सिंह भी पीछे से आकर उसको कमर से पकड़कर पीछे की ओर खींचता है, “राजा ध्यान सिंह... सब्र करो... हौसला रखो... महाराजा साहिब के अकाल चलाणे 1⁄4असमय मृत्यु1⁄2 का हम सबको दुख है।“
“नहीं, मुझे छोड़ दो, महाराज के बिना मैं जीकर क्या करूँगा ?“ राजा ध्यान सिंह उनसे छूटकर थोड़ा-सा आगे बढ़ता है और बाकी सब खींचकर उसको फिर पीछे की ओर घसीट लेते हैं। पूरा आधा घंटा यह खेल-तमाशा चलता रहता है।
शेष सभी महारानियों और दासियों की धाहें आसमान का सीना फाड़ 81 मोरां का महाराजा
देती हैं। चिता की लपटें नीची हो जाती हैं तो बाकी सभी लोगों के साथ गुलबहार बेगम अपने बादशाह की यादों को अपने दिल में समेट कर विलाप करती राजमहल की ओर वापस चल पड़ती है।
अग्नि शांत होकर बुझ जाती है और... लाल सुर्ख तमतमाता सूरज अस्त हो जाता है।
इस घटना के उपरांत महाराजा की रानियों को जागीरें प्रदान की जाती हैं तो गुलबहार बेगम को सब रानियों से सुन्दर होने के कारण सबसे अधिक जागीर मिलती है। कुछ समय शाही महल में बिताने के बाद साजि़शों से निराश होकर गुलबहार बेगम महाराजा की एक लामाई बुधमत का मानने वाली लद्दाखी रानी हुलाइशी के साथ लद्दाख चली जाती है। महाराजा की मौत के बाद सिक्ख राज को डोगरे हथिया लेते हैं और डोगरों के राज पर अंग्रेज कब्ज़ा कर लेते हैं। महारानी जिंदा को जलावतन करके अंग्रेज सरकार गुलबहार बेगम की जागीर ज़ब्त करके उसक गज़ारे के लिए 12,380 रुपये सालाना पेंशन और रहने के लिए एक अलग महल कूचा गुल बेगम 1⁄4रंग महल और हवेली मियां खान के बीच1⁄2 दे देती है। गुल बहार बेगम एक अनाथ लड़के को गोद ले लेती है। पर गुलबहार बेगम के मन से अपने बादशाह की यादें नहीं निकलतीं। वह अपने पुत्र सरदार खान को दासियों के हवाले करके अपनी समस्त जायदाद उसके नाम कर देती है। स्वयं गुलबहार बेगम फिर लद्दाख चली जाती है और बोधि मठों में सन्यासी जीवन व्यतीत करती हुई 1863 में लाहौर में अपने पुत्र के पास खुदा को प्यारी हो जाती है। उसका पुत्र उसकी लाश को लाकर लाहौर के मिया साहिब कब्रिस्तान में दफ़ना देता है। बोधि भी उसकी याद में एक समाधि बनाते हैं। श्रीनगर से लेह की ओर जाते हुए लेह पहुँचने से कुछ किलोमीटर पूर्व आलची बोध विहार के नज ़दीक एक बोध चोरटन रूपी यह समाधि मिलती है। इसका वे लोग भिक्षुणी खानाबदोश बेगम की समाधि कहकर आज भी आदर करते हैं।
nice post
ReplyDeletehttp://sportscentre4u.com/